हाथों में पिचकारी लिए होली खेलते बच्चे उन्हें आतंकवादी लगते हैं और पेट पर बम बांधे स्वचालित हथियारों से लैस जेहादी मासूम भटके हुए नौजवान! लेकिन खबरदार जो किसी ने उनकी इस अजीब से सोच पर सवाल उठाये। फ़ौरन से पेश्तर उन्हें “असहिष्णु” घोषित किया जाएगा। “कौन जात हो” पूछने वाले पक्षकारों-कथाकारों की जमात उनके साथ मंच साझा करने से इनकार करेगी, बैठकों-सेमिनार-चर्चा में बुलाये जाने से इनकार कर दिया जाएगा। बाकी छुआछूत तो सिर्फ हिन्दुओं में होता है ये आपको पता ही है!

 

“जो होता है अच्छे के लिए होता है” वाली कहानी सच है या झूठ अगर कोई आज आम आदमी से पूछे तो शायद वो हाँ ही कहेगा। जो कहीं श्रीदेवी संदिग्ध अवस्था में बाथटब में मरी हुई ना पाई गई होती, तो आज लोग हमें पानी बचाने पर ही ज्ञान दे रहे होते। पानी बाथटब में भरने और बहाने से भी बर्बाद जो ये समझाने वालों ने खुद समझ लिया होता तो ना बाथटब में डूबने जैसी घटनाएँ होती, ना दिया मिर्ज़ा को सवा दो लाख के बिल का नोटिस आया होता। जो बिरादरी जौहर पर फिल्म बना कर बेचने के लिए जमीन आसमान एक किये हुए थी, उसे “मौत का तमाशा ना बनायें” कहकर पीड़ित-शोषित भी नहीं खेलना पड़ता।

 

अभिजात्य, खानदानी पक्षकार, फ़िल्मी-राजनैतिक घरानों की राय से अलग सोचने में ही डर नहीं लगता साहेब! डर तो आजकल खुद को “आम आदमी” कहने से भी लगता है। मुफ्त पानी के वायदों के बीच पानी की कमी से जूझता कोई दिल्ली का आम आदमी, वैसे तो किसी खुद को आम आदमी की पार्टी घोषित करने वाले से दुखी हो, मगर पीट मुझ आम आदमी को दे! दिल्ली दूर होना मेरे सुरक्षा की गारंटी तो बिलकुल नहीं, हम उसे “जुमला” मानते हैं।

 

दिल्ली वो जगह है, जहाँ भूस्खलन की घटनाओं जैसा, कूड़े का ढेर गिर जाने से चार लोग दबकर मर जाएँ। वो अपने राज्य के प्रदुषण का इल्जाम पड़ोसी राज्य के खेतों की आग पर डाल सकते हैं। बिहार में होना उनसे सुरक्षित होना हरगिज़ भी नहीं है। बिहारी बेचारा मेट्रोपोलिटन से सुरक्षित रह भी नहीं सकता। कुल दस करोड़ की आबादी में से कहते हैं कि कम से कम तीन करोड़ तो प्रवासी ही है। अपनी मातृभाषा को दिल्ली वाली हिंदी में मिलकर अटपटी सी भाषा बनाते ये ऐसे ना भी दिखें तो होली-छठ पर तो दिखते ही होंगे।

 

ये वो दौर भी तो होता है जब ट्रेन भीड़ से भर जाती है। शहरों की ओर पलायन रोकने के वायदों का क्या हुआ? सड़क-रेल मार्गों में बढ़ोत्तरी से कुछ हुआ भी या नहीं? ऐसे उबाऊ सवाल करना ही क्यों? मुद्दा पानी बचाना ही होना चाहिए और ध्यान कहीं और ना जाए इसलिए इस से सम्बंधित कांफ्रेंस में आये लोगों की स्कॉच-व्हिस्की नीट ही पेश की जाए। पानी की कमी क्या होती है कम से कम एक शाम हर घूँट के साथ महसूस तो हो! आखिर पानी की कमी वो कैसे झेलता है जिसके नाम पर चंदा लेकर आपकी बड़ी समाजसेवी संस्थाओं ने वेश्यावृति पर खर्च दिए?

 

पिछले आम चुनावों में करीब 31% लोगों ने जो एक ही पार्टी विशेष के पक्ष में मतदान करके लोकतंत्र की हत्या की है उसके दूरगामी परिणाम होंगे। गमले से उखाड़ कर फेंक दिया गया पौधा जैसे पानी की कमी से मुरझाता है कुछ वैसा ही हुआ है। लुटियन्स ज़ोन के 1500 के लगभग सरकारी बंगलों से निकाले गए कलाकारों-लेखकों की सृजनशीलता तो मुरझानी ही थी। होली के नजदीक आ जाने पर भी “पानी बचाओ” के लेखों-संदेशों के ना दिखने के लिए कहीं ना कहीं, कहीं ना कहीं, आम आदमी ही जिम्मेदार है।

 

कथेतर साहित्य तो छोड़िये, आम सृजनात्मकता का हाल ये है कि होली का विरोध करती कोई वायरल पोस्ट भी गुणवत्ता के मापदंडों पर नहीं टिकती। मेरे दोस्त ने बताया कि उसके दादाजी के पास इतनी लम्बी लाठी थी वाली तर्ज पर लिखी कथाएँ जैसे ही “मेरे हॉस्टल में रहने वाली लड़की की दोस्त ने बताया…” से शुरू होती है, वैसे ही वो अपने कपोलकल्पित होने की गवाही दे देती हैं। जहाँ तक वीर्य से भरे गुब्बारों का प्रश्न है, एक बार में निकलने वाले एक चम्मच वीर्य को कम से कम पचास बार निकालना, फिर बिना सूखने दिए, येन केन प्रकारेण गुब्बारे में भर डालना निस्संदेह क्रन्तिकारी, बहुत क्रन्तिकारी वैज्ञानिक अविष्कार होगा।

 

जो भी हो देशहित में होना तो यही चाहिए था कि किसी बहाने होली जैसे त्यौहार का विरोध होता। विदेशी कंपनियों के उत्पाद बेचने के वैलेंटाइन डे जैसे अवसरों को प्राथमिकता दी जाती और कुटीर उद्योगों में बनते रंगों को रासयनिक और नुकसानदेह बताकर सीधा बंद किया जाता। ऑर्गनिक या हर्बल का लेबल चिपकाकर कैसे ज्यादा कीमत वसूली जा सकती है ये बताने की क्या जरूरत है। स्किल डेवलपमेंट और कौशल विकास को जगह मिली तो किराये की कलमों से की गई रोजगार का अर्थ नौकरी करने की मेहनत का क्या होगा?

 

जरूरत आ गई है कि विदेशी कलाकार-गायकों के एक घंटे के प्रोग्राम में फैले कचरे की तस्वीरों को कालीन के नीचे धकेला जाए। नव वर्ष की पार्टी पर होने वाली उच्ऋखलता और महिलाओं से अभद्रता की ख़बरों पर बोलने वालों को पोंगापंथी, दकियानूस, पिछड़ा सिद्ध किया जाए। आओ, हाथ मिलाओ साथी! पिचकारी और रंगों से लैस इन बच्चों के खिलाफ एक मुकम्मल जंग ही छेड़ दी जाए!

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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