चार लोग सुनेंगे तो जाने क्या कहेंगे! ये जैसे और बहुत से लोगों के लिए एक बड़ा सवाल होता है वैसे ही सूबेदार पासवान के लिए भी था। मजदूरी से जीवनयापन करने वाले सूबेदार पासवान की तीन बेटियों और दो बेटों में पुन्ती चौथे नंबर पर थी। गाँव से करीब 15 किलोमीटर दूर मौजूद मैदान में फुटबॉल की प्रैक्टिस होती थी और मौका निकाल के पुन्ती अपनी साइकिल उठाकर रोज प्रैक्टिस करने भागती। जान पहचान के ही किसी ने सूबेदार पासवान को बता दिया था कि लड़कियों के लिए फुटबॉल जैसा भाग दौड़ वाला खेल ठीक नहीं।

कुछ तो बच्ची के भविष्य और बीमारी की चिंता में, और कुछ लोगों के बातें बनाने के कारण, सूबेदार पासवान की तरफ से पुन्ती के खेलने जाने पर मनाही थी। उसके गायब होने को अक्सर पुन्ती की माँ और बड़े भाई मिलकर, किसी काम से भेजा है के बहाने में ढकते। पटना के इन्हीं इलाकों में प्रतिमा गरीब बच्चियों को फुटबॉल सिखाती हैं। पिछले तीन साल में उन्होंने करीब एक हज़ार बच्चियों को फुटबॉल खेलना सिखा दिया है। जैसे ही पुन्ती की माँ को प्रतिमा और उनके गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच (GGMVM) का पता चला, उन्होंने बेटी को वहां जाने को कहा।

प्रतिमा कुमारी के साथ पुन्ती (मैडल लेते हुए)
प्रतिमा कुमारी के साथ पुन्ती (मैडल लेते हुए)


“तुम्हारे पिताजी से मैं बात कर लूंगी, तुम अपने खेल पर ध्यान दो”, उन्होंने अपनी बेटी को सिखाया था। प्रतिमा और उनकी संस्था ने कैरिटास सुस्सी (स्विट्ज़रलैंड की संस्था) के साथ मिलकर कुछ फुटबॉल मैच आयोजित किये। दसवीं की छात्र पुन्ती की टीम का पहला मैच ड्रा रहा। बराबरी पर जाने के वाबजूद हर खिलाड़ी को एक मैडल दिया गया था और मैडल दिखाने की ख़ुशी में पुन्ती भूल गई कि उसपर खेलने की मनाही है! प्रतिमा ने भी उनके पिता को समझाने का प्रयास किया, लेकिन बेटी के मैडल जीतकर आने पर वो पहले ही खुश थे।

पुन्ती को अब खेलने जाने की छूट है। वो अरवल जैसे बाहर के जिलों में भी खेलने जाती है और हाल में ही वर्ल्ड कप शुरू होने के मौके पर आयोजित “फुटबॉल फॉर इक्वलिटी” के टूर्नामेंट में भी भाग लेने आई। खेल के अभ्यास में कुछ बदमाशों ने लड़कियों को तंग करने की भी कोशिश की थी, लेकिन पुन्ती और उसके साथियों ने उल्टा उन्हें ही मार भगाया, ऊपर से पुलिस में उनकी शिकायत भी की। ऐसे आयोजनों और खेलों का सीधा असर लड़कियों के स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण पर भी पड़ता है। प्रतिमा और उनकी संस्था के काम से इलाके के बाल विवाह पर काफी असर हुआ है।

उनके पास स्रोत न के बराबर हैं। प्रतिमा को उम्मीद है कि शायद सरकारी मदद मिल जाए या बड़े संगठनों का सहयोग हो तो उनके पास लड़कियों के लिए प्रशिक्षण की ज्यादा सुविधाएँ, खेल के यूनिफार्म, जूते इत्यादि जुट पाएंगे। फिलहाल जो है, उतने में ही उनका काम जारी है।

SHARE
Previous articleपंचदशी: विद्यारण्य स्वामी
Next articleअम्बुबाची का मेला
आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here