पानी के जहाज पर एक log बुक रखते हैं जिसमे हर रोज़ entry होती है | किसने क्या किया, क्या गलती हुई, कैसे बर्ताव किया किस कर्मचारी ने सब लिखा होता है, हर रोज़ बारी बदलती है और अलग अलग लोग entry चढ़ाते जाते हैं | तो हुआ यूँ की एक दिन एक शिप मेट ने शराब पी, नाविकों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन कप्तान उखड़ गया इस बात पर | उसने log बुक में लिख दिया “आज शिप मेट ने शराब पी” | शिप मेट बेचारा बहुत गिड़गिडाया, लेकिन कप्तान ने उसकी एक न सुनी entry नहीं बदली |

अब शिप मेट के नाम पर ये entry सबको दिखती उसकी अगली नौकरी में भी, तो वो दुखी हो गया | कुछ दिन बाद log बुक में entry करने की बारी शिप मेट की थी | उसने पहलाकाम किया की entry में लिख दिया “आज कप्तान ने शराब नहीं पी !”

अब इसमें कुछ भी गलत नहीं लिखा था लेकिन पढ़ने वाले को पहली चीज़ यही समझ में आती की कप्तान रोज़ पीता था सिर्फ़ उस दिन नहीं पी इसलिए इस अनोखी घटना की entry की गयी है |

अब अभी वाले महाराष्ट्रा सरकार के फैसले पर मचते शोर को देखकर भी यही याद आता है | चाहे कुछ भी हो जाए आप वही सोचेंगे जो आप सोचना चाहते हैं | ये सरकार तो सांप्रदायिक है तो कोई भी कानून समुदाय विशेष के खिलाफ़ ही बनाएगी | बिलकुल मान के बैठे हैं, कोई गुन्जायिश ही नहीं सवाल जवाब की | साहब आज तो हुआ नहीं है ये, 1995 में महाराष्ट्रा के विधान मंडल ने लिया था ये फैसला | दस साल कांग्रेस बैठी रही इस पर, आज तो सिर्फ केंद्र ने इस पर अपनी सहमती की मोहर लगायी है | ऐसा भी नहीं है की आज से गौहत्या पर पाबन्दी है महाराष्ट्रा में, ये तो बरसों से है, अभी तो सिर्फ उसी कानून में बैल, सांड और भैंस को भी जोड़ा गया है | गौ हत्या तो पहले ही प्रतिबंधित थी |

हाँ कानून सख्त है इसपर आपत्ति हो सकती है, लेकिन सख्त न होनेपर कानून मानता कौन है ? शराब पी कर गाड़ी चलाने पर जब मामूली सज़ा थी तो क्या होता था दिल्ली में ? भारत में 26 राज्य हैं जहाँ की गौ हत्या पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबन्ध है | इतने सालों से याद नहीं आया था ये ? उस समय भी सांप्रदायिक सरकार ने बनाये होंगे कानून |

अब भारत मेंतो गौ हत्या पर प्रतिबन्ध एक जोरदार राजनैतिक मुद्दा है | चुनावों में कांग्रेस के “माइनॉरिटी अप्पिस्मेंट” की नीति में छेद करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी जी ने “पिंक रेवोलुशन” का जुमला अपने भाषणों में भी उछाला था और अपने ब्लॉग पर भी | यहाँ ये बताना लोग भूल गए की भारत में जो BEEF के नाम से बिकता है वो ज्यादातर भैंस का मांस होता है, इजाजत बीमार, बूढी गायों के लिए भी है | अब ऐसा मांस खा के जो लोग बीमार होना चाहते हैं उनकी बुद्धि का तो भगवान भला करे ! क्या भगवान् में विश्वास नहीं रखते ! मुस्लिम हैं फिर भी नहीं ? ये तो हज़म नहीं हो रही बात, लेकिन छोड़िये मुद्दे से क्यों भटकना | ओह गैंग्स ऑफ़ वासेपुर भी देखी है आपने, और आपको पता है की इस धंधे से जुड़े ज्यादातर लोग “कुरैशी” हैं ! फिर भी बात नहीं करनी |

मेनका गाँधी तो यहाँ तक कह चुकी हैं की BEEF के धंधे से आने वाला पैसा सीधा आतंकवादियों को जाता है | इस मुद्दे पर कांग्रेस क्या और भाजपा क्या ? ज्यादातर राज्यों के कानून तो कांग्रेस के ज़माने के ही बनाये हुए हैं |

अगर इन्ही महानुभावों की लिखी किताबें देखें तो आप पाएंगे की बाबर अपने बेटे और उत्तराधिकारी हुमायूँ को गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाये रखने की सलाह देता पाया जाता है | आगे चल के अकबर भी यही फ़रमान 1586 में जारी करता हुआ पाया जाता है | सिख और मराठा राज्यों में भी गौ हत्या पर पाबन्दी थी | मैसूर में हैदर अली ने गाय काटने वालों के हाथ काट लेने की धमकी दी थी | 1857 के विद्रोह के समय में बहादुर शाह जाफर जैसे कमज़ोर राजा ने भी गौ हत्या पर रोक लगा रखी थी और गौ हत्या की सज़ा थी मृत्यु दंड | लेकिन ये सब तो “सेक्युलर” होने के प्रमाण हैं न ? अभी वाला कानून तो “सांप्रदायिक” है | “निजी स्वतंत्रता” का हनन हो जाता है इस से |

आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने 1881 में “गोकरुनानिधि” नाम का पर्चा छपवाया था जिसमे गौ हत्या को सीधा हिन्दू धर्म पर हमला बताया गया था | इसी के बाद से गौ रक्षा हेतु गौ रक्षा समितियों का अस्तित्व शुरू हुआ | आर्य समाज के प्रभाव वाले हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब के इलाकों में अभी भी कई गौशालाएं और गौ रक्षा समितियां देखी जा सकती हैं |

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी गौ रक्षा का महत्व रहा है | 1857 के विद्रोह के प्रमुख कारणों में से ये भी एक था, मंगल पाण्डेय भड़के ही इसलिए थे क्योंकि दांत लगाने वाले कारतूस में गाय की चर्बी होने की बात फ़ैल गयी थी | गाँधी ने भी गौ रक्षा का मुद्दा बहुत संभाल के अंग्रेजों के खिलाफ़ इस्तेमाल किया और ध्यान रखा की कहीं ये मुसलमानों के खिलाफ़ न जाये | गाँधी मजाक उड़ाते “उसके (BEEF) बिना तो ये एक दिन भी नहीं रह सकते” | 1927 में उन्होंने जब “हरिजनों” को कई “बुराइयों” से दूर रहने कहा था तो उनमे थे गंदे रहना, शराब, पर स्त्री गमन, और BEEF यानि गौ मांस नहीं खाना, क्योंकि “गौ रक्षा हिन्दू धर्म का बाह्य स्वरुप है” | इन सबके कारण जब भारत स्वतंत्र हुआ तो भारत के संविधान में भी गौ रक्षा को होना ही था, तो Directive Principle of State Policy में इसे शामिल किया गया | ऐसा होते ही राज्यों ने दो शताब्दी पुराने कानूनों को फ़ौरन पलटना शुरू किया | जो कानून बने उन्हें हिटलर का कानून कहा जा सकता है | गुजरात में इसके लिए सात साल की सज़ा होती है, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्रा और दिल्ली में तो बाकि कानूनों के उलट स्थिति है |

अगर आप किसी आदमी की हत्या के इल्ज़ाम में जेल में डाले जाते हैं तो आप तब तक निर्दोष हैं जबतक आपका दोष सिद्ध नहीं हो जाता | लेकिन अगर आप बलात्कार, डकैती, अपहरण, गैर कानूनी हथियार रखने जैसे मुकदमों में जेल जाते हैं तो अपने को निर्दोष सिद्ध करना आपकी ज़िम्मेदारी होती है | गौ हत्या में भी ऐसा ही है, जबतक आप खुद को निर्दोष सिद्ध नहीं कर देते तब तक आपको दोषी माना जायेगा |

वैसे गाय के शरीर के हिस्सों के धंधे में हैं आप तो डरने की कोई जरूरत नहीं है, थोड़े दिन पहले गाय की हड्डियों के धंधे पर पाबन्दी लगाने के बिल को मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने पारित नहीं होने दिया | इसके अलावा भारत में क्रिकेट खेला जाता है तो वो जो गेंद होती है वो गाय के चमड़े से ही बनती है |

तो अभी तक जो होता रहा है वो सिर्फ एक लीपापोती थी गौ रक्षा के नाम पर | अभी चमड़े के व्यवसाय वालों, क्रिकेट बॉल बनाने वालों, और गोश्त और हड्डियों का धंधा करने वालों पर लगाम कसनी बाकि है | ये लोग गौ हत्या को बढ़ावा देते हैं |

इसमें किया क्या जा सकता है, कानून बनाने के अलावा ? इस चीज़ को थोड़ी देर के लिए धर्म के नहीं पैसे के नज़रिए से देखिये | भैंस कीमती होता है, उसके अलावा भैंस का मांस जिसे carabeef कहते हैं उसका स्वाद BEEF से अलग होता है, तो खाने वाले पहचान लेते हैं | अगर कभी मटन के शौक़ीन के साथ आप मीट ख़रीदने चले जाएँ तो कुछ चीज़ें दिख जाएँगी | खस्सी ही चाहिए होती है, बकरा या बकरी नहीं, उनका मीट काफी देर में पकता है, स्वाद भी अलग होता है | इसके अलावा खस्सी की खाल उतारते समय ज्यादा पानी नहीं डाला हुआ होना चाहिए, वो मीट का वजन बढ़ा देता है | ऐसे ही बूढी और बीमार गायें, बैल, जिन्हें मारने की सरकारी परमिशन मिलती है उनका स्वाद बड़ा बेकार होता है | इसके अलावा उनसे कई बिमारियों की भी संभावना भी होती है |

इसके अलावा पूरे जीवन काल में गाय से बहुत से फ़ायदे हैं आज कल | गोबर को गीली अवस्था में ही पैक कर के फ्रांस जैसे देशों को एक्सपोर्ट किया जाता है | उसके पूरे जीवन में जो दूध वो देगी, जो बछड़े होंगे, उसके मरने पर उससे बनने वाला खाद है | हड्डियों से हस्तकला की चीजें बनती है, बोन चारकोल भी चीनी साफ़ करने के लिए बिकता है, सींग और हड्डियों से दवाइयां बनती है, चमड़ा मरने के बाद बिकता है | यहाँ तक की गर्भवती गायों के गौमूत्र की भी अच्छी कीमत है | बूढ़े हो चुके बैल कोल्ड प्रेस में इस्तेमाल होते हैं, जिसे कोल्हू कहते हैं भारत में | फिर ये कैसे की ये गायें कसाई खाने पहुँच रही हैं ? और अगर पहुँच भी रही हैं तो फिर ये मटन और चिकन से सस्ती कैसे है ? कीमत पूछ के देखें तो 400 रुपये किलो मटन, करीब 110 से 125 रुपये किलो चिकन के मुकाबले ये 50 रुपये किलो कैसे बिकती है | महंगी होनी चाहिए न ?

हिन्दू हो या मुस्लिम हो अगर आप गाँव में उस से उसकी गाय को या बछड़े को बेचने कहेंगे तो देखिये क्या होता है | ऐसी शकल बनाएगा की जैसे बाप के मरने की खबर आ गयी हो | फिर भी ये गायें क़त्ल खाने पहुँचती कैसे हैं ?

अब अपने आज़म खान साहब की चोरी गई चार भैंसों को याद कीजिये | नेता के घर से, जहाँ सिक्यूरिटी है, दर्ज़नों लोग आते जाते हैं वहां से चार भैंसे गायब कैसे हो गई ? और गायब हो के गई कहाँ ? उनका कीमा बन गया है हुज़ूर, वापिस नहीं आएँगी वो चाहे कोई कितना भी शोर मचा ले | अब सोचिये की जब गाँव का एक ग़रीब आदमी थाने पर अपनी गाय, भैंस की चोरी की रिपोर्ट लिखाने जाता होगा तो होता क्या होगा ? वो सबूत कहाँ से लाएगा अपनी गाय का अपने भैंस का ? रान से चांप से की कीमे में से निकाल के ? इतनी गायें बिकती हैं भारत में की उनका इतना मीट एक्सपोर्ट किया जा सके ? बिकती होती तो आपको दिखती नहीं ? जैसे सड़कों पर पिंजड़े में जाते मुर्गे दिखते हैं, सड़को के किनारे जैसे बकरियां बेचते दिख जाते हैं वैसे दिखी हैं कभी, याद कीजिये जरा !

नार्थ ईस्ट में या पश्चिम बंगाल में या केरल में कहीं कोई फार्म सुना या देखा है जहाँ गायें मीट के लिए पाली जाती हैं, मुर्गियों के पोल्ट्री फार्म जैसे ? तो साहब आप जिस मीट का शौक पाल रहे हैं वो आपको भी पता है की किसी ग़रीब किसान की चोरी की गई गाय या बैल है | अब छोड़िये ये गरीबों का हिमायती होने का ढोंग, क्या है की ये जो पब्लिक है न, ये सब जानती है |यकीन न हो तो एक बार पास के गाँव में जाइये और जो लोग कसाई खाने के लिए जानवर ख़रीदने आते हैं उसे जानवर क्यों बेचा जाता है ये देख आइये दो चार दिन | बेचने वाले को पता होता है की नहीं बेचा तो हफ्ते दस दिन में ये चोरी चला जाएगा, मुफ्त में ना जाये इसलिए बेचा जाता है | पत्रकारों के लिए तो सुनहरा अवसर है ये ! भारत में आर्गनाइज्ड क्राइम की इस से जबरदस्त स्टोरी आपने कभी कवर नहीं की होगी | बिना आवाज़ किये जानवर चुराने के लिए घंटी काटने के special औज़ार, खुर में लगाने के दस्ताने जैसी चीज़ें ताकि जानवर बिना आवाज़ किये चल सके | उसे ट्रक में डालने के लिए तख्ते जैसी चीज़ें चाहिए होती है क्योंकि गाय बैल सीढियों पर नहीं चढ़ना चाहते | उस ट्रक को हरेक चेक नाका पार कराने के भी तरीके होते हैं वो भी देख आइये | मवेशी की चोरी पर दस हज़ार का जुरमाना होता है अगर आपको न पता हो तो, अब जिसे करीब पच्चीस हज़ार में बेच कर आये हैं उसके लिए दस हज़ार का जुरमाना ज्यादा नहीं होता पकड़े जाने पर इसलिए चोर सुधरते भी नहीं | ये एक कारण है की गाँव में जब मवेशी चोर पकड़ा जाता है तो वो थाने नहीं पहुँचता, ऊपर पहुँचता है | पीट पीट के मार देते हैं उसे ! अगले छः महीने इलाके में मवेशी चोरी रुक जाती है क्योंकि हर चोर का इलाका होता है, किसी और चोर को वो इलाका बांटने में वक्त लगता है |

एक बार देख आइये बहुत मज़ेदार स्टोरी मिल जायेगी | कम से कम बीस पन्ने की !

जानवर पालने वाले को अपने पालतू से बहुत प्यार होता है | अपने बच्चों की तरह ही पाला जाता है, “मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा..” वाला गाना भी सुना होगा और भैंस को डंडा मार देने पर होने वाले झगड़े भीदेखे होंगे, वो ऐसे ही नहीं बेचता उसे | बहुत सी भावनाएं जुड़ी होती है |

हां भावना से याद आया, भावना और सद्भावना दोनों बड़ी नाज़ुक सी होती हैं | आपने उस बहुत पुराने इलाहबाद कोर्ट के फैसले के बारे में तो सुना ही होगा, जिसमे कहा गया था की गाय कोई पूज्य प्राणी नहीं है,उसे खाने के लिए मारना वैध है | उसके बाद ही भारत का पहला बड़ा धार्मिक दंगा हुआ था | 1893 में बकरीद के दिन आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश में शुरू हुए इस दंगे ने बर्तानिया हुकूमत को भी हिला दिया था | हिंसा इतनी व्यापक थी की ब्रिटिश कई दिनों के लिए इलाके पर नियंत्रण पूरी तरह खो बैठे थे |

अब भावना और सद्भावना तो आपने देखा ही है की, इतनी नाजुक होती हैं की, वो एक कार्टून से भी आहत हो जाती हैं | जानवर से हो जाएँ इस बार तो कोई बड़ी बात तो नहीं ही होगी |

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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