अगर मैं कहूँ कि ये जो पुरानी बिल्डिंग आप आज किसी और काम के लिए इस्तेमाल होती देख रहे हैं, इसमें कभी राजा का महल था तो आपको आश्चर्य तो बिलकुल नहीं होगा। सब जानते हैं कि मैथिलि को भी एक भाषा की तरह पढ़ाया जाए, इस उद्देश्य से दरभंगा महाराज ने नौलखा महल पटना विश्वविद्यालय को दान में दिया था। दरभंगा में मेडिकल कॉलेज बन सके इसके लिए उन्होंने पटना मेडिकल कॉलेज को भी काफी दान दिया।

इसी कीमत पर सरकार बहादुर ने मैथिलि भाषा कि पढ़ाई शुरू करवाई, और बिहार का दूसरा मेडिकल कॉलेज दरभंगा में बना। जब ये भवन बन रहा था तो पटना में करीब 109 पाठशालाएँ थीं, जिनमें से सिर्फ नौ में ईसाई पद्दति वाली मैकले मॉडल की पढ़ाई होती थी। बाकी सौ स्कूलों में कौन पढ़ता था पता नहीं। शूद्रों को तो शिक्षा नहीं दी जाती थी ना? हो सकता है तथाकथित ऊँची जातियों के लोगों की गिनती बिहार में काफी ज्यादा रही हो।

खैर तो मेरा मुद्दा आपको आश्चर्यचकित करने का था। इसके लिए हम आपको ये बता सकते हैं कि इसकी तीन मंजिलों में से दो में पटना विश्वविद्यालय के अलग अलग विभागों की कक्षाएं चलती हैं और एक मंजिल छुपा ली गयी है। इसमें एक पूरा तहखाना है, एक सुरंग भी है जो आमतौर पर रानी के गंगा-स्नान के लिए जाने में इस्तेमाल होता था। अशोक राजपथ की तरफ से आने पर दाहिनी तरफ का हिस्सा राजा का और बायीं ओर रानी का निवास था।

ये राजा-रानी के हिस्से अलग-अलग क्यों? बिलकुल डिवीज़न ऑफ़ लेबर वाला मसला है जो अभी भी चलता है। जैसे आपके घर अगर मैं मोटरसाइकिल या कार मांगने आऊँ तो मुझे शायद आपसे पूछना होगा, लेकिन अगर आपके पेड़ में लगा कटहल, या किचेन गार्डन में उगी धनिया में से मुट्ठी भर चाहिए, तो आपकी पत्नी से पूछना होगा। राजकाज के मसलों में भी आगन्तुक को राजा के पास जाना है या रानी के पास उस हिसाब से वो दाहिने-बाएं मुड़ता था।

जब ये बना तो इसके दोनों हिस्से बिलकुल एक से थे। महाराजा के लिए दरभंगा का लक्ष्मीविलास महल बनाते बनाते चार्ल्स मेंट का महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह से अच्छा परिचय हो गया था। दरभंगा का महल बनाने के बाद उन्होंने ही छोटे स्तर पर इन्डो-सोरोसेनिक शैली में इस भवन का निर्माण किया। कुछ वर्ष बाद राजा कामेश्वर सिंह ने 1898 के आस-पास इसके एक हिस्से में काली मंदिर बनवाया, जिसके लिए ये आज भी जाना जाता है।

जिस तहखाने पर टिकट लगाकर सरकार बहादुर को आय भी हो सकती थी, उसे बंद कर के रखा गया है। बरसों से बंद रहने के कारण वहां सांस लेने लायक हवा की कमी होगी। सुरंग भी टिकट लगाने के बदले बंद रखने की समाजवादी चतुराई दिखाई गयी है। आँगन (गंगा की तरफ) से जो सीढ़ियाँ छत या तहखाने में जाती हैं उन्हें बंद रखा जाता है। भवन में अक्सर मरम्मत का काम चलता रहता है जो हेरिटेज बिल्डिंग से काफी निम्न स्तर का है।

सिर्फ मंदिर से होने वाली अच्छी-खासी आय के वाबजूद सरकार बहादुर इस भवन के रखरखाव या सफाई पर ध्यान क्यों नहीं देती, ये पता नहीं। पटना के इतिहास पर गर्व से “पाटलिपुत्र” कहते छाती चौड़ी करने वाले नेतागण कभी इस भवन के लिए कुछ करेंगे, ऐसा सोचना शेखचिल्ली का ख्वाब ही होगा। हाँ हेरिटेज वाक के नाम पर कई युवाओं ने इसमें रूचि दिखाई। “बीती ताहि बिसारी के” हम भी आगे वाली पीढ़ी से ही ज्यादा उम्मीदें रखते हैं।

एक वजह ये भी है कि युवा और बुजुर्ग रोटी, कपड़ा, मकान, परिवार, नौकरी जैसे चक्करों में नहीं उलझे होते। इस वजह से भी उनका समय तो मिल जाता है बीच की उम्र के कई लोग नजर नहीं आते। अपने शहर की परंपरा, धरोहरों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना आपकी ही जिम्मेदारी है। जब भी मौका मिले ऐसी चीज़ें देख आइये…

#PatnaHeritageWalk

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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