क्रिस्टोफ़र कोलंबस का मानना था कि दुनियां गोल है। लेकिन वो ज़माना बाइबिल का था और सभी धार्मिक विद्वान मानते थे कि धरती चपटी है। इसलिए अगर समंदर के रास्ते कोलंबस अपना जहाज लेकर भारत ढूँढने निकलता तो वो किनारे पर जाकर नीचे टपक जाता ! जाहिर है जिस राजा को ऐसे बुद्धिजीवी सलाह दे रहे हों, वो ऐसे सफ़र के लिए जहाज और इजाज़त कैसे देते ? कोलंबस अड़ियल आदमी था।

उसने चर्च को सोने का लालच दिया, गुलामों का लोभ दिखाया मगर वो मानने के लिए राज़ी ही नहीं होते थे ! हर बार उनकी बात आकर ‘लॉजिकल रीजनिंग’ पर अटक जाती। हर बार कोलंबस से कहा जाता, कहाँ लिखा है दिखाओ ! कैसे मान लें तुम्हारी बात की धरती चपटी नहीं है ? हर बार कोलंबस निराश लौटता। आखिर कोलंबस ने तर्क पर लट्ठ जड़ देने का मन बनाया। वो तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ को उठाकर समुन्दर के किनारे ले गया।

उसने बताया कि अगर धरती चपटी होती तो दूर समुद्र से आता जहाज एक बार में ही पूरा दिखना शुरू हो जाता। ये पहले झंडा नजर आता है, फिर पाल और मस्तूल दिखते हैं, उसके बाद जहाज का मुख्य हिस्सा धीरे धीरे नजर आना शुरू होता है। इसको देखकर क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि जहाज किसी नीची जगह से ऊपर की तरफ आ रहा है ? अगर चपटी होती धरती तो ये गहराई-ऊंचाई का फर्क कैसे है ? हर जगह, फ़्रांस से इंग्लैंड से ग्रीस से ऐसा ही कैसे होता है कि वो जगह ऊँची हो जाती है और बाकी जगह नीची ?

इस साधारण से तर्क के लिए कोई वैज्ञानिक शोध का खर्च नहीं आया था। कोई बहुत पढ़ा लिखा होने की भी जरुरत नहीं थी। जरुरत थी तो बस ये मानने की कि सब कुछ कोई तथाकथित बुद्धिजीवी ही नहीं जानता। कोलंबस को जहाज भी मिला था। वो गलत जगह यानि अमेरिका जा पहुंचा था। वहां जब उसे प्रयाप्त सोना नहीं मिला तो वो चर्च का खर्चा चुकाने के लिए कई गुलाम पकड़ के ले गया था। जी हाँ, अपनी ही डायरी के मुताबिक कोलंबस कोई खोजी नहीं, बल्कि गुलामों का व्यापारी था।

कई बार लोग ये सोचकर नहीं लड़ते हैं कि हमारे विरोधियों के पास तो काफ़ी ज्यादा शोध (Research) से इकठ्ठा की हुई जानकारी है। लेकिन किसी भी तथाकथित बुद्धिजीवी के झूठ को आप अपनी सामान्य बुद्धि से समझ सकते हैं। आखिर उसे झूठ साबित करने के लिए कितने तर्क चाहिए ? यू ट्यूब पर मौजूद विडियो में उतनी जानकारी मिल जाएगी आपको। इन्टरनेट पर मुफ्त के लेख मौजूद होते हैं, उनसे पढ़कर आप खुद ही लिख सकते हैं। किसी और का मूंह कब तक देखेंगे ? कितना इंतजार करना है ?

अभी हाल का अमेरिका के कई स्कूलों में आजादी से पूर्व के भारत को “India” के बदले जब दक्षिण-एशिया नाम देने की मूर्खतापूर्ण वामपंथी कोशिश हुई तो ऐसे ही एक मामूली से तर्क से उन्हें रोका गया था। मामूली सा सवाल था कि अगर इंडिया 1947 से पहले था ही नहीं तो कोलंबस कहाँ का रास्ता ढूँढने निकला था ? आपके खुद सवाल ना करने का एक नतीजा ये भी है कि आपके सवालों के अभाव में आपके विरोधियों को कई विचारकों को गायब कर देने का मौका मिल जाता है।

लोहिया ने ‘राम, कृष्ण और शिव’ जैसे कई अच्छे लेख लिखे हैं लेकिन आपके समर्थन के अभाव में ऐसी किताबें गायब हो गई। जिन्होंने अपने पी राजन जैसे कार्यकर्ताओं की लाश बेच खाई, वो लोग आज भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के वामपंथी होने की घोषणा कर रहे हैं। कल तक जो ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की बातें कर रहे थे वो आज विरोध का स्वर उठाने वाले उत्कर्ष सिंह को कुचलने भी आ गए हैं। दीमक की तरह ख़ामोशी से, आपकी चुप्पी, आपकी ही नींव को खोखला करती जा रही है।

एक कोई डाटा चोरी का इल्जाम स्वीकार लेने वाली कंपनी इकलौती होती है क्या? जिसके बड़े दो चार अधिकारी पकड़े गए हैं उसमें काम करने वाले तो सैकड़ों होंगे ना? वो बेरोजगार बैठे रहेंगे एक कंपनी के बंद हो जाने पर, ऐसा तो हो नहीं सकता। उनमें से कुछ दूसरी जगहों पर नौकरी ढूँढने की कोशिश करेंगे, कुछ अपनी छोटी, बहुत छोटी संस्थाएं खुद ही शुरू कर लेंगे। ये कंपनी क्या कर सकती हैं इसका साफ़ अंदाजा तो नेताजी को हो चुका है। वो चुनाव में शराब-नोट भी बंटवाते रहे हैं, वो इनसे क्यों परहेज करेंगे?

अगला चुनाव सोशल मीडिया के जरिये ऐसी लड़ाइयाँ लड़ने वाली दर्जनों कंपनियों की जंग का भी होगा। फेबियन सोसाइटी का नारा जिसे आंबेडकर ने हिंदी में अनुवाद कर के अपना बना लिया था उसे याद कीजिये। “संगठित रहो, शिक्षित बनो, संघर्ष करो!” और हाँ अगर आप फेबियन सोसाइटी का नाम नहीं जानते, पढ़ने का समय नहीं निकाल पाते, तो किसी नेता तो पलटू, किसी को फेंकू, किसी को पप्पू कहते रहने का विकल्प भी है। बाकी नेताजी की कमाई पर आपकी गालियों से भी कौन सा असर पड़ना है? वोट से पड़ता लेकिन वो तो पढ़े-लिखे और अनपढ़ दोनों का बराबर ही है !

SHARE
Previous articleप्रकृति और धर्म: देवी शाकम्भरी
Next articleआखिर कब तक?
आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here