जैसे शास्त्रीय संगीत में थाट, राग वगैरह होते हैं वैसे ही हिंदी साहित्य में भी कई वाद वगैरह होते हैं। हमें एक “छायावाद” का नाम तो पता है, लेकिन इसके अलावा कौन से होते हैं वो नहीं मालूम। बल्कि छायावाद क्या होता है ये भी नहीं मालूम! छह रसों का नाम भी हमने सुना है, एक वीभत्स होता है, श्रृंगार और वीर रस भी होते हैं, लेकिन उन्हें बांटने के बारे भी हम नहीं जानते। इसलिए “लाल पान की बेगम” के बारे में पूछा जाए तो हम बस इतना बता सकते हैं कि ये फणीश्वर नाथ रेणु की रचना है। लोककथाओं की शैली में, कुछ स्त्रियों की आपसी बातचीत में कहानी बनती है तो किसी ख़ास वर्ग में इसे डाला भी नहीं जाना चाहिए।

 

ये शुरू होती है जब बिरजू की माँ से मखनी बूआ पूछती है कि नाच देखने नहीं चल रही क्या? भारतीय परिवेश में यहाँ नाम की महिमा दिख जायेगी। आपके जमींदार या धन्ना सेठ होने से आपका परिचय नहीं है, अगली पीढ़ी यानि बच्चों को कैसा इंसान बनाया वही आपका परिचय होगा। साठ की उम्र में कोई आपका सैलरी पैकेज नहीं पूछेगा, कहाँ फ्लैट-प्लाट लिया भी नहीं जानना चाहेगा। वो तबियत और बच्चे कैसे हैं, कहाँ हैं, इतना भर जानना चाहेगा। बिरजू की माँ के बच्चे हैं तो उनका नाम ही उसका परिचय हो जाता है, मखनी बूआ के आगे पीछे कोई है नहीं तो उसके खुद के नाम में बूआ का सम्बन्ध जोड़कर वो मखनी बूआ होती है।

 

बिरजू की माँ अपने पति के बैलगाड़ी लेकर वक्त पर ना आने से पहले ही दुखी थी वो मखनी बुआ के सवाल से चिढ़ गई और बोल बैठी कि वो “आगे नाथ ना पीछे पगहा” यानि परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त वाली स्थिति में थोड़ी ना है! फुर्सत हो तो सोचे भी। मखनी बुआ तो अकेली ही रहती थी वो परिवार ना होने के बात पर वैसे ही चोट खा गई जैसे आज के दौर में किसी राजनैतिक विचारधारा के समर्थक “भक्त” कह दिए जाने पर होते हैं। दिक्कत ये थी कि “भक्त” अपनी आहत भावनाओं के साथ जब अपने नेता को अजान की आवाज पर भाषण रोकते देखता है तो उसकी नैतिक श्रेष्ठता का बोध उसकी चोट सहला देता है। ऐसे विकल्प तो मखनी बुआ बेचारी के पास थे नहीं सो वो कुछ असहिष्णु हो चलीं!

 

पानी भरते समय जब मखनी बुआ ने ये बात दूसरी पनिहारिनों को बताई तो सबने बुआ को सांत्वना देने की कोशिश की। बातों बातों में बात निकली कि बिरजू के पिता हाल में ही मजूर से स्वतंत्र किसान हुए थे। ये सब चार पैसे आ जाने का ही नतीजा है कि बिरजू की माँ के पैर जमीन पर नहीं टिकते। जंगी की पुतोहु (बहु) ने इसी बीच बिरजू की माँ को “लाल पान की बेगम” कह दिया। थोड़ी ही देर में, बातों बातों में, ये उपमा बिरजू की माँ को भी सुनाई दे गई! पहले से ही जली भुनी बैठी बिरजू की माँ इस संबोधन से वैसे ही नाराज हुई जैसे हाल में ही असहिष्णुता का शोर मचाते पक्षकार एक भूतपूर्व जनरल के “प्रेस्टीटयूट” शब्द से भड़के थे।

नाराजगी और खुशियाँ कैसी क्षणिक हैं, ये दर्शाने में फणीश्वर नाथ रेणु का कोई सानी नहीं। एक वाक्य में जहाँ पाठक चिढ़ने लगेगा, वहीँ दुसरे में उसकी मुस्कान खिल उठती है। जैसे उपचुनावों के नतीजे आने पर पक्षकारों की एक बिरादरी की मुस्कान लौटती है, कहानी में भी कुछ ऐसे ही बिरजू की माँ बैलगाड़ी की आहट, बैलों की घंटियाँ सुनकर खिल उठती है। भारतीय परिवेश में कोई अकेला नहीं होता, समाज परिवार का ही विस्तृत रूप होता है। मेले भी कोई अकेले नहीं जाता तो नाराजगी भूलकर “सबका साथ सबका विकास” की तर्ज पर अभी तक बिरजू की माँ जिनसे चिढ़ी बैठी थी, उन लरेना की बीवी, राधे की बेटी सुनरी सभी को गाड़ी में बिठा लेती है।

 

जंगी की पुतोहू, जिसने बिरजू की माँ को लाल पान की बेगम कहा था, उसके दिए संबोधन से अब बिरजू की माँ ने अब तक खुद को ही पुकारना शुरू कर दिया था। भारतीय परिवेश में जैसे बाहर से आने वाले लोग घुल-मिल गए वैसे ही ये संबोधन भी अपना लिया गया। मानवीय संवेदनाएं कैसे चलती हैं ये कहानी उसका अच्छा नमूना भी है। ये वैसा भी है जैसे “भक्त” शब्द को भारतीय परम्परा में सम्मान की तरह लेना शुरू कर दिया है। हाँ आम तौर पर भारतीय परम्पराओं नीचा दिखाने की कोशिश करने वालों ने अपना बना लेने के तरीके भी नहीं सीखे होंगे। तो जनरल साहब के “प्रेस्टीटयूट” या फिर सोशल मीडिया के “प्रेश्या” जैसे शब्द कभी सम्मानसूचक हो पायेंगे इसमें शक रहेगा।

 

भारत की परम्पराओं, रीतिरिवाज और ग्रामीण परिवेश को अपनी कहानियों में उतारने वाले फणीश्वर नाथ रेणु का असली नाम फणीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय था। बिहार में आज के अररिया और तब के पुर्णिया जिले में 4 मार्च 1921 को उनका जन्म हुआ था (देहावसान 11 अप्रैल 1977)। उनकी लिखी कहानी पर बनी फिल्म “तीसरी कसम” अपनी कहानी के लिए ही नहीं बल्कि लोकगीतों के लिए भी चर्चित रही है। उनकी “मैला आंचल” उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना थी (अमेज़न किन्डल पर ये मुफ्त डाउनलोड के लिए उपलब्ध है) उन्हें पद्मश्री सम्मान भी मिला था। उन्होंने इंदिरा गाँधी के इमरजेंसी लगाने के विरोध में पद्मश्री लौटा दिया था।

 

उनकी प्रमुख रचनाएँ:

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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