जिन्हें पेड़ लगाने का अनुभव होगा, उन्हें पता होगा कि पेड़ को पाल कर बड़ा कर देना करीब करीब बच्चे को पालने जितना ही मुश्किल है। जब पौधा छोटा होता है तो उसका काफी ख़याल रखना पड़ता है। धरहरा, जो बिहार के भागलपुर जिले का एक छोटा सा गाँव है, वहां के निवासियों ने पेड़ों को गाँव की बेटियों से जोड़ देने का अनूठा काम किया है। नहीं, ये हाल के “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसी योजनाओं के असर से नहीं हुआ, कोई राज्य सरकार की मदद से भी शुरू नहीं हुआ है।

Sneha Surabhi (Photo: Prashant Ravi)

उल्टा मुख्यमंत्री महोदय इस गाँव के काम से प्रभावित होकर यहाँ से “पहली किलकारी योजना” का शुभारम्भ करने के लिए प्रेरित हुए हैं। गोपालपुर प्रखंड का धरहरा गांव आने वाले दिनों में संपूर्ण सुकन्या ग्राम के नाम से जाना जाएगा। डाक विभाग, भागलपुर बेटियों के नाम पर डाक टिकट व स्टांप पेपर जारी करेगा, और इन्हें अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाने की भी सोच रहा है। गाँव में आखरी गिनती तक 535 बेटियां थी। गाँव की ख़ास बात ये है कि ये लोग बेटियों के नाम पर पेड़ लगाते हैं।

 

शुरुआत के दौर में बच्चियों के नाम पर लोगों ने शीशम के पेड़ लगाने शुरू किये थे मगर उन पौधों में कीड़ा लगता था तो देखभाल एक बड़ी समस्या थी। अब ज्यादातर बच्चियों के नाम पर फलदार पौधे लगाए जाते हैं। स्थानीय सांसद शाहनवाज हुसैन भी इस योजना और गाँव की तारीफ करते नहीं थकते हैं। फलदार पौधों से जो आय होती है उसे बेटी के नाम से ही परिवार खाते में जमा करता जाता है। यानि शादी के वक्त तक लड़की के पास खुद की अच्छी खासी बचत की रकम भी होती है।

 

बेटियों के नाम पर पेड़ लगाते इस गाँव के लोग तो बधाई के पात्र हैं ही, आज जरूरत है कि हम लोग भी आगे आयें और संसाधनों की कमी के बाद भी क्या अच्छा किया जा रहा है, उसे और लोगों को बताएं। जितने ज्यादा लोग इस गाँव से प्रेरित होकर, पेड़ लगाएं, उतना अच्छा। पर्यावरण का भी भला होगा, देश की बेटियां भी आर्थिक रूप से स्वतंत्र होंगी। हाँ परिवार के लिए ही नहीं, एक फलदार पेड़ के लिए भी बेटियां मायके आती रहें तो अच्छा तो लगता ही है !

गूगल के नक़्शे पर धरहरा

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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