ग्रीक मिथकों के मुताबिक एक बार ग्रीक देवता डायोनाइसस समुद्र में सफ़र कर रहे थे जब समुद्री लुटेरों ने उन्हें पकड़ लिया। लुटेरों ने उनका हुलिया देखकर समझा कि ये कोई राजपरिवार का सदस्य है। फिरौती में बड़ी रकम मिलेगी ये सोचकर उन्होंने डायोनाइसस को जहाज के मस्तूल से बाँध दिया और तुर्की की ओर रवाना हुए। लुटेरों की नजर हटते ही देवता डायोनाइसस के सारे बंधन खुल गए और उन्होंने अपनी बांसुरी बजानी शुरू कर दी।

 

उनके बांसुरी बजाने भर की देर थी कि सभी ओर से लताओं ने निकल कर जहाज को लपेट लिया और सारे पतवार विशालकाय साँपों में बदल गए। घबराकर लुटेरे जहाज से समुद्र में कूद गए और डूबने लगे। उन्हें डूबता देखकर डायोनाइसस को लुटेरों पर दया आई और उन्होंने लुटेरों को डॉलफिन में बदल जाने और भविष्य में जहाजियों को रास्ता दिखाने वाले होने का वरदान दिया। जहाजी डॉलफिन को देखकर इसलिए खुश होते हैं, क्योंकि डॉलफिन दिखने का मतलब है कि किनारा नजदीक है। (1)

 

हालाँकि भारतीय किस्से-कहानियों में मुझे अभी तक डॉलफिन के किस्से नहीं मिले लेकिन भारत में गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोशी जैसी नदियों में भी डॉलफिन की एक प्रजाति पायी जाती हैं। सिटेशियन परिवार के इस जीव को मछली नहीं, स्तनपायी जीव माना जाता है। बिहार में बहुतायत में मिलने के कारण इसका स्थानीय नाम “सोंस” भी है। करीब दस-दस मिनट पर इसे सांस लेने के लिए पानी से बाहर आना होता है, इसलिए गंगा पार करते समय ये आसानी से दिख जाती थी।

अतुला गुप्ता की ली हुई तस्वीर - विक्रमशिला गंगा डॉलफिन अभयारण्य, बिहार से
अतुला गुप्ता की ली हुई तस्वीर – विक्रमशिला गंगा डॉलफिन अभयारण्य, बिहार से (2)

अब इसे देखना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि भागलपुर और पटना में गंगा पुल से पार की जाने लगी है और स्टीमर / नाव की जरूरत नहीं रही। शिकार और प्रदुषण की वजह से इनकी गिनती भी बहुत कम हो गयी है। भारत सरकार ने राष्ट्रीय पशु बाघ की तरह नदी की डॉलफिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित कर दिया है। अब जब इसके शिकार पर बाघ के शिकार जितनी ही सजा होने लगी है तो इसके शिकार में कमी आई है। पहले तेल और मछलियों का चारा बनाने के लिए इसे मारा जाता था।

 

लम्बे चोंच जैसे मुंह वाली गंगा डॉलफिन के दांत शिकार (मुख्यतः छोटी मछलियाँ) पकड़ने में काम आते हैं। वो चबा नहीं सकती और भोजन सीधा निगलती है। उसकी आँख का रेटिना इतना विकसित नहीं होता कि वो देख सके। ज्यादा से ज्यादा उसे रौशनी होने और न होने का पता चलता है। विकास के क्रम में ये सबसे पुराने जीवों में से आती है। इसमें मादा की लम्बाई अधिकतर नर से ज्यादा होती है (नर के सवा दो मीटर के मुकाबले मादा ढाई मीटर तक बढ़ती है)।

 

इस जीव पर शोध करने के लिए बिहार के प्रोफेसर आर.के. सिन्हा को “डॉलफिन मैन ऑफ़ इंडिया” भी बुलाया जाता है। पर्यावरण सोंस, या गंगा डॉलफिन के अनुकूल रहे, नदियों की सफाई हो, इस दिशा में प्रोफेसर सिन्हा करीब चार दशक (38 साल से ज्यादा) से काम कर रहे हैं। बिहार के गंगा डॉलफिन को बचाने और उसपर शोध करने के लिए वो अनगिनत राष्ट्रीय / अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मान भी पा चुके हैं। आज यानि 5 अक्टूबर को गंगा डॉलफिन दिवस (अंतर्राष्ट्रीय डॉलफिन दिवस 14 अप्रैल और एक और 24 अक्टूबर को डब्ल्यू.डब्ल्यू.ऍफ़ की तरफ से) भी मनाया जाता है।

नदियों में पायी जाने वाली डॉलफिन की सिर्फ चार प्रजातियाँ होती हैं। गंगा और ब्रह्मपुत्र में पाई जाने वाली प्रजाति के अलावा एक चीन की यांग्शी नदी में पाई जाती है, दूसरी दक्षिण अमेरिका में बहने वाली अमेज़न नदी में होती है और तीसरी पाकिस्तान तक बहकर जाने वाली सिन्धु नदी में होती है। इनमें से इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान वाले हिस्से में जो नदी की डॉलफिन होती थी, वो करीब करीब ख़त्म हो चुकी है। गंगा के डॉलफिन, सोंस को बचाए रखने के प्रयास जारी हैं। विक्रमशिला गंगा डॉलफिन अभयारण्य नाम से भागलपुर के पास इनके लिए संरक्षित क्षेत्र भी बनाया गया है।

 

बिहार में अब गंगा डॉलफिन पर रिसर्च के लिए भी एक केंद्र बनाया गया है। उम्मीद की जा सकती है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को दिखाने के लिए इस जीव को बचाए रख सकेंगे!

  1. ग्रीक मिथक का स्रोत “द हिन्दू” का आलेख
  2. तस्वीर का स्रोत : इंडियाज़ इंडेंजर्ड की साईट
  3. विडियो “पटना शॉट्स” से
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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