तुम बिलकुल मेरे जैसे हो,
अब तक कहाँ छुपे थे भाई ?
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“मुझे एनीमेशन पसंद है, बचपन से कार्टून का शौक छूटा ही नहीं !”

“अहो भाग्य ! तुम जैसे पुरातनपंथी को कार्टून शब्द भी पता था ? हम तो समझे तुम बचपन से ही मिथकों में लोटते रहे हो |”

“अरे नहीं, वो तो बाकी शौकों में से एक शौक है बस | कार्टून इसलिए पसंद आने लगे थे क्योंकि भारत के टीवी की शुरुआत के दौर में डक टेल्स आया करते | और हम सोचते ये एक ही जैसे बत्तख को ह्युई, ल्युई, ड्युई और मिनी कैसे बना देते हैं ? मतलब बत्तखों में सिर्फ़ भौं का डिजाईन बदल कर नर से मादा !”

“कला इसी को तो कहते हैं ! रंगों का संयोजन, और एक आध आड़ी टेढ़ी लकीरें बस | मगर तुम्हें बड़े होने के बाद कैसे रह गया कार्टून का शौक ? वो तो किसी ‘पप्पू’ का शौक है, ऐसा तो मानते ही होगे तुम ?”

“ओह वो शौक तो विडियो गेम्स की वजह से रह गया | उसी ज़माने में विडियो गेम्स भी भारत में आये थे | हम लोगों को बड़ी मुश्किल से एक घंटे रविवार को बिजली रहने पर वीडियो गेम खेलने की इजाजत मिलती थी | बाद में विडियो गेम की जगह प्ले स्टेशन ने ले ली |”

“मियां इन चीज़ों का नाम भी पता था तुम्हें ? हाथ ना कांपे तुम्हारे जॉय स्टिक पकड़ने में ? वो अलोक नाथ वाले ‘संस्कार’ तो आड़े आये ही होंगे ?”

“हंस लो साथी ! मौका भी है और दस्तूर भी है तुम्हारा | सिरियस बातों पर हँसना और चुटकुले को नारी विरोधी कहना तो खैर तुम्हारी आदत ही है | खैर अभी जो गेम पसंद है उसके बारे में जान कर शायद तुम्हें और मज़ा आने वाला है |”

“ऐसा क्या ? बता ही डालो फिर !”

“Assasins Creed कहते हैं उसे | उसमें थोड़ा थोड़ा आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस इस्तेमाल हुआ है | हर बार खेल बदल जाता है तो कंप्यूटर से जीत पाना उतना आसान नहीं होता | महीनों लग जाते हैं | गेम को जीतने के लिए एक जरूरी सी चीज़ होती है की खेलने वाला जो किरदार निभा रहा हो उसे “लीप ऑफ़ फेथ” लगानी होती है | वही अब्रह्मिक धर्मों वाली छलांग जिसमे भरोसा कर लिया जाता है कि मेरा विश्वास सच्चा होगा तो मेरे भगवान मुझे बचा लेंगे |”

“लाहौल पढ़ो मियां ! तुम लीप ऑफ़ फेथ लगाते रहे हो | चलो आभासी दुनियां का ही सही ! मगर लगाया तो |”

“अरे इसमें अब क्या इतना हैरान होना ? बच्चा भी जब ऊंचाई से माँ-बाप की गोद की तरफ लपकता है तो लीप ऑफ़ फेथ ही तो लगा रहा होता है ना |”

“मगर तुम कौन से बच्चे थे जो तुम्हें ये पसंद आ गया ?”

“सब लगाते हैं भाई ! अब अपने #NITShrinagar वाले बच्चों को ही ले लो ना ! ऐसा थोड़ी है कि वादी में हालात आज बिगड़े हैं | वहां तो हर जुम्मे की नमाज़ पर पाकिस्तानी झंडा फहराना और हिन्दुस्तानी तिरंगा जलाना आम बात है | आन की आन में भीड़ आकर फौज पर पुलिस पर पथराव करती है | कोई एक दो चार दस नहीं पूरे 2000000-2200000 हिन्दुओं को तो वो घाटी से खदेड़ चुके हैं ना ? ऐसे इलाके में अचानक ये क्या हो गया कि कुल जमा 12-15 सौ छात्र तिरंगा लेकर निकल पड़े ? किसका भरोसा था कौन बचा लेता ? लीप ऑफ़ फेथ इसे नहीं कहोगे ?”

“ये किसी बात को कहीं मिला देने की बड़ी बुरी आदत है तुम्हारी !”

“अब तुम आँख जबरन बंद करना चाहो तो कोई क्या करे ! मगर थे तो ये बच्चे इसी भारत के | सोचो भला किस भरोसे तिरंगा लेकर निकल पड़े होंगे | खाली हाथ ? कारगिल पर झंडा फहराने वाले फौजी तो फिर भी हथियारबंद थे | ये तो बिलकुल हम जैसे होंगे, भीरु, अहिंसक ! तिरंगा ठोक कैसे दिया छाती पर ? लीप ऑफ़ फेथ ही रहा होगा | तुम्हें क्या लगता है साथी ?”

“शाम ढल चुकी है मुझे बाजार भी जाना है, मैं लौट कर तुमसे बात करता हूँ |”

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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