कई बार जब गीत संगीत की बात होती है तो कुछ पुराने दौर के लोग कहने लगते हैं कि गाने तो हमारे ज़माने में बनते थे ! आजकल के गानों के भी कोई लिरिक्स हैं ? बकवास होता है सब। अब अच्छा और बुरा तो वैसे हर दौर में बनता ही है ? हम भी अपने दौर के बुरे गानों को भूलते जाते हैं, अच्छी चीज़ें याद रखते हैं।

जैसे जब अरबी के साहित्य की बात होती है तो इश्क़ के सात स्तर होते हैं। वही जब अरबी से उर्दू में आया तो वहां भी आपको इसकी झलक दिखेगी। ये सात स्तर हैं : हब, उन्स, इश्क़, अक़ीदत, इबादत, जूनून और मौत। इनको गुलज़ार के लिखे में देखा जा सकता है। थोड़ी पुरानी सी एक फिल्म थी “दिल से” जिसमें शाहरुख़ खान थे और संगीत ए.आर. रहमान ने दिया था। उस फिल्म का एक गाना था “तू ही तू…. तू ही तू सतरंगी रे…”, उसमें इश्क़ के स्तर देखिये। “इश्क़ पर जोर नहीं, हैं ये वो आतिश ग़ालिब, जो लगाए न लगे और बुझाए न बने” वाले ग़ालिब के शेर से ये गाना शुरू होता है। यहाँ चिंगारी फूटी है, महसूस होना शुरू हो गया है।

“कोई ख़्वाब हैं या परछाई है, सतरंगी रे ? सतरंगी रे…..
इस बार बता मुजोर हवा ठहरेगी कहाँ ?”
सवाल यहाँ मन में उठने शुरू हो चुके हैं और ये वो जगह है जहाँ पहली सीढ़ी “हब” यानी कि आकर्षण है। ये मिर्ज़ा ग़ालिब की वो लाइन है जिस से इश्क की आग से तुलना हुई है। इसे जलाना, शुरू करना नामुमकिन है। अपने आप ही शुरू होगी, मगर एक बार शुरू हुई तो फिर बुझेगी भी नहीं।

“आँखों ने कुछ ऐसे छुआ, हल्का हल्का उन्स हुआ,
हल्का हल्का उन्स हुआ, दिल को महसूस हुआ”
गाने के इस हिस्से में पहुँचने पर आपको “उन्स” शब्द ही नजर आ जायेगा। उन्स का मतलब आसक्ति होता है। ये वो जगह है जहाँ कहते हैं कि माशूक की गली के चक्कर लगने शुरू हो जाते हैं। एक बार देखने की, जरा सा छु लेने की ख्वाहिश, वही जिसे infatuation कहते हैं ना ? उसे उन्स कहते हैं।

“तेरी जिस्म की आंच को छूते ही, मेरे सांस सुलगने लगते हैं,
मुझे इश्क़ दिलासे देता हैं, मेरे दर्द बिलखने लगते हैं”
तीसरी सीढ़ी है “इश्क़” यानि वो जिसे हम आम तौर पर प्यार कहते हैं। इश्क़ से पहले जो होता है, वो कोई मज़ेदार नहीं होता। इश्क़ के बाद भी कुछ अच्छा नहीं लगता। प्यार के जिस दर्द का जिक्र होता है वो या तो “इश्क़” से पहले होता है या इश्क के बाद। दिल टूटना इसके बाद होता है, माशूक किसी और पे ध्यान दे तो जलन भी इस से पहले होती है।

“छूती है मुझे सरगोशी से, आँखों में घुली खामोशी से,
मैं फर्श पे सजदे करता हूँ, कुछ होश में कुछ बेहोशी से”
इस पैराग्राफ में मुहब्बत की चौथी और पांचवी सीढ़ी है। यहाँ इश्क़ कुछ कुछ श्रद्धा जैसा हो जाता है और कुछ कुछ इबादत जैसा। इश्क़ का चौथा स्तर अक़ीदत यानि श्रद्धा और पांचवा इबादत होता है। इस स्थिति तक द्वैत है। भक्त अलग है और भगवान अलग है, माशूक अलग है, आशिक़ अलग। इस से आगे बढ़ने पर इश्क़ पागलपन जैसा हो जाता है। यहाँ से आगे बढ़ने को दीवाना होने के नाम से आप पहले से जानते हैं।

“तेरी राहों में उलझा उलझा हूँ, तेरी बाहों में उलझा उलझा,
सुलझाने दे होश मुझे, तेरी चाहों में उलझा हूँ,
मेरा जीना जूनून, मेरा मरना जूनून,
अब इसके सिवा नहीं कोई सुकून”
ये मुहब्बत की छठी सीढ़ी है जिसे “जूनून” कहते हैं। यहाँ होश नहीं रहता। आदमी इश्क और माशूक के बारे में इतना सोच चुका होता है कि खुद को भूलने लगे। यहाँ माशूक से अलग खुद की कल्पना ही नहीं होती। यहाँ मीरा कृष्ण होने लगती है। यहाँ भक्त राधा हो जाता है। यहाँ से शीरीं-फ़रहाद का नाम साथ ही लेना होगा, यहाँ से लैला-मजनू एक हो जाते हैं। यहाँ हीर कौन है राँझा कौन, वो फर्क नहीं रहता, साहिबा कहने से मिर्ज़ा अपने आप हो जाता है।

“मुझे मौत की गोद में सोने दे,
तेरी रूह में जिस्म डुबोने दे”
ये अंत है। या कहिये की शुरुआत है। यहाँ मुहब्बत की आखरी सीढ़ी है, जिसे “मौत” कहते हैं। इश्क़ के किस्से सुनने सुनाने यहाँ के बाद ही शुरू होते हैं। इसलिए शुरुआत भी कह सकते हैं। बाकी अरबी साहित्य के इश्क़ की सात सीढ़ियों में से ये आखरी स्तर है। इसे उर्दू में अक्सर फ़ना कहते हैं, भक्ति में कैवल्य, अध्यात्म में ये अद्वैत है।

यहाँ प्रेमी का “अहं” का भाव तिरोहित होता है। सूफ़ी कई बार गाते गाते जब नाचने-झूमने लगते हैं, जिसे ज़द आना कहते हैं वहां ऐसा ही कुछ महसूस होता है। योगियों में जिसे ध्यान लगना कहा जाता है वो इसका शुरूआती स्तर है। निर्विकल्प समाधी ऐसी स्थिति को कहते हैं जहाँ जूनून सी हालत होती है। चाहे किसी लड़की से प्यार हुआ हो या भक्ति का मामला हो अपने आप को खोकर आगे बढ़ने की कहानी एक ऐसे गाने में है जिसे आम तौर पर आप संगीत या गुलजार के नाम पे सुन लेते हैं।

इसे ना जानने के नुकसान भी हैं। ऐसा नुकसान एक बार चेतन भगत को झेलना पड़ा था। उन्होंने एक किसी इंटरव्यू में गुलजार से बात करते वक्त जरा मजाक उड़ाते से लहजे में कह दिया कि मुझे आपका “कजरा रे” वाला गाना पसंद है। जिस टोन में उन्होंने “कजरा रे” कहा वो गुलजार को पसंद नहीं आया। उन्होंने पूछा, साहब फिर ये भी बता दो कि उसी गाने की लाइन, “तेरी बातों में किमाम की खुशबु है, तेरा आना भी गर्मियों की लू है” का मतलब क्या होगा ? चेतन भगत जब जवाब में चुप्पी साधे रहे तो गुलज़ार बोले, मियां उन्हीं चीज़ों की बात करो जिनके बारे में पता हो। जो जानते नहीं उनके बारे में चुप रहना चाहिए।

(इस विषय पर और पढ़ने के लिए Kaal-Chiron का ब्लॉग देखें)

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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