अगर सूफी संगीत से इस्लाम को निकाल देंगे तो क्या बचेगा ? मतलब किसी भी सूफी गाने से अल्लाह, मौला, खुदा जैसे शब्द निकाल दीजिये। या फिर जब आप किसी सूफी गाने की कल्पना करते हैं तो किसी मज़ार पर बैठे दस बीस कव्वालों जैसे झुण्ड की कल्पना मत कीजिये। दरवेश ना आये कल्पना में सूफी गीत गाता हुआ तो क्या वो सूफी संगीत बचेगा ? शायद नहीं। ऐसा ही क्रिसमस कैरोल के साथ भी होगा। उसमें से आप ईसा मसीह हटा देंगे तो वो क्रिसमस कैरोल ही नहीं रह जाएगा।

कुछ चीज़ें होती हैं जो मजहब से जुड़ी होती हैं (मजहब और दीन अलग होता है, इस्लाम मजहब नहीं दीन होता है)। वैसे ही कुछ चीज़ें रिलिजन (Religion) से जुड़ी होती हैं। योग का भी कुछ ऐसा ही है। हिन्दुओं का धर्म अगर योग से अलग कर दें तो योग कुछ वैसा ही रह जायेगा जैसे निचोड़ा हुआ गन्ना। अक्सर “सिठ्ठी” कहलाने वाला ये निचोड़ा हुआ गन्ना आपने गन्ने की रस वाली दुकानों के पास देखा होगा। इसका इस्तेमाल शराब बनाने के लिए तो किया जा सकता है, इस अनैतिक आर्थिक लाभ को छोड़ दें तो फायदा ना के बराबर ही है।

आज जब विश्व भर में योग की चर्चा है और सोशल मीडिया की दीवारें भी योग की चर्चा से भरी पड़ी हैं तो कुछ और चीज़ों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। बहुत पहले 1920 के दौर में ही गुजरात के बंगाली बाबा योग का प्रचार प्रसार शुरू कर चुके थे। पुराने ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के ज़माने में कुछ लोगों ने आयंगर को योग का प्रचार प्रसार करते देखा होगा। उनके अलावा भी योग के कई प्रवर्तक रहे। बिहार में मुंगेर का आश्रम भी वर्षों से इस कार्य में जुटा है। मगर योग को प्रसिद्धी कैसे मिली ? इस सवाल के जवाब में कोई भी स्वामी रामदेव के योगदान से इनकार नहीं करेगा। उनके प्रयासों से पिछले दस-पंद्रह वर्षों में जो हुआ है वो बाकियों के करीब सौ वर्षों के प्रयास से नहीं हो पाया था। ये उन्होंने किया कैसे है इसपर भी एक नजर डालनी जरूरी है। जैसे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, इंडस्ट्रीज में एक दुसरे की बेस्ट प्रैक्टिसेज सीखी जाती वैसे ही हमें भी सीखनी पड़ेंगी।

यहाँ पहली चीज़ है उपभोक्ता तक उत्पाद को पहुँचाना। स्वामी रामदेव अपना आश्रम कहीं पहाड़ों पर बना के नहीं बैठे थे। जिसे सीखना है वो उनके पास आये जैसी मजबूरी नहीं क्रिएट कर रहे थे। वो शहरों कस्बों में घूम कर योग की महत्ता बताते रहे। वो लोग जो सोचते थे कि करना तो अच्छा है, मगर सीखें किस से ? उन्हें अचानक एक गुरु उपलब्ध हो गया जो ये आसान से चीज़ दो चार दिन में सिखा देता था। बंगाली बाबा ने अपने स्तर पर जो काम शुरू किया था, उसे सही मायनों में आगे बढ़ाने का काम स्वामी रामदेव ने किया।

दूसरी चीज़ है चिड़िया की आँख वाली। अगर आपको पूरा पेड़, उसपर बैठा पक्षी, पीछे का आकाश सब नजर आ रहा है तो आपका निशाना कभी सही नहीं लगने वाला। योग को अष्टांग योग कहा जाता है, क्योंकि उसके आठ हिस्से होते हैं। स्वामी रामदेव कभी भी एक ही बार में आठों हिस्से लोगों को घोलकर पिला देने का प्रयत्न नहीं कर रहे थे। उन्होंने सिर्फ एक हिस्से पर ध्यान लगा रखा था। वो प्राणायाम सिखाते रहे। प्राणायाम के भी केवल बाहरी हिस्से पर ध्यान लगा रखा था। जिन्हें प्राणायाम के बारे में विस्तार से पता होगा वो आपको इस से ज्यादा बता सकते हैं।

अकेले प्राणायाम के भी चार हिस्से हैं। पहला पूरक, दूसरा अन्तःकुम्भक, तीसरा रेचक, और चौथा बाह्य कुम्भक। पूरक का मतलब है सावित्री मन्त्र जपते हुए सामान्य गति से सांस अन्दर लेना । अन्तः-कुम्भक में सावित्री मन्त्र जपते हुए सांस अन्दर रोके रखनी है। रेचक में सावित्री मन्त्र जपते हुए सामान्य गति से सांस बाहर छोडनी है। अंतिम यानि बाह्य कुम्भक, सावित्री मन्त्र जपते हुए, सांस बाहर छोड़कर सांस को रोके रखने को कहते है। अध्यात्मिक दृष्टि से बाह्य कुम्भक जितना कष्टदायक होगा उतने ही पिछले और वर्तमान जन्मों के प्रकट और छुपे हुए कुसंस्कार नष्ट होंगे और सद्बुद्धि बढ़ेगी। बाह्य कुम्भक अचेतन मन के कुसंस्कारों को ध्वस्त करने और पूर्ण चैतन्य बनने का सर्वोत्तम साधन है। सन्यासियों और सामान्य लोगों के लिए जप विधि, जप की गिनती, दिन में कितनी बार प्राणायाम करना चाहिए, सबमें अंतर होता है।

कहने का मतलब ये कि सिर्फ एक जगह ध्यान लगाने के कारण स्वामी रामदेव ज्यादा तेजी से योग का प्रसार कर पाए। ये एक जगह ध्यान लगाने के अभ्यास के लिए योग में ही, मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण का अभ्यास भी होता है | हो सकता है थर्ड ग्रेड फिल्मों में ये चार नाम अपने किन्हीं अजीब सी चीज़ों के लिए सुने हों। मारण आपकी कुप्रवृतियों को मारना है, मोहन आपके इष्टदेव को मोहना, या उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए होता है। उच्चाटन तुच्छ इच्छाओं से ऊपर उठकर अध्यात्मिक रुचियों-प्रवृतियों को जगाने के लिए है। वशीकरण आपके अपने ही मन को वश में रखने के लिए होता है ताकि वो बार बार इधर उधर भाग ना पाए। तंत्र की कई विधाओं में ये त्राटक के जरिये सिखाते हैं।

अब यहाँ एक अक्सर सुने जाने वाले “योग क्षेम वहाम्यहम” को भी याद कर लीजिये। योग का अर्थ जोड़ना भी होता है ये शायद आप पहले से ही जानते होंगे। क्षेम का अर्थ होता है जो आप पहले से ही जोड़ चुके हैं उसे बचाए रखना। आपने धन कमाया मगर उसकी सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं किया तो उसके खो जाने या खर्च हो जाने की प्रबल संभावना रहती है। इसलिए उसे बचाए रखना सीखना भी जरूरी होता है।

यानि यहाँ पहले तो ये ध्यान देना होगा कि अगर आप हिदुत्व के प्रचार में अपने स्तर पर जुटे हैं तो अपने एरिया ऑफ़ एक्सपरटाइज या एरिया ऑफ़ इंटरेस्ट को पहचानिए। रामायण पसंद है तो सिर्फ उसी की बात कीजिये, रामचरितमानस पसंद है तो सिर्फ वहीँ ध्यान दीजिये। महाभारत से कूद के वेदों पर जाने की कोशिश मत कीजिये या उपनिषद से निकल के कर्मकांडों पर ध्यान मत दीजिये। ना हो तो एनिमल प्लेनेट जैसे टीवी चैनल देखिये। शेर शिकार के लिए पानी में नहीं उतर जाता, मगरमच्छ नदी-झील से निकल कर जमीन पर नहीं आता शिकार के लिए। जिसका जो क्षेत्र है वो वहीँ रहेगा, अपने विरोधी के आमंत्रण पर जवाब देने के लिए प्रतिक्रियावादी हो जाना मूर्खता होती है।

जिस तरीके से एक बार जीता जा सकता है वो तरीका बार बार इस्तेमाल कीजिये। फिर भी जब इधर उधर कूद जाने का मन करे तो याद रखिये “योग चित्तवृत्तिनिरोधः” यानि चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना (चित्तवृत्तिनिरोधः) ही योग है। अर्थात मन को इधर उधर भटकने न देना, केवल एक ही वस्तु में स्थिर रखना ही योग है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुभकामनायें ।।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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