[ ऑस्कर वाइल्ड (1854-1900) कि कहानी का रूपांतर ]

दानासुर दैत्य को लोग पसंद नहीं थे। इंसानों से उसे बड़ी चिढ़ होती थी। ऊपर से वो बड़ा स्वार्थी भी था। अपनी चीज़ें किसी को छूने भी नहीं देना चाहता था, भले ही उसका खुद का गुजारा दूसरों की चीज़ें छीन कर चलता हो। विशालकाय दैत्य अपने घर के आस पास दिखने वाले लोगों को दबोच कर खा जाने की धमकी देता रहता था। भयावह दैत्य के घर के आस पास से डर के मारे कोई नहीं जाता था।

गाँव का नजदीकी स्कूल नदी के उस पार था। स्कूल से लौटते बच्चे दूर से पुल पार करते दानासुर का बगीचा देखते उनका मन भी वहां खेलने को मचलता । जब दानासुर दानव कहीं बाहर शिकार पर जाता तो बच्चे मौका पाकर बगीचे में घुस जाते ! कोई झूले पर खेलता तो नर्म हरी घास पर दौड़ लगाता । बगीचे के सभी फूलों से भी बच्चों की दोस्ती थी, बच्चे फूलों से भी बातें करते । फूलों क्यारियों एक कतार में दर्ज़न भर आड़ू (Peach) के पेड़ थे । दर्ज़नो पक्षी बच्चों को देखकर उन पेड़ों पर गाने लगते । जब बसंत आता था तो पेड़ गुलाबी फूलों से भर जाते । एक शाम शाम दानासुर दानव जल्दी घर लौट चला । दूर से ही उसे अपने बगीचे में खेलते बच्चे दिख गए । “तुम मेरे बगीचे में क्या कर रहे हो ?”, दानासुर चीखा ! वो अपने बगीचे की तरफ लपका, लेकिन बच्चे उसे देख भी चुके थे उसकी भयानक दहाड़ भी सुन चुके थे । वो सब जान बचा कर अपने गाँव की तरफ भागे । गुस्साया दानव दानासुर जब बगीचे पहुंचा तो वो आग बबूला हो चुका था । उसी रात उसने अपने बगीचे के चारों ओर एक ऊँची दीवार बनानी शुरू की । हफ्ते भर में उसने पूरे बगीचे दिवार से घेर दिया और अपने बड़े से गेट पर एक तख्ती लगा दी । तख्ती पर लिखा था, “बच्चों का अंदर आना सख्त मना है” !

दानव दानासुर बहुत ही स्वार्थी दानव था ।

बेचारे बच्चों के पास अब खेलने के लिए कोई जगह नहीं बची थी। उन्होंने गाँव की गलियों में खेलने की कोशिश की, मगर रास्तों पर धूल होती थी, पत्थेर होते थे। उन्हें चोट भी आ जाती थी, उनके कपड़े भी गंदे हो जाते थे। स्कूल ख़त्म होने के बाद वो दानासुर के बगीचे की ऊँची दीवारों के पास से गुजरते थे, खूबसूरत बगीचे और झूलों कि बातें करते थे। वो बगीचे में ना खेल पाने पर अफ़सोस करते थे।

फिर वसंत आया। सारे देश में नन्हीं कलियाँ खिल गई। पक्षी पेड़ों पर चहकने लगे। सिर्फ स्वार्थी दानव दानासुर के बगीचे में जाड़ा अब भी अड्डा जमाये बैठा था। पक्षियों को अब उस बगीचे में कुछ भी रुचिकर नहीं लगता था, वहां बच्चे आते ही नहीं थे इसलिए पेड़ों में फूल भी नहीं आये। बर्फ़ और कोहरे को जैसे ही पता चला की जाड़ा अभी तक बगीचे से गया नहीं है तो वो खुश हो गए। उन्होंने भी आकर बगीचे में अड्डा जमा लिया। बर्फ ने घास के ऊपर अपनी परत बिछा दी, कोहरे ने दानव दानासुर की खिड़कियों को भी धुंधला कर डाला। बर्फ और कोहरे ने जाड़े से सलाह की। उन्होंने तय किया की वसंत तो बगीचे को भूल ही गया है, इसलिए पूरे साल वो उसी बगीचे में डेरा जमा सकते हैं। उन्हें पश्चिम की तरफ जाने कि कोई जरुरत नहीं थी, उन्होंने ठंडी उत्तरी हवाओं को भी आमंत्रित कर लिया। फर से ढकी उत्तरी हवा तुरंत ही दानासुर के बगीचे में आ धमकी। हर रोज़ वो सुबह सुबह ही दानासुर के बगीचे में धमाचौकड़ी मचाना शुरू कर देती। खिड़कियों को खड़काती और गमलों को भी उल्टा देती। उन्होंने थोड़े ही दिनों में ओले को भी बुला लिया। ओला भी जाड़े के दानासुर के बगीचे में होने की खबर सुनकर खुश होता हुआ आया। सारे दिन स्वार्थी दानव दानासुर की छत पर ओले बरसते रहे। खटा खट कि आवाज़ से दानव दानासुर के सर में दर्द होने लगा !

स्वार्थी दानव दानासुर अब सोच में पड़ गया, वो सोचने लगा कि पता नहीं क्यों वसंत को आने में इतनी देर हो रही है ? वो रोज़ सोचता कि शायद कुछ दिनों में मौसम बदले। लेकिन वसंत नहीं आया, ना ही गर्मी आई। बरसात आई तो हर जगह पेड़ फलों से लदने लगे, लेकिन बरसात बोली दानव दानासुर तो बड़ा स्वार्थी है ! इसलिए वो स्वार्थी दानासुर के बगीचे के पेड़ों को कोई फल देने नहीं गई। परेशान दानव दानासुर कुछ दिन के लिए, जंगल के पार, कहीं दूर रहने वाले, अपने मित्र, पिपासु पिशाच के पास चला गया। जब वो कुछ महीने बाद लौटा तो उसने देखा कि उसके बगीचे की दीवार ठण्ड झेलते झेलते पुरानी हो चली है। देखभाल कि कमी से, दीवार के आस पास झाड़ियाँ उग आई थीं। जाड़ा बगीचे में ही जमा था, जाड़े के दोस्त, कोहरा, पाला, ओले, और उत्तरी हवा भी उसके बगीचे में ही थी।

दानव दानासुर लम्बे सफ़र से थका हुआ था, शाम भी हो चली थी तो वो घर में जाकर सो गया। अगली सुबह उसकी नींद देर से खुली। बाहर कहीं बड़ा अच्छा संगीत बज रहा था। दानव दानासुर ने सोचा शायद राजा के संगीतकारों का टोला इधर से गुजर रहा है। काफी देर तक जब संगीत बंद नहीं हुआ। आज उत्तरी हवा की सांय-सायं कि आवाज़ नहीं आ रही थी, ओले भी छत पर ठपा-ठप नहीं बज रहे थे। आखिर जब स्वार्थी दानव दानासुर से नहीं रहा गया, तो उसने खिड़की से बाहर झाँक कर देखा।

आश्चर्य ! उसकी पुरानी हो चली दीवार एक जगह से टूट गई थी। बच्चों ने समझा था कि स्वार्थी दानव तो कहीं बाहर गया हुआ है। इसलिए वो उसके बगीचे में घुस आये थे। पेड़ बच्चों के आने पर खुश हो गए थे और वो भी फूलों से लद गए थे ! फूलों के खिलने और फलों के आने से पक्षी भी बगीचे में लौट आये थे। जिसे स्वार्थी दानव संगीत समझ रहा था वो बच्चों का कोलाहल और चिड़ियों का कलरव था ! अचानक के बच्चों के आ जाने से घबराकर जाड़ा भाग खड़ा हुआ था। उसके साथ ही उत्तरी हवा, पाला, कोहरा जैसे उसके दोस्त भी भाग गए थे। दानव दानासुर अपने बगीचे को फिर से सजा देखकर पुलकित हो उठा।

मगर अचानक उसने देखा कि बगीचे के एक कोने में जाड़े का असर अब भी था। वहां एक ऊँचा सा पेड़ था। एक बहुत छोटा सा बच्चा उछल कर पेड़ पर चढ़ना चाहता था। पेड़ अपनी डालियों को झुकाता ताकि बच्चा उन्हें छू सके। छोटा बच्चा भी उचक कर डालियाँ पकड़ लेना चाहता था। लेकिन पेड़ बड़ा था, और बच्चा बहुत छोटा ! पेड़ तक बच्चे के ना पहुँचने पर फूल डालियों पर खिलते ही नहीं थे ! पेड़ पर ना चढ़ पाने के कारण बच्चा भी रोने लगा। दानव दानासुर चुपके से अपने घर से निकला। वो छुपकर, दबे पांव बच्चे के पीछे पहुंचा।

उसे छोटे बच्चे के पीछे खड़ा देखकर बाकी सारे बच्चे डर गए ! सहमे हुए बच्चों ने देखा कि दानव दानासुर ने छोटे बच्चे को दोनों हाथों में उठा लिया। छोटे बच्चे को लेकर दानव पेड़ के और पास गया। बच्चा छोटा था लेकिन दानव बहुत ऊँचा सा था। दानव दानासुर ने आसानी से छोटे बच्चे को पेड़ कि डाली पर बिठा दिया। बच्चा खुश हुआ और खिलखिला कर हंस पड़ा, और लो ! अचानक ही पेड़ में कलियाँ फूटने लगी। पेड़ फूलों से लद गया, उसमें फल आने लगे। अब दानव दानासुर को समझ में आ गया था कि उसके स्वार्थी हो जाने की वजह से ही पूरे साल उसके बगीचे में वसंत नहीं आया था। बच्चे भी समझ गए कि दानव उन्हें दबोचने, या भगाने वाला नहीं है। वो खुश होकर बगीचे में फिर से खेलने लगे।

अब तक दानव दानासुर अपने घर से एक बड़ा सा हथौड़ा निकाल लाया था। शाम तक उसने अपने बगीचे के चरों तरफ की दिवार गिरा दी थी। बच्चे अब फिर से बगीचे में खेल सकते थे। दानव दानासुर के बगीचे में वसंत लौट आया था।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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