“फ्रीडम राइटर्स” कोई उतनी ज्यादा प्रसिद्ध फिल्म नहीं है। मतलब “मैट्रिक्स” या “लार्ड ऑफ़ द रिंग्स” जैसा इसका नाम ज्यादातर लोगों ने नहीं सुना होगा। फिल्म की कहानी एक शिक्षक एरिन ग्रुवेल्ल की लिखी किताब “द फ्रीडम राइटर्स डायरी” पर आधारित है। उन्होंने लोस लोस एंजेल्स, कैलिफ़ोर्निया के एक स्कूल वुडरो विल्सन हाई स्कूल पर ये किताब लिखी थी। सामाजिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों ने जब 1961 में यू.एस. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के आधार पर अरक्षित इलाकों, स्कूलों, बसों जैसी व्यवस्था को ख़त्म किया था ये उस दौर पर बनी है। कहानी पुरानी है, फिल्म उतनी पुरानी नहीं, ये 2007 में ही आई थी।

 

एक स्कूल जो कि हाल तक पढ़ाई के लिए प्रसिद्ध था उसमें पड़ोस के अपराध ग्रस्त इलाकों के, कई विस्थापित-रिफ्यूजी बच्चों को शामिल कर दिया जाता है। स्कूल प्रशासन मानसिक रूप से ऐसे बच्चों के लिए तैयार नहीं होता तो स्कूल ही गैंग वॉर का अखाड़ा बन जाता है। इसी स्कूल में नायिका जो कि किसी बड़े प्रसिद्ध से “समाजसेवी” की बेटी है, वो पढ़ाने आ जाती है। बाप को भाषण और “समाजसेवा” से मिलती प्रसिद्धि-पैसे तो पसंद थे, मगर बेटी ही ऐसी जगह काम करने लगे ये नहीं जंचता। उधर नायिका की नयी नयी शादी हुई होती है और पत्नी पूरा ही समय स्कूल को दे ये उसके पति को भी पसंद नहीं आ रहा होता।

 

ऐसे ही द्वंदों से जूझती नायिका को क्लास भी अजीब सी मिलती है। उन्हें पढ़ाने के लिए स्कूल प्रशासन किताबें नहीं देना चाहता क्योंकि बच्चे किताबें फाड़ देंगे, या गन्दी कर देंगे। ऐसे ही माहौल में काम करती नायिका की क्लास में एक दिन एक बच्चा किसी दुसरे समुदाय के बच्चे का भद्दा सा कार्टून बनाता है और वो कार्टून नायिका, यानि क्लासटीचर के हाथ आता है। उस तस्वीर को दिखा कर वो बच्चों को बताती है कि होलोकॉस्ट (Holocaust) ऐसी ही तस्वीरों से शुरू हुआ था। लाखों यहूदियों की हत्या वाले होलोकॉस्ट के नाम से किशोर वय के छात्रों को सहमना चाहिए था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता।

 

जैसे जैसे क्लासटीचर बच्चों को होलोकॉस्ट के बारे में बताती जाती है, वैसे वैसे उल्टा उसे ही समझ में आता है कि यहाँ कोई एक भी ऐसा नहीं जिसने होलोकॉस्ट झेल ना रखा हो। एक भी छात्र ऐसा नहीं था जिसका कोई परिचित, कोई दोस्त-रिश्तेदार गैंग वॉर में मारा ना गया हो। कोई भी ऐसा नहीं था जिसके दोस्त-रिश्तेदार जेल में ना हों। बहुत कम ऐसे थे जो लम्बे समय सुधार गृह, रिफ्यूजी कैंप में नहीं रह चुके थे। अब शिक्षिका की समझ में आता है कि होलोकॉस्ट की जिन कल्पनाओं से वो सिहर जाती थी, एक कार्टून से उसकी भावनाएं आहत हो रही थी, वो सब तो ये “बच्चे” झेल चुके थे। उनके लिए ये रोज का जीवन था।

 

किस्मत से इस फिल्म की नायिका कोई मिशनरी नहीं थी, वो सोल हार्वेस्टिंग के उद्देश्य से नहीं निकली होती। उसकी लगातार मेहनत से बच्चे कैसे सीखते हैं ये फिल्म उसकी कहानी है। वो बच्चों को डायरी लिखना सिखा देती है। बच्चे डायरी में जो चाहे वो लिख सकते थे, अपनी पसंद की कोई कविता, कोई कहानी, खुद के संस्मरण, जो भी मन करे। जैसे जैसे ये डायरी आगे बढ़ती है वैसे वैसे फिल्म भी चलती रहती है। चंदे और ओवरटाइम से जुटाई किताबें आती हैं, होलोकॉस्ट झेल कर बचे लोगों से मुलाकात होती है। कई बच्चों की लिखी डायरी के छपने का नाम “फ्रीडम राइटर्स” है। बड़े बम धमाकों नहीं, व्यापक जन आन्दोलनों से भी नहीं, सिर्फ अपने लिखे से उन किशोर वय के छात्रों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी थी।

 

कभी फुर्सत मिले तो देखिएगा। इस से समझ आएगा कि मैथिलि, या फिर कोंकणी जैसी भाषाओँ की लड़ाई बड़ी लड़ाई क्यों होती है। सरकारी शिक्षकों कि तनख्वाह के सरकारी दर को देखिएगा तो भी दिख जायेगा कि संस्कृत के शिक्षक की तनख्वाह, अंग्रेजी, गणित या भूगोल जैसे विषयों को पढ़ाने वाले से कम होती है। सत्ता में बैठे लोगों और विदेशी फण्ड पर पलने वाले बुद्धिपिशाचों के इस सदियों के दमन के बाद भी ब्राह्मण क्यों संस्कृत में लिखे को पढ़ने पर तुला होता है ? कोई आर्थिक लाभ ही नहीं देती तो भी ये भाषा जिन्दा कैसे बची रह गई ? कौन सी प्रेरणा होती है जो बच्चे अपने आप इसे सीख लेते हैं, बूढ़े इसे सिखाने में लगे रहते हैं ?

 

कम से कम दो सौ साल का तो इनके दमन का लिखित इतिहास है। जब हत्याएं की जा रही थी, लोगों को काला पानी भेजा जा रहा था, बाकायदा कानून बना कर हमें क्रिमिनल ट्राइब्स घोषित किया जा रहा था तो कराह इन्ही भाषाओँ में निकली थी। जब फ्रांसिस ज़ेवियर के साथ उसका शासन तंत्र, हमारे लिए नित नयी अमानुषिक यातनाएं इजाद कर रहा था तो बातें इन्हीं भाषाओँ में होती थी। शिलालेखों, मूर्तियों को तोड़ा गया तो विरोध लिख कर बचाया गया, लिखे को जलाया गया तो लोगों ने जबानी याद कर लिया। याद करने वालों को क़त्ल करना शुरू हुआ तो भागकर, आधा अधूरा, लोक संस्कृति में डाल दिया गया।

 

बुद्धिपिशाचों को फ्रीडम राइटर्स से दिक्कत होनी तो स्वाभाविक है। आप खून चूसने वाले डीएनए से युक्त हैं, हम सदियों के वंचित-शोषित। आपकी कुचलने की कोशिशें आपका स्वभाव है, विद्रोह हमारी परंपरा है, लगे रहिये।

 

क़रीब है यारो रोज़-ए-महशर छुपेगा कुश्तों का ख़ून क्यूँकर
जो चुप रहेगी ज़बान-ए-ख़ंजर लहू पुकारेगा आस्तीं का
(- अमीर मीनाई)

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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