हो सकता है आपने पायड पाइपर ऑफ़ हमेलिन की कहानी सुनी हो। सत्रहवीं शताब्दी के अंत की किन्ही जर्मन कथाओं में इस कहानी के उस रूप का उदय हुआ था, जिस तौर पर इसे आज जानते हैं। यानी पूरा शहर किन्ही बड़े चूहों से ग्रस्त, कोई इलाज काम नहीं करता तो फिर आखिर में एक बांसुरी-वादक आकर कहता है मैं दिला दूं छुटकारा ? शहर के लोग राजी हो जाते हैं, बांसुरी वाला बाँसुली बजाते बजाते चूहों को एक नदी में ले जा कर कुदा देता है। अब जब पैसे देने की बारी आती है तो शहर का मेयर मुकर जाता है, इस बार बांसुरी वादक जो धुन बजाता है, शहर के सारे बच्चे उसके पीछे चल पड़ते हैं। शहर के सारे बच्चों को लेकर वो लापता हो गया और सब मेयर की बेवकूफी पर सर धुनते रह गए।

 

ये कहानी पूरी तरह कपोल कल्पना नहीं है, कोई भी लोककथा ऐसे बनती भी नहीं है। ऐसी ही एक मिलती जुलती सी 1780 के आस पास की ऑस्ट्रेलिया की घटना थी। उस वक्त ऑस्ट्रेलिया में बाहर से लोग आकर बसना शुरू हो गए थे। ऐसे ही लोगों में से एक थॉमस ऑस्टिन नाम के अँगरेज़ भी थे, ब्रिटेन से वो अपने लिए एक नयी जिन्दगी तलाशते आये थे। अब घर पे तो अपना ज्यादातर खाली समय थॉमस ऑस्टिन मुर्गियों-खरगोशों के शिकार में बिताते थे लेकिन यहाँ ऐसा कोई विकल्प था ही नहीं। तो उन्होंने अपने भतीजे को चिट्ठी लिखी और कुछ खरगोश भेज देने कहा। भतीजे ने जो 24 खरगोश रवाना किये वो दक्षिण विक्टोरिया के उनके बरवोन पार्क में आये। ऑस्ट्रेलिया में पहले भी खरगोश लाकर बसाने की कोशिश हुई थी, मगर कोई कामयाब नहीं हुई। आधिकारिक तौर पर 1788 के पहले जहाजों के बेड़े1 में वो आये और जीवित बस पाए। तस्मानिया के इलाके के अंग्रेज़ बड़े खुश हुए, अब घर जैसा एक पशु उन्हें शिकार के लिए उपलब्ध था, थोडा घर जैसा माहौल लगने लगा।

 

उनकी देखा देखी उनके और मित्रों में भी अपने अपने फार्म पर खरगोश मंगवा लिए, शुरुआत में थॉमस ऑस्टिन को इस काम के लिए काफी प्रशंसा भी मिली। सात साल के अन्दर अन्दर सिर्फ थॉमस ऑस्टिन की जमीन पर 14253 खरगोशों का शिकार हो चुका था। शिकारी सिर्फ तीन घंटे में 1200 खरगोश मारने का रिकॉर्ड बना चुके थे। इंग्लैंड में किसी ने ऐसे भारी खरगोशों की पैदावार की कल्पना भी नहीं की था। खरगोश मारने वाले शिकारियों की नयी नस्ल पनपी, अब ये भी एक रोजगार था। किसी स्तनपायी जीव का ऐसा बढ़ना कभी देखा नहीं गया था इसी लिए अंग्रेजी का जुमला Breeding like rabbits भी इसी से जन्मा।

 

ऐसे तेज़ पैदावार की एक वजह तो ये थी कि हलके, कम जाड़े के मौसम के कारण इंग्लैंड के खरगोश उतनी तेजी से बढ़ते नहीं थे, ऑस्ट्रेलिया में उन्हें मौसम पूरे साल छूट दे देता था। ऊपर से पूरे इलाके में खेती शुरू ही हो रही थी, जंगल के बदले खेतों का होना खरगोशों को प्रचुर आहार उपलब्ध करवा देता था। थोड़े ही सालों में इसका नतीजा क्या हुआ वो समझना है तो थोडा सा आगे 1850 में चलते हैं, इस साल ग्लेन अल्वी इलाके के किसी जॉन रोबर्टसन की जमीनों पर चोरी छुपे खरगोश मारने के लिए दस पोंड की सजा हुई। थोड़े ही साल बाद खुद रोबर्टसन के सुपुत्र ने अपने खेतों को खरगोश मुक्त करवाने के लिए 5000 पोंड खर्च किये। अब अँगरेज़ जेंटलमैन को घर जैसा शिकार का माहौल देने के बदले ये विनाशकारी असर दिखने लगा। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स बॉर्डर, क्वीन्स लैंड, पश्चमी और उत्तरी इलाकों में भी ये फैलने लगे। खरगोशों के इस प्रकोप को “ग्रे ब्लैंकेट” कहा जाता है। इस दौर में शिकारी कई बार खरगोश अपने साथ जिन्दा भी पकड़ कर ले जाते। आस पास के किसान मना करते भी तो वो कहते, रईसों के शौक से किसानों को क्या लेना देना ? किसान हमेशा रईसों के शौक में कबाब में हड्डी बनते रहते हैं। किसानों की समझदार सलाह अंग्रेज़ रईसजादों के शौक की बलि चढ़ गया।

 

बाड़ लगा कर भी इन्हें रोका नहीं जा सकता था, क्योंकि फिर ये सुरंगें बनाते। आम किसान के लिए इन्हें रोकना नामुमकिन हो चला। कई लोग अब पेशेवर पेस्ट कण्ट्रोल, ख़ास खरगोश शिकारी, रब्बिटर्स की मदद लेने लगे। इन पेशेवरों के पास अपना खुद का एजेंडा होता था। अगर सभी खरगोशों को मार दिया तो अगली बार धंधा कैसे मिलेगा ? तो खरगोशमारों के हाथ जो गर्भवती मादा लगती, उसे वो जिन्दा छोड़ देते। या एक दो ऐसे ही जाने देते। इस वक्त तक सरकार खरगोशमारों को बुलाने पे सब्सिडी देती थी। सौ साल बाद यानि 1888 में न्यू साउथ वेल्स के जमीनों के मंत्री ने खरगोशमार पर दी जाने वाली इस सुब्सिदी को बंद करने का एलान किया। उनके धूर्ततापूर्ण रवैये का अब सरकारों को भी पता था। फिर एक म्यक्सोमटोसिस नाम की बीमारी फैली और किसानों को कुछ निजात मिली। लेकिन ये बीमारी ऑस्ट्रेलिया के अन्य पशुओं को भी हो जाती थी। ऊपर से थोड़े ही साल में खरगोश इस से इम्यून हो गए।

 

ऑस्ट्रेलिया के किसानों को आज जिस खरगोश नाम की समस्या का सामना करना पड़ रहा है, वो मुट्ठी भर स्वार्थी अंग्रेजों ने पैदा की थी। वो 200 साल से इस समस्या से जूझ ही रहे हैं। किसान इस समस्या से होने वाले नुकसान के कारण कई घंटे ज्यादा परिश्रम करता है। बिमारी ख़त्म नहीं होती।

 

ये बिलकुल बिहार की बाढ़ की समस्या जैसा ही है। दो ढाई सौ साल पीछे जा के देखेंगे तो बाढ़ नहीं आती थी ऐसा नहीं है। लेकिन तब इसे प्रकोप के रूप में नहीं वरदान के तौर पर देखा जाता था। पोखरों तालाबों में मछलियाँ अपने आप भर जाती थी। जब बाढ़ का पानी लौटता तो जमीन और उपजाऊ होती। आज बाढ़ एक समस्या है, उस से बड़ी समस्या कि अगर बाढ़ राहत का पैसा रोक दिया जाए तो कई चुनावी पार्टियों की लालटेन का तेल ही सूख जायेगा। कभी जातिवाद, कभी दंगे, कभी सीधा सरकारी दमन इस्तेमाल कर के बाढ़ राहत का आना जारी रखा जाता है। सिर्फ 2016 में “बाढ़ राहत” के दौरान कितने लोग सरकारी गोलियों से मारे गए हैं उसके लिए तो पिछली जुलाई के अखबार ही काफी हैं। कई एन.जी.ओ. कई तथाकथित संस्थान, और कई कागजों पर बनी राजनैतिक पार्टियों का पेट बाढ़ राहत की बन्दरबाँट पर पलता है। अगर ये समस्या ही ना रही तो वो खायेंगे क्या ?

 

बस यही सबसे बड़ी वजह है कि बाढ़ राहत की बातें तो होती हैं, लेकिन पीड़ित की समस्या नहीं सुलझती। बिहार की बाढ़ को समाजवाद की छूत लग गयी है।

 

 

#लेख 1

https://en.wikipedia.org/wiki/First_Fleet

https://en.wikipedia.org/wiki/Rabbits_in_Australia

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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