महाभारत में दर्जनों पात्र हैं, उनके माध्यम से सैकड़ों शिक्षाप्रद कहानियां सुनाई गई हैं। इनका पता न होने के कारण कई बार छुआछुत की बात भी इनके ही बहाने से थोपने की कोशिश की जाती है। क्या सही था और क्या गलत वो महाभारत के पात्रों की हरकत देखने भर से पता चल जाता है। जैसे एक पात्र है दुर्योधन। आम तौर पर इसे दुष्ट, बलशाली, घमंडी, और गदा युद्ध का अच्छा जानकार बता कर छोड़ दिया जाता है। इसके चरित्र में और चीज़ें भी थी, जो अच्छी थीं, लेकिन नाम के “दुः” को खराब के रूप में दर्शाकर उसे खलनायक बनाया जाता है। दुः सिर्फ मुश्किल या कठिन दर्शाता है, कोई काम मुश्किल हो तो उसे दुष्कर कहा जाता है, वैसे ही जिसे युद्ध में मुश्किल से हराया जा सके, उसे दुर्योधन कहा जाता है। ये किसी और भाषा के “बे” जैसा नहीं कि जहाँ लगा दिया वो चीज़ खराब हो गई।

 

उसके चरित्र का एक पहलु देखने के लिए केरल जाना होगा, वहां मालानाद की पहाड़ी है। पोरुवज्ही नाम का ये गाँव कुन्नाथूर तालुक में आता है। ये कोल्लम जिले का उत्तरी छोर है, NH 47 से यहाँ पहुंचा जा सकता है। यहाँ एक मंदिर है जिसकी अनोखी चीज़ ये है की मंदिर में कोई मूर्ती ही नहीं है ! अगर आप पूछेंगे की ऐसा क्यों है तो आपको महाभारत काल की कथा सुनाई जाएगी। कथा के अनुसार एक बार घोड़े पर बैठे कुछ लोग किसी को ढूंढते हुए इस इलाके में आये। ये दुर्योधन थे, पांडवों के अज्ञातवास के समय उन्हीं को ढूंढ रहे थे। प्यासे राजकुमार को मालानंद अप्पोप्पन (प्रमुख / पुजारी) का घर दिखा। पानी मांगने पर वहां के रिवाज के मुताबिक उन्हें ताड़ का रस दिया गया। इतनी देर में महिला का ध्यान गया की प्यासा व्यक्ति क्षत्रिय है और राजकुमार का भी ध्यान गया की पानी देने वाली ने कुर्थलिया पहना है जो की शूद्र पहनते हैं।

 

महिला को लगा की उसने क्षत्रिय को खाने पीने की वस्तु देकर भूल कर दी है। वो दुर्योधन से माफ़ी मांगने लगी तो दुर्योधन ने कहा की भूखे को खाना या प्यासे को पानी देने में वर्ण कैसा ? दुर्योधन ने उनकी पूजा पद्दतियों और सिद्धियों के बारे में जाना। वहीँ पहाड़ी पर दुर्योधन ने प्रजा की भलाई के लिए शिव की उपासना की और जाते जाते कई एकड़ ज़मीन वहां मंदिर बनाने के लिए दान कर गए। आज जो मंदिर इस जगह है वो दुर्योधन के दान की ज़मीन पर बना है। इसके मुख्य देवता भी दुर्योधन है। दुर्योधन के अलावा यहाँ उनकी माता गांधारी, उनकी बहन दुस्सला, उनके मित्र कर्ण, और गुरु द्रोण की भी उपासना होती है। इस मंदिर के पुजारी कुरवा जाति के होते हैं (दुनिया के हर मंदिर का पुजारी ब्राह्मण नहीं होता)। मंदिर का प्रशाषण चलाने के लिए सात सदस्यों की एक कमिटी का चयन होता है। इस मंदिर की ज़मीन का टैक्स आज भी दुर्योधन के नाम से जमा किया जाता है। हर साल यहाँ एक बड़ा सा मेला भी लगता है जो काफी प्रसिद्ध है और उसके लिए प्रशासन को भी लाख दो लाख लोगों के आने का इंतजाम करना पड़ता है। पिछले साल ये मेला 16 मार्च, 2016 को लगा था, इस वर्ष 10 फ़रवरी से 24 मार्च के बीच 2017 के उत्सव हुए हैं।

एस.एस. राजामौली की फिल्म के लिए बनाया गया, दुर्योधन के रूप में अजय देवगन का स्केच

अगर पूछेंगे की हस्तिनापुर का राजा इतने साल पहले यहाँ तक आया था तो इस इलाके के लोगों के पास बड़ा रोचक जवाब मिलेगा। वो कहते हैं की शंकराचार्य 32 वर्ष की आयु में शरीर त्यागने से पहले पैदल ही पूरा भारत कई बार घूम चुके थे वो भी पैदल, शास्त्रार्थ करते करते। तो सिर्फ ढूँढने निकला दुर्योधन, अपने घोड़ों और रथों से यहाँ तक नहीं पहुँच पाया होगा आपको ऐसा क्यों लगता है ?

 

दुर्योधन का एक दूसरा किस्सा स्त्री पर्व के राजधर्मानुशासन पर्व में मिलता है। अलग अलग पाठों की वजह से हर महाभारत पाठ में राजकुमारी का नाम नहीं आता, उसे गज पर आधारित नाम वाली और भानुमती भी बताया जाता है। ये कल्लिंग के इलाके की राजकुमारी थी और दुर्योधन इसे कर्ण की मदद से उसके स्वयंवर से ले भागा था। जब दुर्योधन और कुछ साथी पूरे देश में भ्रमण कर रहे होते हैं तो एक दिन भानुमती और कर्ण (शायद दुःशासन भी) मिलकर पचीसी खेल रहे होते हैं। आज के लूडो के इस पुराने रूप का जिक्र महाभारत में भी आता है। थोड़ी देर में ही बाजी पर लगे दांव बढ़ने लगे खिलाड़ी जोश में आ गए और जैसा की लूडो में होता है वैसे ही हार रही भानुमती कर्ण पर बेईमानी करने का शक भी करने लगी। लेकिन कर्ण जीतता रहा और भानुमती आरोप लगाती मैं और नहीं खेलूंगी कहने लगी। इतने में दुर्योधन वापस आया और उसे देखकर भानुमती उठकर खड़ी होने लगी।

 

कर्ण की पीठ दरवाजे की तरफ थी तो उसने देखा नहीं कि राजा दुर्योधन के आने पर वो खड़ी हो रही है, उसे लगा हारने के डर से भानुमती बीच में ही खेल छोड़कर भाग रही है। उसने फ़ौरन भानुमती को वापस बिठा लेने के लिए हाथ बढ़ाया। भानुमती की मोतियों की माला उसके हाथ से टूट कर बिखर गई, और भानुमती जड़ हो गई। जब कर्ण ने मुड़कर देखा कि क्या हुआ है तो पीछे ही दुर्योधन को खड़ा देखकर वो भी पेशोपश की स्थिति में आ गया ! भानुमती और कर्ण दोनों ही दुर्योधन के गुस्सैल स्वभाव से भी परिचित थे, फिर राजा के सामने उसकी पत्नी से अभद्र व्यवहार ! लेकिन दुर्योधन हंसा और भानुमती की तरफ देखता हुआ बोला, अब मुझे सिर्फ मोती चुनने होंगे, या उन्हें गूंथ कर आपकी माला भी पिरोनी है ? दोनों को असहज देख कर उसने आगे जोड़ा था कि उसे अपनी पत्नी और अपने मित्रों पर पूरा भरोसा है, वो इतना भी शक्की नहीं कि बैठा उल-जलूल सोचने लगे।

 

महाभारत की लड़ाई में कौरव पक्ष में पांडवों से ज्यादा सेना जुटने के पीछे भी शायद यही कारण रहा था। अपने मित्रों-सामंतों, अपने पक्ष में आये लोगों के साथ दुर्योधन का व्यवहार निश्चित रूप से अच्छा रहा होगा। वरना इतने लोग उसकी तरफ से जान गंवाने की शर्त पर भी आ जुटें ऐसा मुमकिन नहीं होता। खलनायकों के साथ भी ऐसा ही होता है, आपके लिए चाहे वो जितना भी बुरा हो, अपने पक्ष के कुछ लोगों के लिए वो फिर भी अच्छा था।

 

Ref: Santi Parva: Rajadharmanusasana Parva: Section IV

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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