कुछ दिन पहले ही नयी दिल्ली में ग्लोबल कान्फरेन्स ऑन साइबर स्पेस-2017 का आयोजन संपन्न हुआ. इस वर्ष GCCS-2017 की थीम थी “Cyber4All: A Secure and Inclusive Cyberspace for Sustainable Development”. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साइबर सुरक्षा पर बल देते हुए कहा, “Nations must also take responsibility to ensure that the digital space does not become a playground for the dark forces of terrorism and radicalization.”

प्रश्न है कि क्या जनभागीदारी के बिना साइबर सुरक्षा सम्भव है? कितने लोग वायरस और ट्रोजन के बीच अंतर समझते हैं? साइबर अपराध क्या हैं और किस प्रकार अंजाम दिए जाते हैं? साइबर अपराधी सिद्ध होने के लिए भारत सरकार किस कानून के अंतर्गत कार्यवाही करती है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर नीना गोड़बोले और सुनीत बेलापुरे की पुस्तक प्रदान करती है. साइबर सुरक्षा और कानून सम्बंधी दो प्रकार की पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं. एक तो तकनीकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए और दूसरी सिस्को, माइक्रोसॉफ्ट जैसे सर्टिफिकेशन कोर्स के लिए. ये दोनों ही पुस्तकें सामान्य नागरिक के लिए नहीं लिखी गयीं हैं. ऐसी परिस्थिति में गोड़बोले-बेलापुरे की यह स्वागत योग्य पुस्तक ऐसी भाषा में लिखी गयी है जो कक्षा बारह के छात्र से लेकर एक नौकरीपेशा व्यक्ति तक कोई भी समझ सकता है. साइबर अपराध की परिभाषा, अपराधी की कार्यविधि, मोबाइल एवं वायरलेस डिवाइस से किये जाने वाले साइबर अपराध, प्रॉक्सी सर्वर, फिशिंग जैसे अनेक शब्द हैं जिन्हें समाचारों में पढ़कर अधिक जानने की उत्सुकता जागृत होती है.

विद्यार्थियों के लिए किसी वेबसाइट अथवा डिजिटल मैगज़ीन पर पढ़ना सरल है किन्तु जिनके पास साइबर दुनिया को टटोलने का समय नहीं होता उनके लिए यह पुस्तक वरदान है. इस पुस्तक में सादे चित्रों के अतिरिक्त टेबल और ग्राफ क्लिष्ट टॉपिक को समझने में सहायता प्रदान करते हैं. बॉक्स आइटम उन टॉपिक्स को तुरन्त समझा देते हैं जहाँ पाठक अटक जाता है. इस पुस्तक में साइबर लॉ, भारत की साइबर नीति तथा साइबर फोरेंसिक पर भी सरल शब्दों में वृहद् विवेचना की गयी है जिसके कारण यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण रेफ़रेन्स बुक बन गयी है. एक स्तरीय अकादमिक पुस्तक की भाँति इस पुस्तक के प्रत्येक चैप्टर के अंत में सन्दर्भ पुस्तकें और वेब लिंक भी दिए गए हैं. आइआइटी स्नातक नीना गोड़बोले और सुनीत बेलापुरे ने एक ऐसी पुस्तक लिखी है जो किसी युवा को साइबर सिक्यूरिटी में करियर बनाने की ओर प्रेरित करने की क्षमता रखती है. देश को अधिक से अधिक साइबर सिक्यूरिटी प्रोफेशनल्स की आवश्यकता है.

 

इस पुस्तक में केवल एक ही कमी है कि यह 2011 में प्रकाशित हुई थी जिसके पश्चात इसका दूसरा संस्करण अभी तक नहीं आया है. यह भी सत्य है कि साइबर स्पेस की दुनिया में कोई पुस्तक ‘latest’ नहीं कही जा सकती. जब भी कोई पुस्तक प्रकाशित हो रही होती है तभी कहीं किसी नगर में कोई नया सॉफ्टवेयर बन रहा होता है. परंतु किसी भी विषय का बेसिक ज्ञान कभी पुराना नहीं होता. गोड़बोले और सुनीत बेलापुरे की यह पुस्तक साइबर सिक्यूरिटी के फंडामेंटल जानने के लिए अवश्य पढ़ें.

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