महर्षि मार्कण्डेय सप्तशती स्तोत्र के पांचवे अध्याय की शुरुआत में कहते हैं :-
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः |
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्र्च हृता मदबलाश्र्यात् ||
इस श्लोक में मुनि कहते हैं कि ‘पुराने समय में शुम्भ और निशुम्भ दो असुरों ने मद और बल के प्रभाव में शचीपति से तीनों लोकों और यज्ञ भाग को छीन लिया |’

शुम्भ और निशुम्भ दोनों असुर थे | असून् प्राणान् रान्ति ददति इति असुरः, मतलब, जो अपने लक्ष्य पाने के लिए जान की क़ुरबानी देने में ना हिचके वो असुर होता है | अब सवाल है कि जो अपना सब छोड़ देने को तैयार है उस से लक्ष्य पूरा कैसे ना होता ? तीनों लोक का साम्राज्य अगर इनका लक्ष्य हो तो वो भी मिलेगा | लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होती | ऋषि मार्कण्डेय आगे इंद्र को ‘शचीपति’ कहते हैं | अमरकोश जैसे ग्रंथों में देखेंगे तो ‘इन्द्रो मरूत्वान् मधवा’ जैसे इंद्र के कई नाम हैं | जब शचीपति देखेंगे तो कहा है ‘रात्रि दिवं शचीं पाति इति शचीपतिः’ मतलब रात दिन अपनी प्रिया (इन्द्राणी) का पालन करने में लगा हुआ | अब ऐसे आदमी के हाथ से तीन लोक अगर नशे में चूर और शक्तिशाली दुश्मन छीन ले तो कौन सा अचम्भा होगा ?

जिनकी धार्मिक रूचि कम हो, या पुराणों को कल्पना मानते हो, वो आराम से पृथ्वीराज-संयोगिता प्रकरण को इतिहास से याद कर सकते हैं | भगवान की कृपा हो भी जाए तो वो सद्बुद्धि देंगे | प्रयास आपको खुद ही करने पड़ते हैं | कोई गलत आदत, कोई व्यसन, पाल रखा हो तो वो भी खुद ही छोड़ना होगा | अगर आप व्यक्ति के स्तर पर हैं तो ‘शचीपति’ हो जाने का नुकसान कम है | आपके तुष्टिकरण से सिर्फ आपका खुद का, या ज्यादा से ज्यादा परिवार का नुकसान होगा | लेकिन राष्ट्राध्यक्ष जब ऐसी नीतियां अपना लेते हैं तो नुकसान भयावह होते हैं | मुगलों का पतन ऐसी ही हरकतों से हुआ | मौर्य साम्राज्य के पतन में अशोक के योगदान पर तो कई जगह इतिहास के प्रश्न और रिसर्च पेपर लिखे जाते हैं | ऐसे ही मोह में महाभारत के धृतराष्ट्र से लेकर बाद के कई राजपूत राजाओं की सल्तनत गई | ब्लैकमेलर की बात मान लेने से उसकी भूख मिटती नहीं और भड़क जाती है | कनीज़ की गुस्ताखियाँ बढती जाएँगी |

अब जैसे कोई बुरी आदत होती है वैसे ही बगीचे के झाड़ झंखाड़ होते हैं | पालतू पशुओं पर हमला करने वाले जंगली जानवर भी होते हैं | जैसे बुरी आदतों को ख़त्म करने के लिए सख्ती दिखानी होती है वैसे ही झाड़-झंखाड़ और हिंसक पशुओं का भी होता है | आप इन्हें थोड़ा थोड़ा पोषण देते रहें और सोचेंगे कि ये उतने में संतुष्ट हो जायेंगे तो वो नहीं होगा | उनकी आबादी बढ़ेगी और आप पर दबाव फिर एक दिन असुर के बल के कारण नहीं, आप अपनी ही कमियों के कारण हारेंगे | आप सोचते हैं आतंकियों को शिक्षा-आर्थिक खुशहाली देकर आप उन्हें सुधार लेंगे तो आपकी गलतफ़हमी है | उसके पास पैसे होंगे तो वो ओसामा की तरह फंडिंग करेगा | वो पढ़ा लिखा होगा तो बगदादी और बंग्लादेशी जैसे कांड करेगा | उन्हें एम.एफ.एन. से होने वाले आर्थिक फायदे रोकिये | उनके कलाकारों, व्यापारियों, मेडिकल टूरिस्ट का वीसा रोकिये | उनको चेनाब से जाने वाला पानी रोकिये | कोई और हल नहीं है, भागने की कोई जगह नहीं है |

बाकी तुष्टिकरण से इसे पाल पाल कर ‘शचीपति’ कबतक बने रहना है और ‘प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका’ वाले मोड में कब आना है वो आपकी शुभेक्षा !

1 COMMENT

  1. हम सब comfort zone में आ गये हैं और यहाँ से कुछ दिखता नहीं है .

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