शब्दों के मतलब को धीमे-धीमे से बदल कर नैरेटिव बिल्ड करना देखना हो तो सबसे पहले Religion शब्द को देखिये। इसकी उत्पत्ति religare और religio जैसे लैटिन शब्दों से हुई है। इनका मतलब होता है बंधन, बांधना, या मजबूरी जैसा काम। अब जब काफी पहले आजादी गिरोहों ने दुसरे देशों में ऐसी ही आजादी की मांग शुरू की तो उन्होंने रिलिजन को बाँधने वाला बता कर उस से आजादी की मांग की। इसी को आयातित विचारधारा जब भारत में लाइ तो बड़ी चतुराई से धर्म का अनुवाद रिलिजन (religion) कर लिया। एक मामूली से शब्द के अनुवाद में बेईमानी की छूट देकर क्या गलती हुई वो समझना आसान है।

 

धर्म का उद्देश्य मुक्ति यानि मोक्ष होता है। किसी भी तरह से ये बंधन में डालता ही नहीं। लेकिन इस “धर्म” का अनुवाद जब कपटी कॉमरेड “रिलिजन” कर डालते हैं तो नारेबाज गिरोहों के लिए सुविधा हो जाती है। भूमिका पहले ही एक शब्द ने बाँध रखी है, आगे उन्हें सिर्फ मनचाही कथाएँ गढ़नी हैं।

 

पिछले कुछ सालों में इसका इस्तेमाल देखना है तो युद्ध के तरीकों को भी समझना होगा। लड़ने के लिए तलवार और ढाल दोनों चाहिए। तलवार के प्रहार के तुरंत बाद ढाल के पीछे छुप जाया जाता है। नारेबाज गिरोहों के लिए सबसे आसान होता है आपके पूज्यों के पीछे छुप जाना। जैसे गजनवी की फ़ौजें गाय के पीछे थी वैसे ही आज नारीवाद की ढाल के पीछे आयातित विचारधारा के आतातायी छुपते हैं। ये क्रम आपको हर बार नजर आ जाएगा। शुरू में चाहे किसी मुद्दे से हमला किया जाए, बचाव के लिए फ़ौरन नारीवाद का इस्तेमाल किया जाएगा।

 

इस नैरेटिव का बिल्ड होना आपको सत्तर के दशक में दिख जाएगा। सन 1968 के सितम्बर में मिस अमेरिका की प्रतियोगिता हो रही थी। इस प्रतियोगिता में नारीवादियों ने नारी शरीर के व्यवसायीकरण के विरोध में जो विरोध प्रदर्शन किया उसे मिस अमेरिका 1969 का प्रोटेस्ट कहते हैं। इन विरोधों में न्यू यॉर्क रेडिकल वीमेन नाम की संस्था ने फ्रीडम ट्रैश कैन (कूड़े दान) बनाया जिसमें नारी शरीर का व्यावसायिक इस्तेमाल दर्शाने वाले उत्पादों को फेंकना था। इसमें नकली भौं, हाई हील वाले चप्पल-जूते से लेकर प्लेबॉय-कांस्मोपोलीटीअन जैसी पत्रिकाएं भी थी। आज इसे “ब्रा बर्निंग” के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसमें कोई ब्रा नहीं जलाए गए थे।

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तो फिर असल में क्या हुआ था ? दरअसल सुरक्षा को किसी तरह धता बता कर, कॉन्टेस्ट के हाल के अन्दर चार महिलाएं अपने विरोध का बड़ा सा बैनर लेकर पहुँच गई थी। वहां खड़े होने के कारण वो लोग अखबार वालों की नजर में आई और इस घटना को कवरेज मिल गई। ध्यान रहे कि इसी कार्यक्रम के विरोध में बिलकुल इसके पड़ोस में, रिट्ज कार्लटन होटल में, एक दूसरा कार्यक्रम हो रहा था जिसका नाम था मिस ब्लैक अमेरिका। अश्वेत महिलाओं के इस कार्यक्रम को कोई कवरेज नहीं मिली। बैनर दिखाए जाने को जिस महिला पत्रकार ने कवर किया (लिंडसी वैन गेल्डर), उसने इसका साम्य वियतनाम युद्ध के विरोध से किया।

 

इस किस्म की तुलना को अंग्रेजी साहित्य में ट्रोप (trope) कहते हैं, जब एक घटना की तुलना दूसरी से हो। वियतनाम युद्ध के विरोधियों ने अपने ड्राफ्ट कार्ड जलाए थे इसी लिए साम्य की वजह से “ब्रा बर्निंग” का चिपकने वाला जुमला प्रसिद्ध किया गया। नारीवादी आंदोलनों की पहचान बताया जाने वाला ये कृत्य, जब से प्रसिद्ध है तब ये हुआ ही नहीं था। जब आपके पास प्रचार तंत्र के हथियार हों तो हमले के लिए ऐसे ही प्रक्षेपास्त्र इस्तेमाल किये जाते हैं। अगर आप अपनी शिक्षा किताबों से लेने के बदले सोशल इंजीनियरिंग के महारथियों से ले रहे हैं, तो भी ऐसा ही होगा। इन्टरनेट पर जानकारी मुफ्त उपलब्ध है। कॉपी पेस्ट कर के अपने पसंद के विषयों की जानकारी एक फाइल में इकठ्ठा करना सीखिए।

 

बाकी अगर सोशल इंजीनियरिंग जुमला समझ ना आया हो तो शुरुआत उसी को ढूँढने से कीजिये। वैसे कोई परोस कर अपने हाथ से आपके मूंह में निवाला डाल दे, इसका इन्तजार भी एक अच्छा विकल्प है। वो भी कर सकते हैं।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

1 COMMENT

  1. धन्यावाद, अच्छी पोस्ट, अच्छे विचारों के साथ।

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