बेन अफ्ल्लेक (Ben Affleck) की प्रतिभा आलोचकों ने उनकी पहली फिल्म में भी पहचान ली थी | उन्हें अपनी पहली फिल्म गॉन बेबी गॉन (Gone Baby Gone) के लिए ही आलोचकों के कई पुरस्कार मिले थे | इस फिल्म की कहानी दो जासूसों की कहानी है | बेन ने इसका स्क्रीन प्ले लिखा था | ये जासूसी और नैतिक प्रश्नों के घालमेल वाली ऐसी फिल्म है जिसे देखने के बाद आप सोच में पड़ जायेंगे कि सही क्या है और गलत क्या ?
फिल्म शुरू होती है दो निजी जासूसों पैट्रिक और उसकी गर्लफ्रेंड, एंजी से जो टीवी पर आ रहा एक महिला का अपनी बेटी को ढूँढने का प्रसारण देख रहे होते हैं | पैट्रिक और एंजी, दोनों जासूस जिस बच्ची को ढूँढने का विज्ञापन देख रहे होते हैं उस बच्ची की आंटी, बीटराइस, उनकी सेवाएँ लेती है ताकि बच्ची को ढूँढा जा सके | थोड़े ही समय में जासूसों को पता चलता है कि जिसने उन्हें बुलाया है उसने अपने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर एक ड्रग स्मगलर से काफी उधार ले रखा है | पैसे चुकाने के लिए उन्हें धमकियाँ मिल रही होती हैं |
कुछ दिन बाद जब बीटराइस का बॉयफ्रेंड मारा जाता है तो दोनों जासूस पुलिस के साथ मिलकर काम करने लगते हैं | पुलिस के जासूसों के साथ मिलकर काम करते हुए उन्हें पता चलता है कि फिरौती लेकर बच्ची को छोड़ा जाने वाला है | पुलिस कप्तान उन्हें फ़ोन पर हुई बात के बारे में बताता है | जहाँ पैसे का लेन-देन होने वाला होता है सब वहां पहुँचते हैं लेकिन वहां सिर्फ बच्ची की गुड़िया मिलती है | सबको लगता है कि बच्ची डूब गई | पुलिस कप्तान की बेटी कुछ साल पहले मर गई थी | उसे लगने लगता है कि सब उसी की गलती है और ग्लानी के मारे कप्तान रिटायरमेंट ले लेता है |
ये केस वहीँ ख़त्म होता है, अपराधी नहीं मिलते | कहानी आगे बढ़ती है और कुछ महीने बाद एक सात साल के बच्चे का अपहरण हो जाता है | इस बार अपहरण करने वाला बच्चों का यौन शोषण करने का ज्ञात अपराधी होता है | इस मामले में सभी जासूस मिलकर अपराधी तक तो पहुँच जाते हैं लेकिन गोलीबारी हो जाती है जिसमें एक पुलिस जासूस और अपराधी भी मारा जाता है | बच्चे को अपराधी ने पहले ही क़त्ल कर दिया होता है | ऐसा कैसे हुआ इसपर जब पूछताछ शुरू होती है तो पता चलता है कि पिछले वाले मामले के माफिया से एक पुलिस जासूस मिला हुआ था |
थोड़ी और पूछताछ में पता चलता है कि उसका कोई फ़ोन भी पुलिस ने रिकॉर्ड नहीं किया था | अब निजी जासूस को पता चलता है कि पुलिस कप्तान जिसकी बेटी मर गई थी उसने एक गैर जिम्मेदार माँ से उसकी बच्ची चुराने की साजिश रची थी | ऊपर से पुलिस के जासूस भी माफिया से मिले हुए थे | पैट्रिक की गर्लफ्रेंड का कहना था कि बच्ची अपनी माँ के पास जिस हाल में होती उस से तो बेहतर स्थिति में पुलिस कप्तान के पास है इसलिए ये राज खोला जाये या नहीं ये उसे समझ नहीं आ रहा | अब पैट्रिक पर पूरी जिम्मेदारी आ जाती है कि वो मूंह खोले और बच्ची को वापिस करवाए |
अब सवाल उठता है कि बच्ची की गैरजिम्मेदार माँ के पास उसे वापिस पहुँचाने से अच्छा था कि उसे पुलिस कप्तान के पास छोड़ दिया जाए | उसके अलावा पुलिस कप्तान की बेटी मर गई थी इसलिए उसने बच्ची चुरा ली थी ऐसे में बच्ची का कोई नुकसान करने के इरादे से अपहरण नहीं किया गया था | तो उसे पुलिस से पकड़वा देना भी सही नहीं लग रहा था | सबसे बड़ा सवाल यहाँ ये था कि कुछ हरकतें अपने आप में इतनी गलत होती हैं (बच्ची के अपहरण जैसी) कि किसी भी तर्क से उसे सही नहीं ठहराया जा सकता | और यही बड़ा सा आखिर का सवाल पूरी फिल्म की थीम है | इस फिल्म को पुरस्कृत भी इसी सवाल की वजह से किया गया था |
सच में देखा जाए तो कुछ हरकतें इतनी गलत होती हैं कि उन्हें किसी तरह से जायज ठहराना मुमकिन नहीं होता | हाल में हिन्दुओं को दो ऐसे हमले झेलने पड़े हैं | ऊपर से हमलावर अब पीड़ितों को ही दोषी भी ठहरा रहे हैं | एक हमला था भंसाली का पद्मावती बनाने का ढोंग कर के हमारे इतिहास का नैरेटिव बदलने की कोशिश | ये पहली बार नहीं है | आज जब आप फूलन देवी को याद करेंगे तो दलितों पर ऊँची जातियों के शोषण के तौर पर याद करेंगे | जबकि सच्चाई ये है कि वो खुद ही कहती थी कि उस के दोषी उसके खुद के पिता हैं जिन्होंने पैसों के लिए उसे बेचा | उसके चाचा और भाई भी जिन्होंने उसकी जमीन हड़पी | लेकिन बदले हुए नैरेटिव (narrative) में ये दलित-सवर्ण हो गया है |
ऐसा ही नैरेटिव बदलने का मामला टीपू सुलतान भी था | इस सीरियल को बनाने वालों ने कुछ इस तरह टीपू सुलतान को एक स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर धीमे से पेश किया था कि उसका असली चेहरा नजर ही नहीं आता | आज का सेक्युलर, मैकले शिक्षित एक बड़ा सा वर्ग एक क्रूर, सनकी, कट्टरपंथी, हिन्दू विरोधी के रूप में उसे देख नहीं पाता | कल हो सकता है कोई लड़ाई ना हारने वाले बाजीराव एक नाजुक मिज़ाज लवर बॉय के तौर पर देखे जाएँ | सिर्फ मजहब बदलने के कारण सत्तर साल पहले ही भारत को पकिस्तान बनते देखने वाले ये भूल जाएँ कि धर्म बदल कर मजहब होते ही देश भी बदल गया | अकारण ही लोगों को अपना दुश्मन होते डायरेक्ट एक्शन डे पर देख चुके लोग बेशर्मी से आपसे ये पूछें कि धर्म बदल जाने से क्या हो जाएगा ?
दूसरा हमला कम सुनाई दिया होगा | ये दिल्ली-मुंबई की किसी राजनैतिक-आर्थिक राजधानी में नहीं हुआ था ना, तो दरबारी पत्तरकारों की नजर नहीं पड़ी होगी | हज़ार साल से ज्यादा पुरानी एक गणेश जी की मूर्ती हुआ करती थी | उसे तोड़ दिया गया है | कैसे तोड़ा गया ? वो पहाड़ की चोटी जैसी जगह पे बना हुआ था | उसे वहां से धकेल कर नीचे गिरा दिया गया | दंतेवाड़ा के इलाके के ढोलका पहाड़ी पर बनी ये मूर्ती करीब 1100 साल से ज्यादा पुरानी थी और इस इलाके को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए सरकार ने हाल में ही दो करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी |
तथाकथित प्रगतिशील, लिबरल जमात के बगलबच्चा गिरोहों को इस से बड़ी समस्या होती | पर्यटन से इलाके का विकास होने लगता तो उनके आतंक की कारगुजारियों में शामिल कौन होता ? बस अपने इस्लामिक आतंकी भाइयों से प्रेरणा लेकर उन्होंने मूर्ती तोड़ दी | जिस “कलात्मक अभिव्यक्ति” की बात वो फिल्म बनाने में कर रहे थे उसी तर्क से इस मूर्ती के तोड़े जाने पर क्या कहेंगे ये तो वही जानें | लेकिन उनका ही इकॉनोमिक ब्लाकेड उनपर अजमाना जरूरी है | टोटल इनटॉलरेंस | उनकी बनाई फ़िल्में, नाटक, किताबें, पैसे लगा कर तो क्या फ्री में भी देखना बंद करना ही होगा | उनका ही बनाया प्रचार का तरीका भी उनपर ही आजमाए जाने की जरूरत है | फेसबुक पोस्ट से प्रिंट पैम्फलेट अख़बारों के जरिये उनतक भी पहुँचने चाहिए जो सोशल मीडिया नहीं पेड मीडिया पर ही निर्भर हैं |
बाकी जबतक आशु परिहार जैसे मामलों पर चुप्पी है तबतक उनकी रानी पद्मिनी पर हमला करने की भी हिम्मत होती रहेगी | हां, सोशल मीडिया पोस्ट के प्रिंट अख़बारों में डलवाना महंगा या मेहनत का काम लगता हो तो बन्धु आप जाने ही दें, आपसे ना हो पायेगा |
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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