लोककथाएं तथाकथित बुद्धूजीवियों के हिसाब से तो चलती नहीं, इसलिए एक लीक पर भी नहीं होती। बिहार की लोककथाओं को सुनें तो ऐसी पचास से ऊपर लोकगाथाएँ मिल जाएँगी। लोककथा से बदल कर शब्द को लोकगाथा इसलिए कर दिया है क्योंकि कई कहानियां इतनी लम्बी हैं कि कोई लिखने बैठे तो पूरा उपन्यास ही खड़ा हो जाए। स्थानीय लेखकों ने बिहार की भाषाओँ में इन कहानियों को लिखा है, मगर अभिजात्य के अहंकार में हिंदी पट्टी के स्वनामधन्य जीवों ने उचित दूरी बनाए रखी।

 

दूरी बरतने का एक दूसरा कारण ये भी रहा कि महानगरों के वातानुकूलित सभागारों में तथाकथित “दलित चिंतन” रुचता है। लोकगाथाओं के लिए तो मौसम की मार झेलते, धूल भरे गावों में सचमुच गरीब हरिजनों के बीच भी बैठना होगा। हिंदी और स्थानीय भाषाओँ के सम्बन्ध को वो रेशम पर लगा टाट का पैबंद बताते रहे हैं। पटना में ही 21 और 22 को आयोजित होने वाले बिहार संवादी (#BiharSamvadi) नाम के कार्यक्रम में तो “बिन बोली भाषा सून” नाम का एक सत्र भी है। वो मैथिलि, भोजपुरी इत्यादि को भाषा के बदले बोली क्यों मानते हैं मुझे पता नहीं।

 

लोकगाथाओं से दूरी की एक वजह ये भी होगी कि ये कॉपीराइट का कानून तो मानेंगी नहीं। जो हिंदी को बेचकर खाने निकले हैं, उनसे ये कैसे बर्दाश्त होगा कि उनकी मठाधीशी, उनका एकाधिकार छीन लिया जाए? उनके आयातित “वाद” की अवधारणा ही पूरी तरह एकाधिकार पर टिकी है। वहां साझा पैदा करने वाले तो कई भागीदार होंगे लेकिन बेचने वाली एक तानाशाही सत्ता, एक “मोर इक्वल अमोंग इक्वल्स” तो होना ही चाहिए। लोकगाथाओं के गायक-वाचक को धन, सम्मान, अहंकार सब त्यागना होता है, जो पाने की ख्वाहिश में हो, उस से कैसे हो पायेगा?

हम लोककथा की बात शुरू कर रहे हैं तो आज दीना-भदरी पर आना चाहिए। जैसा काफी हद तक रॉबिनहुड जैसे किरदार में होता है वैसे ही कुछ इनकी कहानियां भी चलती हैं। अब सोचिये कि #बिहार_संवादी का एक सत्र जहाँ “जाति के जंजाल में साहित्य” पर हो वहां मुझे स्थानीय लोकदेवता, लोकनायक का नाम किसी विदेशी उदाहरण से क्यों समझाना पड़ रहा है? ऐसा इसलिए है क्योंकि हिंदी वालों ने अपने अभिजात्य अहंकार में कभी स्थानीय को आगे आने ही नहीं दिया। जैस राजा सह्लेष पासवान (दुसाध) समुदाय के होते हैं, वैसे दीना-भदरी की कथाएँ मुसहर (ऋषिदेव) समुदाय के लोग सुनाते हैं। ये पिछड़ों से भी अति-पिछड़ा हरिजन समुदाय है।

 

कहानियों के मुताबिक दीना बड़े और थोड़े शांत स्वभाव के थे तो भदरी छोटे और उग्र थे। दीना मूर्तियों में सांवले (नील वर्ण) और हाथ आशीर्वाद की सी मुद्रा में उठाये दिखते हैं तो करीब करीब गौर वर्ण (पीत) भदरी जरा क्रुद्ध से। अक्सर इनके साथ इनकी माता निरसो बीच में खड़ी होती हैं, जो कि शायद पुराने जमाने में नहीं होती थीं, इधर के वर्षों में ही शायद उनकी मूर्तियाँ भी बनने लगी है। प्रतीक के रूप में मात्र तीन बांस गाड़ कर इनकी पूजा होती है। इनकी कहानी की शुरुआत एक बड़े जमींदार की कहानी से होती है जिसकी थोड़ी सी फसल, भुखमरी के कारण कुछ गरीबों ने चुरा ली थी।

 

जमींदार और उसके कारिंदे जुर्माना वसूलने वरना पुलिस के हवाले करने पर तुले थे। मजदूर माफ़ी की गुहार लगाने लगे। लेकिन जमींदार टस से मस होने को तैयार नहीं था। उसी वक़्त दिना और भदरी दोनों भाई वहाँ गुज़र रहे थे। समझाने बुझाने पर भी जब जमींदार नहीं माना तो गुस्से में भदरी ने जमींदार की गर्दन मरोड़ दी! जमींदार के मरने पर मामला आगे अदालत में पहुंचा और एक लाख के मुआवजे पर मुकदमा वापस लिए जाने की बात हुई। गौरतलब है कि जान के बदले पैसे (खूंबहा) लेने का रिवाज़ एक समुदाय विशेष में है, हो सकता है जमींदार उसी समुदाय के रहे हों।

 

ग्रामीणों के पास उतने पैसे नहीं थे लेकिन चंदा करके उनसे जो जुट पाया, वो लेकर वो अदालत गए। वहां पता चला कि दो साधू पहले ही रकम जमा कर के जा चुके हैं! दीना-भदरी के बारे में माना जाता था कि वो साधू वेश में ही रहते थे। कुछ उनके ब्रह्मचारी होने का दावा भी करते हैं। किस्से में जैसी पुलिस और जैसी अदालत का जिक्र है, ये कहानी ज्यादा पुरानी नहीं हो सकती। ये शायद सौ-दो सौ साल पुरानी रही होगी। कहानी के अंत के बारे में कहा जाता है कि राजा के बुलावे पर ना जाने के कारण राजा इनसे नाराज हो गया।

 

राजा ने जादूगरनी बहनों के जरिये छल और जादू टोने से दोनों भाइयों को मरवा दिया था और लोकगाथा के मुताबिक दीना भदरी के भूत हत्यारिन जदुआ-बचुवा से बदला लेते हैं। इसाई प्रभाव के आने से पहले चूँकि साहित्य में जादूगरनी (डायन) का जिक्र शायद ही कहीं आता हो, इसलिए भी मुझे ये कहानी ज्यादा पुरानी नहीं लगती। हाँ ये जरूर है कि हाल के वर्षों में इस लोककथा में बदलाव भी आते रहे हैं। एक मानक-लिखित रूप में इसका ना होना भी इसकी वजह रहा होगा। ऐसा इसलिए भी हो पाया है क्योंकि हिंदी पट्टी के अभिजात्य, स्थानीय भाषाओँ के साथ अछूतों का सा ही व्यवहार करते हैं।

 

संवाद एकपक्षीय भी नहीं होता, उसमें सिर्फ एक वर्ग नहीं कहता, दोनों पक्ष कुछ एक दुसरे को कहते भी हैं और एक दुसरे की सुनते भी हैं। बाकी बिहार संवादी के प्रचार में हमें “शुभ, मंगल और शानदार” लिखा दिखता है, ये शायद “शुभ-मंगल सावधान” नाम की फिल्म के तर्ज पर उठाया गया है। उम्मीद है फिल्म जिस समस्या को लेकर बनी थी, #बिहार_संवादी का वैसा कुछ नहीं होगा।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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