सन्दर्भ के बिना की बात चली ही है तो सन्दर्भ का इतिहास में महत्व भी देखा जाना चाहिए | भारत की आजादी के वक्त, हमने स्कूलों में सिर्फ भारत का इतिहास पढ़ा है | मगर वो दौर विश्व युद्ध के ठीक बाद का था, एशिया और यूरोप में उस दौर में कई ऐसी घटनाएँ हो रही थीं जो भारत पर भी अपना प्रभाव डाल रही थी | भारत की आजादी को यूरोप और ब्रिटेन की तात्कालिक परिस्थितियों के बिना देखना भी सन्दर्भ के बिना इतिहास को देखना होता है | उस दौर के यूरोप ख़ास तौर पर पूर्वी यूरोप के हाल का अच्छा बकान ऐनी अपप्लेबौम की किताब में मिल जाता है |

 

विश्व युद्ध ख़त्म होते ही अचानक सोवियत यूनियन को दिखा की उसके हाथ यूरोप का एक बड़ा भूभाग लग गया है | स्टालिन और उनकी ख़ुफ़िया पुलिस उस पूरे इलाके को एक नयी विचारधारा जबरन कबूल करवाने में जुट गयी | हिंसा के उस दौर में जब अमानुषिक अत्याचारों से देशों को कम्युनिस्ट बनाया जा रहा था तब की किताब है “आयरन कर्टेन” | जो भी कम्युनिस्टों के सामने पड़े, उस हर आम आदमी के पास तीन ही विकल्प थे | भाग जाओ, सहयोग करो, या फिर लड़ने की कोशिश में मारे जाओ |

 

राजनैतिक दल, चर्च, युवा, रेडियो-अखबार जैसे संचार माध्यम, और अर्थव्यवस्था पर कम्युनिस्टों ने क्या प्रभाव डाले इसे पंद्रह अलग अलग अध्याय में सजाया गया है | प्रक्रिया धीमी थी, लगातार थी, और हर जगह एक ही तरीके से नहीं की जा रही थी | किताब का पहला भाग “झूठा सवेरा” (false dawn) है | ये थोडा धीमा लग सकता है, व्यक्तिगत तौर पर मुझे बाद का हिस्सा “हाई स्टालिनिस्म” (1948-1956 का दौर) ज्यादा पसंद आया | किताब में तीन इलाकों को ज्यादा जगह दी गई है : हंगरी, पोलैंड और पूर्वी जर्मनी | उनके आधार पर ही बुल्गारिया, रोमानिया, और कुछ हद तक यूगोस्लाविया और चेक गणराज्य पर भी प्रभाव बताये गए हैं |

 

स्टालिन, कम्युनिज्म और उसके ख़तरनाक गिरोह के पंजे में फंस जाने का इल्जाम ये किताब कई लोगों पर डालती है | किसी भी संभावित विरोध-विद्रोह को कुचलने के लिए प्रचार तंत्र की स्थापना, पूर्वी यूरोप के शासकों की जनसंहार की नीति, अनगिनत बलात्कारों और मासूम बेगुनाहों पर हुए अकल्पनीय जुल्मों की कहानी है इसमें | जिस तथाकथित “यूटोपिया” के सपने मासूमों को दिखा कर भरमाया जाता है ये उस मक्कारी के चेहरे से नकाब नोच फेंकती है | पोलैंड में पादरियों को जेल में डालने चर्च के स्कूल बंद करवाने, या ननों को शहर से बाहर निकालने जैसी घटनाएँ तो खैर समझ में आती हैं कि रिलिजन के विरोध के कारण कम्युनिस्टों ने की होंगी | मगर जब किताबों को ले जाने पर पाबन्दी लगती है तो “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का असली मतलब समझ आता है |

 

वैज्ञानिक तरीकों के इस्तेमाल के तथाकथित पैरोकारों ने इस दौर में “होमो सोवियटिकस” नाम का होमो सेपिएँस जैसा एक शब्द भी इजाद किया था | मानवों की ये “होमो सोवियटिकस” प्रजाति, हर हाल में सोवियत का समर्थन करती | अपने कोम्निफोर्म मीटिंग में 1949 में स्टॅलिन कह रहे थे “कैथोलिक पादरियों को अलग थलग करो और वैटिकन और उसके अनुयायिओं के बीच दरार डालो” | इस काम के लिए वो चरणों में युद्ध छेड़कर दिसम्बर 1949 तक चर्च को अपने कब्जे में लेना चाहते थे | साम्राज्य का सीधा हिसाब था कि पार्टी हमेशा सही होती है इसलिए उनसे कोई गलती हो ही नहीं सकती | आजाद खयालों को पूरी तरह कुचलने के लिए कला के हर रूप को तानाशाहों ने अपने कब्जे में ले लिया |
स्कूल की किताबें फिर से लिखी गई थी | जो भी किसी रूप में “वर्ग शत्रु” घोषित किया जाता उसे मुक़दमे के दिखावे के बाद गुलाग भेज दिया जाता | यंत्रणा, पिटाई, अँधेरे कमरों में कैद और परिवार को नुकसान की धमकी से मनगढ़ंत आरोप स्वीकार करवा लिए जाते | धरातल की सच्चाई और आभासी विचारधारा में इतना अंतर था कि अंत में शासक खुद से ही पूछने लगे कि आखिर नारों पर लोगों को यकीन क्यों नहीं ? क्या कारण है कि आर्थिक परिणाम इतने बुरे निकले और भूखमरी की नौबत आई | सन 1945 और 1953 के दौर में ऐसी सरकारों के खिलाफ विद्रोह भी हुए | मगर पूरे इलाके में इस दौर में गरीबी इतनी फ़ैल चुकी थी कि बचना असंभव हो गया था |

 

ऐनी अपप्लेबौम का मानना है कि 1945-53 के दौर में ये तानाशाही जितनी क्रूर रही, उसमें स्टालिन की मृत्यु के बाद उतना दम नहीं रह गया था | ध्यान रहे कि ये ब्रिटेन की नहीं यूरोप की कहानी है | इसमें इंग्लैंड का नहीं पूरे इलाके का जिक्र है | रोमानिया और यूगोस्लाविया ने अलग विदेश नीति बनाने की कैसे कोशिश की, कैसे एक के करके सोवियत से मोहभंग हुआ, विचारधारा के नासमझी भरे नारों से दिल कैसे टूटा ये उनकी कहानी है | ये पूरे कम्युनिस्ट इलाके की कहानी भी नहीं सुनाती मगर कम से कम आपको ये अंदाजा हो जाता है कि वो दौर यूरोप के लिए कैसा रहा होगा | दुनियां में कैसे हालात होंगे जब भारत को आजादी मिली |

 

भारत की आजादी को अलग करके देखने के बदले विश्व पटल के एक दृश्य के तौर पर देखने में ये किताब भी सहायक हो सकती है | अगर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्यों में रूचि हो, इतिहास रोचक लगता हो तो “आयरन कर्टेन” भी पढ़ के देखनी चाहिए |

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

1 COMMENT

  1. अलेक्जेंडर सोल्जीनितशिन का ‘गुलाग द्वीपसमूह, उससे ज्यादा अच्छे तरीके से लिखी गई है। नोबुल प्राइज भी दिया गया गया था।

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