प्राचीन काल की बात है, करीब हज़ार दिन पहले एक युवक असम में था। वहां गुवाहाटी (गौहाटी) के पास के कामख्या मंदिर में कई साधू जैसे लोग आते जाते रहते हैं। इनमें तांत्रिक भी होते हैं, अघोरी भी, नागा साधू भी होते हैं, शाक्त परम्परा के ही नहीं शैव आदि परम्पराओं के भी होते हैं। इनमें से ज्यादातर एक ही जगह रहते मगर एक दूसरे से परिचय आदि में ये लोग कोई रूचि नहीं लेते। सब एक-दूसरे से समानता का ही बर्ताव करते इसलिय किसी को किसी का नाम भी नहीं पूछना पड़ता।

 

आम तौर पर साधुओं को कम शिक्षित मानने वाले युवक को यहीं पता चला कि किसी नागा अखाड़े में शामिल होने के लिए साधू को कम से कम हज़ार संस्कृत श्लोक याद करके सुनाने होते हैं। जांचने वाले उनमें से किसी भी श्लोक के उच्चारण-व्याकरण या अर्थ पर बीच में ही सवाल कर सकते हैं। मतलब कई नागा सन्यासियों की संस्कृत की ही नहीं, कई भाषाओँ की जानकारी आश्चर्यजनक होती है। व्याकरण ही नहीं बड़े आराम से वो निरुक्त पर भी चर्चा करते हैं।

 

अगर बहुत जरूरी ना हो तो चुप ही रहने वाले और जरूरत हो भी तो कम से कम बोलकर काम चलाने वाले इन साधुओं के पास कई विदेशी भी आते जाते रहते। युवक ने देखा कि उसे तो कई ग्रंथों में कहाँ क्या मिलेगा, क्या पढ़ना चाहिए, क्यों पढ़ना चाहिए जैसी बातें बताई गई, लेकिन अक्सर विदेशियों को इतना नहीं बताया जाता था। उन्हें बहुत थोड़ा सा हिस्सा दिखाया जाता, अक्सर कोई एक सूत्र, कुछ ही मन्त्र बताते। एक सुबह युवक ने इस विषय में साधुओं में से एक से पूछा।

 

सुबह का समय था और कई लोग बैठे टूटे से प्यालों और कटोरियों में काढ़ा पी रहे थे। युवक ने जानना चाहा कि महीनों से साधुओं के साथ घूम रहे कुछ को तो बहुत कम बताया गया, जबकि उसे काफी ज्यादा सिखा डालने की कोशिश हो रही थी ! ऐसा क्यों ? जवाब में साधुओं में से एक करीब पचास के साधू ने युवक की काढ़े की प्याली पर ऊँगली मार दी। जैसे कैरमबोर्ड पर स्ट्राइकर को मारते हैं वैसे ऊँगली मार देने से प्याली बुरी तरह हिली, काढ़ा छलकने को आया और फिर शांत हो गया।

 

सब बैठे रहे बोला कोई कुछ भी नहीं। ये साधारण तरीका था, जिसमें धैर्य ना हो उसे वो लोग धर्म का कुछ भी नहीं सिखाते थे। थोड़ी देर बाद जब प्यालियाँ धो कर रखी गई, तो वहीँ खिचड़ी सी पक रही थी। जिस साधू ने प्याली पर ऊँगली मारी थी उसने इशारे से युवक को बुलाया और देगची की तरफ इशारा किया। बर्तन में करीब बीस लोगों के लायक खिचड़ी सी चूल्हे पर चढ़ी थी। साधू झुका और जैसे प्याली पर मारा था वैसे ही देगची पर ऊँगली मारने लगा।

 

चार पांच बार स्ट्राइकर जैसा मारकर खड़ा हुआ और युवक के जवाब का इंतजार करने लगा। अपने दिमाग का करीब चौथाई हिस्सा खर्च करके युवक ने कहा, प्याली तो छोटी सी थी, जितनी चोट से उसमें हलचल मच जायेगी, उतने से ये बड़ा बर्तन तो हिलेगा भी नहीं। अंग्रेजी में इसके लिए स्टॉर्म इन अ टी-कप जैसी कहावतें भी बनी है। अब मुस्कुराते सर हिलाते साधू ने कहा, बहुत सही, कौन कितना झेल सकता है उसे उतना ही दिया जाता है। प्याली में एक बाल्टी ज्ञान उढ़ेल भी दो तो वो इधर उधर बहकर बर्बाद ही होगा। नहीं डालना चाहिए।

 

ये संवाद या कम्युनिकेशन का बेसिक रूल है। पांच साल के बच्चे से आप जैसे बात करते हैं 30-35 के किसी से वैसी ही भाषा-शैली में बात नहीं की जाती। आईएएस की परीक्षाओं के लिए जो “द हिन्दू” जैसे अख़बार पढ़ने की सलाह दी जाती है उनमें भी ये दिख जाएगा। बोलने की अंग्रेजी अलग, बिलकुल साधारण होती है। अख़बार के पहले पन्ने पर लिखे समाचार उस से थोड़ी स्तरीय अंग्रेजी में होते हैं, वहां कुछ शब्दों के लिए आपको डिक्शनरी भी देखनी होगी। अन्दर जो सम्पादकीय, एडिटोरियल का पन्ना है, वो बिलकुल परिष्कृत भाषा में होता है। साधारण लोग उसे पढ़ भी नहीं सकते।

 

अब जरा हिंदी के बारे में सोचकर देखिये। आप हिंदी अख़बार खरीदते हैं, ध्यान रहे आप ग्राहक हैं, पैसे देकर समाचार पत्र खरीदा है आपने। क्या आपके बोलचाल की हिंदी से आपके अख़बार के पहले पन्ने की शैली बेहतर है ? पहले पन्ने के कौन से शब्दों के लिए आपको शब्दकोष देखना पड़ता है ? अन्दर सम्पादकीय के पन्ने पर क्या क्लिष्ट, परिष्कृत सी भाषा मिलती है ? बोलने की हिंदी, लिखने की हिंदी, और परिष्कृत शुद्ध हिंदी की तीन अलग अलग लेखन शैलियाँ नजर आती हैं ?

 

बाकी के लिए 2006 से तो अंतर्राष्ट्रीय हिंदी दिवस भी मनाया जा रहा है। हिंदी कहीं इसलिए तो नहीं पिछड़ी क्योंकि इसे लिखने-पढ़ने, इसे इस्तेमाल करने, सीखने वालों ने अपनी क्षमता को प्याली जितना बना लिया है ? हो सकता है बाल्टी भर ज्ञान इधर उधर बहकर बर्बाद हो जाता हो !

SHARE
Previous articleहिंदू धर्म : वामशी जुलुरी
Next articleकश्मीर के वाल्मीकि
आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here