कुंदन शाह को 1983 में बनी इस फिल्म के लिए अवार्ड मिला था। फिल्म की कहानी अंटोनीओनी की 1966 की फिल्म “ब्लोअप” से प्रेरित बताई जाती है। ये कहानी मुम्बई में काम शुरू कर रहे दो फोटोग्राफर दोस्तों की कहानी है। ये लोग मुम्बई के हाजी अली इलाके में स्टूडियो तो खोल लेते हैं लेकिन काम जारी रखने के लायक आमदनी का इनके पास कोई जरिया नहीं होता। जैसे तैसे ये “ख़बरदार” नाम के एक सनसनी फैलाने वाले प्रकाशन में थोड़ा काम ढूंढ लेते हैं और उसी में बिल्डरों के काले कारनामों का भांडाफोड़ करने में जुटी शोभा नाम की एक पत्रकार के साथ काम करने में जुट जाते हैं।

 

कहानी आगे बढ़ते ही पता चल जाता है कि तनेजा (पंकज कपूर) म्युनिसिपल कमिश्नर डीमेल्लो (सतीश शाह) के साथ मिलकर कुछ घपला कर रहा है। सार्वजनिक तौर पर तनेजा का प्रतिद्वंदी माना जाने वाला आहूजा (ओम पुरी) भी इस घोटाले में तनेजा के साथ ही शामिल था। पहली बार भ्रष्टाचार को प्रत्यक्ष देखते विनोद (नासिरुद्दीन शाह) और सुधीर (रवि वासवानी) की हालत तो हालिया भारतीय राजनीती वाली “सब मिले हुए हैं जी” वाली हो जाती है! इसी दौरान एक फोटोग्राफी प्रतियोगिता के पांच हज़ार के इनाम के लिए भी विनोद और सुधीर मुम्बई की कई तस्वीरें ले रहे होते हैं।

 

प्रतियोगिता के लिए ली तस्वीरों में से एक में कोई व्यक्ति किसी की हत्या करता दिख जाता है। उसे बड़ा करने पर पता चलता है कि हत्यारा तो तनेजा है! जहाँ वो फोटो ली गयी थी, वहीँ जाने पर दोनों को लाश भी मिल जाती है, लेकिन वो कुछ कर पाते इससे पहले ही लाश गायब हो जाती है। म्युनिसिपल कमिश्नर के बारे में बताया जाता है कि वो किसी बीमारी से मर गए हैं और उनकी याद में एक पुल का उद्घाटन किया जाना था। वहां से ये लोग डीमेल्लो की लाश ले भागते हैं लेकिन लाश इनके पास से फिर से गायब हो जाती है!

 

पत्रकार शोभा को ये दोनों झूठ बोल देते हैं कि लाश उनके पास सुरक्षित रखी है। अब पत्रकार शोभा ही तनेजा से “डील” करने चल देती है। वहां तनेजा इनकी भी हत्या करने की कोशिश करता है, लेकिन ये लोग बच जाते हैं। इन्हें फिर से लगता है कि “सब मिले हुए हैं जी”, शोभा और तनेजा में कोई ख़ास अंतर तो नहीं! दोनों ही भ्रष्टाचारी थे। अब विनोद और सुधीर खुद ही मामले को सही अंजाम तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

 

वो ढूंढ लेते हैं कि नशे में तनेजा का प्रतिद्वंदी अनेजा वो लाश, ताबूत सहित ले गया है। वहां से लाश वापस लाने के क्रम में कई मजेदार घटनाएँ होती हैं। यहाँ पर एक नाटक का दृश्य है, जिसमें महाभारत के एक नाटक के द्रौपदी चीर हरण वाले दृश्य में विनोद और सुधीर लाश को द्रौपदी बनाकर घुस आते हैं। ये देखने लायक दृश्य है, आसानी से यू ट्यूब पर भी शायद मिल जाए। फिल्म के अंत में पुलिस आ जाती है और ऐसा लगता है कि अब विनोद और सुधीर सच के लिए लड़ी जा रही अपनी लड़ाई जीत जायेंगे।

 

अफ़सोस असली जिन्दगी में अक्सर ऐसा नहीं होता। सच के लिय लड़ रहे लोग बदनामी नहीं तो कम से कम गुमनामी की मौत मार दिए जाते हैं। तनेजा अपने प्रतिद्वंदी आहूजा और पत्रकार शोभा से कहता है कि वो डूबा तो सबको लेकर डूबेगा। कमिश्नर डीमेल्लो की हत्या का आरोप विनोद और सुधीर पर ही लगा दिया जाता है। सब पहले की तरह चलता रहता है और अंतिम दृश्य में जेल के ही कपड़े पहने विनोद और सुधीर गला कटने का इशारा करके न्याय की हत्या दर्शाते हैं।

 

घबराइए मत, आज पूरी फिल्म की कहानी सुनकर भगवद्गीता नहीं पढ़ाने जा रहे। आज सोच रहे थे कि जिसकी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेताओं से जान पहचान हो, जो मंत्रियों से मिलता जुलता हो, ऐसे किसी के झूठ को मेरे जैसा कोई “अदना सा” साधारण आदमी खुल्लमखुल्ला झूठ कह दे तो क्या होगा? उस साधारण से नागरिक के खिलाफ सत्ता के सबसे धुरंधर योद्धा उतारे जायेंगे। “अदना से”, “फेसबुक पर लिखने वाले”, “अनाम” व्यक्ति को गलत बताने के लिए बेस्टसेलर किताबों के लेखक मैदान में छोड़ दिए जायेंगे।

 

विरोध में उठती हुई किसी भी आवाज़ को सत्ता के करीबी अपनी बूट के नीचे कुचल ही सकते हैं। जो कहीं इतने पर भी बात नहीं बनी तो क्या होगा? यहाँ चरित्र हनन का दौर शुरू होता है। विरोध कि आवाज उठाने वाले के चरित्र पर किस्म किस्म के लांछन लगाए जा सकते हैं। आमतौर पर शराबी, लम्पट, लौंडियाबाज होने जैसे आरोप आते हैं। हालिया राजनीति में तो मोदी जी पर भी पत्नी सम्बन्धी आरोपों से लेकर नरभक्षी होने तक के अभियोग दागे ही गए हैं। सवाल ये है कि एक अदना से मच्छर को मारने के लिए तोपें क्यों घुमानी पड़ रही हैं सरकार?

 

बाकी लड़ाई में हम मान की चिंता और अपमान का भय छोड़ के ही उतरे होंगे ये समझना मुश्किल नहीं है। मैंने जिन सन्दर्भों (रिफरेन्स) पर सवाल उठाये थे वो अभी भी बाकी हैं बड़े लेखक जी और हम “जाने भी दो यारों” कहने के मूड में नहीं!

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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