बच्चों के लिए भारत में ना के बराबर ही लिखा जाता है। बाकी कि हिंदी किताबों जितनी प्रतियाँ बिकें और वो बेस्टसेलर हो जाए, या कम से कम चर्चित ही रही हों, ऐसी किताबें ना के बराबर लिखी जाती हैं, और छपती तो शायद कोई भी नहीं। जब बड़े पूछते हैं कि “ये पुस्तक हिंदी में आती है क्या?” तब तो हम भी कई बार मुस्कुराकर पूछ लेते हैं कि इतने साल में अंग्रेजी सीख क्यों नहीं ली? मगर जब बच्चे पूछते हैं कि इतनी किताबों में कोई किताब हिंदी में नहीं? तो शर्मिंदा चुप्पी के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचते।

 

अंग्रेजी में बच्चों के लिए प्रचलित किताबों में “नॉटीएस्ट गर्ल”, नैंसी ड्रियू, हार्डी बॉयज जैसी किताबें तो होती ही हैं, बारह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए भी सीरीज जैसी किताबें छपती हैं। ऐसी किताबों में से एक “इफ यू गिव अ माउस अ कुकी” भी है। छोटी सी रंग बिरंगी तस्वीरों भरी ये किताब छोटे बच्चों के लिए ही है। इस एक किताब की प्रसिद्धि और प्रचलन के चलते फिर पूरी “इफ यू गिव अ माउस…” से शुरू होने वाली पूरी सीरीज ही आई।

 

एक वाक्य में कहें तो ये “ऊँगली थमाने पर पहुंचा पकड़ने” की कहानी है। कहानी में बहुत से किरदार भी नहीं है, एक बच्चा, उसकी माँ और एक चूहा, बस इतने ही लोग दिखते हैं। कहानी जब शुरू होती है तो माँ बच्चे को किसी आंटी के घर ले जाना चाहती थी। जिनके घर बच्चे होंगे उन्हें पता होगा कि ऐसी कोशिश का नतीजा क्या होता है। रिश्तेदार अक्सर पढ़ाई कैसी चल रही है, बड़े होकर क्या बनोगे जैसे असहज करने वाले सवाल करते रहते हैं। बच्चे यथासंभव रिश्तेदारों के घर जाने से बचते हैं।

 

ये कहानी वाला बच्चा भी आंटी के घर नहीं जाता और घर में ही रूककर कॉमिक्स पढ़ने कि सोचता है। बरामदे-आँगन में कहीं कॉमिक्स पढ़ते वक्त उसके पास एक चूहा आ जाता है। चूहा और बच्चा बात करने लगते हैं तो बच्चा चूहे को एक कुकी-बिस्कुट भी दे देता है। चूहा बिस्कुट खाकर कहता है उसे प्यास लगी है तो थोड़ा दूध भी मिलेगा क्या? जब चूहे को दूध मिलता है तो वो कहता है ग्लास तो ऊँचा है ! उसे एक स्ट्रॉ मिले तभी वो पी पायेगा, इसलिए बच्चा स्ट्रॉ भी ला देता है।

 

घर के अन्दर आकर दूध पी चुका चूहा अब कहता है, दूध पीने में तो उसकी सफ़ेद मूंछ बन आई होगी! लिहाजा बच्चे को अब उसे एक नैपकिन देनी चाहिए। नैपकिन से अच्छे से चेहरा साफ़ हुआ या नहीं ये देखने के लिए चूहा अब आइना मांग लेता है। आइना देखकर वो कहता है उसकी एक मूंछ का बाल बाकि से बड़ा है, उसे काटने के लिए कुछ मिल जाए तो वो सबको बराबर कर ले। मूंछें काटने में पूरे कमरे में कटे बाल बिखर जाते हैं। अब सफाई करने कि बात करता चूहा झाड़ू भी मांग लेता है।

 

सफाई के चक्कर में चूहा, पानी भी मंगाता है और पूरे घर को पानी, बालों वगैरह से गन्दा करके पानी पर फिसलने का खेल भी करने लगता है। अनचाहे मेहमान के घर पर कब्ज़ा जमा लेने से परेशान बच्चा क्या करे क्या नहीं, ये उसे समझ नहीं आ रहा होता! इतना काम करने में वो थक गया है, ये कहते हुए चूहा एक और बिस्कुट भी मांग लेता है और फिर बिस्कुट के साथ उसे दूध भी चाहिए था! कहानी के अंत में समस्या को बच्चे और परिवार ने कैसे सुलझाया ये नहीं बताते।

क्या क्या विकल्प लिया जा सकता है ये सोचने के लिए बच्चे और उसे ये कहानी सुनाने वालों को छोड़ दिया गया है। आप चाहें तो इसकी तुलना बंगलादेशी या रोहंगिया शरणार्थियों से कर सकते हैं, आप चाहें तो बच्चे को जर्मनी जैसे देशों कि तरह आश्रय देना चाहिए भी कह सकते हैं। नतीजे क्या होंगे, ये उल्टा बच्चा ही आपको सिखा डाले ऐसा भी हो सकता है। बच्चों को अपने खिलौने दूसरों को देने के लिए बहुत लालायित नहीं देखा है, तो उनके आपको सिखा डालने कि संभावना भी तो बनती ही है।

 

फ़िलहाल जब हमने इसे अमेज़न जैसी ऑनलाइन साइट्स पर ढूँढने की कोशिश कि तो ये काफी महंगी दिखी। फिर भी काम चलाने के लिए लिंक दिया ही है ताकि जब भी संभव हो, किताब के एक आध पन्ने, रंग-रूप और आकार जैसी चीज़ें देखी जा सकें। बच्चों कि किताबों जैसा ही इसमें बड़े आकार का प्रिंट होता है और ये ज्यादा मोटी भी नहीं, करीब चालीस पन्ने की ही होती है। कभी मिले तो खरीदकर और जो ना मिले तो ऐसी कहानियां गढ़कर बच्चों को सुनाई ही जानी चाहिए। किस कहानी का अंत क्या होगा, ये फैसला तो कल कभी वो अपने हिसाब से कर ही लेंगे।

(आप ये कहानी यू-ट्यूब विडियो में भी देख सकते हैं)

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