भारतीय फिल्मों के इतिहास मे, “मुगले-आज़म” सबसे बड़ी हिट फिल्म थी | जिस 1960 के दौर मे इस फिल्म ने 12 करोड़ रुपये कमाए थे, उसे आज की दर से देखें तो वो करीब 1300 करोड़ होंगे | ये इतनी बड़ी रकम है जितने बाहुबली-2 ने भी नहीं कमाए | उस दौर मे इसे दस करोड़ लोगों ने सिनेमाघर मे जाकर देखा था | “हम आपके हैं कौन” या “बाहुबली” जैसी फिल्मों को 10 करोड़ लोगों ने थिएटर मे नहीं देखा |

 

ये “मुगले-आजम” शुद्ध रूप से फर्जी सेकुलरिज्म पर बनी कहानी है | इसमें जो दिखाया गया है उसमें से कुछ भी इतिहास नहीं है | अनारकली असलियत मे थी ही नहीं | सलीम कोई प्रेमी नहीं था जिसने मुहब्बत के लिए बाप से जंग लड़ी हो | सलीम ने नूरजहाँ नाम की एक औरत से निकाह किया था | नूरजहाँ के पति को सलीम ने क़त्ल करवा दिया था और उसे उठा लाया था | हिन्दू राजाओं की तरह प्रेम और विवाह कभी मुगलों के लिए महत्वपूर्ण विषय रहा ही नहीं |

 

लड़कियों को उठा ले जाना उनका अधिपत्य सिद्ध करने का तरीका होता था | अकबर की 300 से अधिक बीवियां थी और 5000 से ऊपर रखैलें | जहाँगीर, शाहजहाँ, सबके हरम मे गुलाम बनाई गई लड़कियों की गिनती हज़ारों मे होती थी | कितनों का बलात्कार करना पड़ा, किसके पिता-भाइयों को क़त्ल करना पड़ा, इन सब से उन्हें कोई ख़ास लेना देना कभी रहा ही नहीं !

 

“मुगले-आज़म” मे सलीम की माँ, किसी जोधाबाई को दिखाते हैं जो “हिन्दू” है, कृष्ण मंदिर जाती है और अकबर के युद्ध पर रवाना होते समय उसे तिलक भी लगाती है | अहो-महो, आह-वाह करते धूर्त लिबरल लहालोट हो गए, अरे देखो रे ! कितना सेक्युलर था अकबर, हाय मर जावां गुड़ खाके ! सच्चाई ये है कि एक चम्पावती का धर्म परिवर्तन करवा दिया गया था | ये बदल कर हुई मरियम उज़ ज़मान, और यही मरियम सलीम की माँ थी | वो तिलक नहीं लगाती होगी, नमाज़ पढ़ने को बाध्य थी |

 

किसी को पता नहीं है कि “जोधाबाई” कोई थी भी कभी या नहीं, कोई फर्क भी नहीं पड़ता इस बात से | एक बार हरम मे आ गई तो कोई हिन्दू नहीं रह जाती थी, इस्लाम कबूलना ही एकमात्र विकल्प था | सलीम ने भी कई हिन्दू लड़कियों से शादी की और उनसे इस्लाम कबूलवाया था | एक बार उसकी नजर नूरजहाँ पर पड़ी तो उसे उठा लाने की बात चली | उसके पति ने विरोध किया तो उसको क़त्ल करवा के नूरजहाँ को लाया गया | नूरजहाँ ने अपने पहले पति के कातिल से कोई परहेज नहीं किया |

 

नूरजहाँ ख़ुशी ख़ुशी सलीम के साथ रहने लगी, सलीम को अफीमची बना दिया और परदे के पीछे से मुग़ल सल्तनत चलाती रही | अब अगर आप सोच रहे हैं कि फिर सलीम अपने बाप से लड़ा क्यों था तो जंग इसलिए हुई थी क्योंकि बाप अकबर जल्दी मर नहीं रहा था | अकबर ने करीब पचास साल शासन किया और सलीम इतने मे अधेड़ हो चला था | उसके बेटे उसे ज्यादा दिन राज नहीं करने देंगे इतनी समझ उसे थी तो उसने बगावत छेड़ दी |

 

ये जंग कभी मुहब्बत के लिए नहीं लड़ी गई थी, जैसा कि फिल्म मे दिखाते हैं | अकबर लड़ाई मे जीत गया और सलीम को उठा कर जेल मे पटक दिया गया | कुछ महीनों बाद जब अकबर की मौत हुई तो अपनी दादी और माँ की मदद से सलीम बाहर आया | उसने अपने बाकी के भाइयों को क़त्ल किया और बादशाह बन गया | जबतक ये सब होता तबतक सलीम के खुद के बेटे ने उसके खिलाफ बगावत छेड़ दी थी | सलीम ने अपने बेटे को हरा दिया, उसकी आँखें निकलवा ली और उसे जेल मे फेंकवा दिया | कितनी मुहब्बत करने वाले अब्बू थे ना सलीम ?

 

इस मुगले-आज़म का नतीजा ये हुआ कि भारत की कई पीढ़ियाँ मुगलों को सेक्युलर, लिबरल, दरियादिल, अच्छे शासक मानती बड़ी हुई है | अभी भी अकबर की करतूतें आप बताएँगे तो लोग कहेंगे हाँ, हाँ, उस दौर के सभी राजा ऐसा ही करते होंगे !

 

आज भी “एक था टाइगर” जैसी फिल्मों मे अपने सल्लू भाई पाकिस्तानी आई.एस.आई. की जासूस के साथ मिलकर आतंकियों से लड़ते और जीतते दिखाए जाते हैं | जबकि सच्चाई ये है कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान तो इस्लामिक आतंक को पोषण और पनाह देने के लिए जाना जाता है ! भारतीय जब जान की बाजी लगाकर किसी इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान वाली को बचाता है तो वो भी बदले मे भारतीय झंडा फहराती है | आह वाह करते सेक्युलर लहालोट ! कसाब को बचाने के लिए भारत के कई लिबरल आधी रात को अदालत खुलवा रहे थे | कुलभूषण जाधव का मुकदमा कौन से पाकिस्तानी लड़ रहे हैं नाम सुना है कभी ?

 

जब आप का इतिहास “पद्मावती” जैसी फिल्मों से ऐसे ही तोड़ा मरोड़ा जा रहा होता है तो क्या होता है ? बॉलीवुड के सेक्युलर तो आपको मीठी गोली देकर आपकी जेब से अपने लिए करोड़ों कमा रहे ही होते हैं, उधर आई.एस.आई.एस. केरल से शांतिप्रिय लोगों को अपनी आतंकी फ़ौज मे भर्ती कर रहा है | इसी फिल्म के करोड़ों से आपपर ही चलाने के लिए पेट पर बम बाँध कर कोई निकलेगा | इसी पैसे से आपको गलत बताने वाले लेखों को लिखने के पैसे दिए जायेंगे |

 

आपको भाईचारे की टोपी पहना कर जो फिल्म दिखाई जा रही है उसी की कमाई से भाईजान आपका चारा बनाकर चरने वाले हैं | आँखे खोलिए, सड़कों पर नहीं उतरते तो चुपचाप आर्थिक बहिष्कार कीजिये | उनके विरोध मे ढूंढ कर तथ्य निकालिए, लोगों को बताइये | खुद ढूंढ कर बता नहीं सकते तो जो लोग बता रहे हैं उनकी बात दूर तक पहुंचाइये | दूर तक पहुंचा नहीं पा रहे तो अपने घर के लोगों को तो बताइये, उनका विरोध कर रहे लोगों का सामना कीजिये |

 

आपकी लड़ाई कोई और अकेला कितनी देर लड़ता रहेगा ? कल करेंगे कुछ नहीं होता, आज-अभी शुरू कीजिये !

A loose translation of Facebook post by Dr. Vishnu Vardhan

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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