एक समय की बात है जब पिताश्री बड़े दरियादिल हुआ करते थे, उस ज़माने में बच्चों को अपने सपने पूरे करने के लिए पैसों का सोचना ही नहीं पड़ता था। बेटा कौन सा धंधा, कौन सा business शुरू करना चाहता है इस बात पे वो लोग ज्यादा ध्यान भी नहीं देते थे, धंधा चलेगा या नहीं, कमाई कैसी होगी जैसी चीज़ों से भी उन्हें कोई मतलब नहीं होता था। धीरे धीरे समय बदलता गया और पिताश्री भी बदलते बदलते डैड (Dad) हो गए। परिवर्तन सिर्फ पुकारने के नाम में नहीं हुआ, समय के साथ Dad भी Smart हो गए थे (हम स्मार्ट नहीं चतुर कहते है)। आज तो अठन्नी भी देने से पहले सौ सवाल किये जाते हैं। ऊपर नीचे, आगे पीछे हर तरफ से आपकी योजना की जांच की जायेगी। इसके बाद भी पैसे मिल जायेंगे इसकी गारंटी भी नहीं है। पैसे देने के मामले में सब मारवाड़ी हो जाते हैं, एक धेला भी खीसे से नहीं खिसकता। कहते हैं की बिल्लियाँ नौ बार मर मर के जी उठती हैं, लेकिन कोई business, कोई सपने जैसा काम शुरू करना बिल्ली होने से भी मुश्किल काम है। आपको सौ बार मर मर के जीना पड़ेगा।

 

अब ऐसे में क्या किया जाए? तो इसका जवाब है Crowdfunding, ये वो कला है जिस से आप कई लोगों से छोटी छोटी रकम इकठ्ठा करते हैं, थोड़े समय तक (30 दिन जैसा कुछ वक़्त) जब ये प्रक्रिया चल रही होतीहै तो 30-50 लाख रुपये की रकम इकठ्ठा हो जाती है। ये कैसे कामों के लिए इस्तेमाल होता है ये समझना है तो उदाहरण भी कई हैं, कम्युनिटी का रेडियो स्टेशन शुरू करने के लिए, गीतों का album बनाने के लिए, फ़िल्में बनाने के लिए, और अगर कहीं भारत के उदाहरण देखें तो और अनोखे उदाहरण हैं। किसी से उधार मांगने, किसी परिवार के सदस्य की मदद लेने या (भगवान न करे) किसी अनैतिक / अपराधिक कृत्य को अंजाम देने से तो कहीं बेहतर तरीका है पैसे इकठ्ठा करने का। इसके बारे में और सूचनाओं के लिए कई वेबसाइट हैं जहाँ से पढ़ा और सीखा जा सकता है जैसे की Catapooolt, Wishberry, Milaap, या फिर Igniteanintent। अपने प्रोजेक्ट की सूचनाएँ वहां से प्रसारित की जिये और पैसे धीरे धीरे इकठ्ठा हो जायेंगे।

 

यहाँ ये भी याद रहे की आपके प्रोजेक्ट का आर्थिक लाभ देने वाला प्रोजेक्ट होना भी जरूरी नहीं है। लोगों ने अपने लिए रेसिंग कार, राजनैतिक अभियान, क़िताबें, और राहत कार्यों के लिए कई बार Crowdfunding का इस्तेमाल किया है। www.wishberry.in एक भारतीय कंपनी है और इन्होने अब तक 3 करोड़ रुपये जुटाए हैं, इस से करीब 8000 projects फण्ड किये जा चुके हैं।

 

जरूरी है की आप अपने प्रोजेक्ट की pitch अच्छी हो। Pitch मार्केटिंग की या कहिये Sales की शब्दावली का शब्द है। गौर कीजिये जब आपके पास किसी होम लोन, या क्रेडिट कार्ड वाले की फ़ोन कॉल आती है। भाषा बिलकुल कसी हुई, सीधा आप से पूछेंगे की क्या इस वक़्त आपसे बात की जा सकती है, फिर बताएँगे की इस product की बात करनी है, अगर आप कोई सवाल करेंगे तो उनके पास हर सवाल का जवाब भी होगा। इसे Sales Pitch कहते हैं, ये पहले से तय होता है, कहीं लिखा हुआ होता है और फ़ोन करने वाले को ज़बानी याद होता है। अपना sales pitch बनाइये और याद कर लीजिये। तो सबसे पहले आपको अपने प्रोजेक्ट के लिए एक रिपोर्ट, जिसमे आप बताएँगे की आप क्या करने वाले हैं, कैसे करने वाले हैं, कितना वक़्त लगेगा, और किन लोगों को इस से क्या फायदा होगा। सबसे जरूरी चीज़, काम के किस हिस्से में कितना ख़र्च आएगा ये भी बताना होगा।

 

आपके sales pitch में ये ख़ास बातें होनी ही चाहिए :

  • अपने बारे में बताइए, अपने पूर्व के काम के बारे में बताइए, आपके साथ और कौन लोग जुड़े हुए हैं उनका जिक्र कीजिये
  • अपनी योजना के बारे में बताइए, ये कैसे अनोखा ये बताइए, आप क्यों इस प्रोजेक्ट में विश्वास करते हैं ये भी बतायें
  • आप कितने पैसे इकठ्ठा करने की योजना बना रहे हैं उस बारे में बात कीजिये, कैसे, कहाँ, क्या ख़र्च होगा उनपे भी चर्चा कीजिये
  • लोगों को बताइए की उन्हें क्यों पैसे इस काम में खर्च करने चाहिए
  • कुछ इनाम (फ्री पास, किताबें, diary) भी घोषित कर पायें तो और भी अच्छा

 

Crowdfunding में मोटे तौर पर तीन किस्म के निवेशक होते हैं। पहले वो लोग होंगे जो किसी छोटे मोटे से लाभ से आकर्षित नहीं हुए होते। ये वो लोग होंगे जो आपके जरिये अपने एक सपने को पूरा होता देखते हैं। राहत कार्यों जैसे सामाजिक भलाई के कामों में जो लोग पैसे दे रहे होते हैं वो किसी लाभ या हानी की चिंता नहीं कर रहे होते। सबसे ज्यादा फण्ड यहीं से आता है। दूसरी श्रेणी आपके peer group की होती है, ये वो लोग हैं जोवही काम कर रहे हैं जो आप कर रहे हैं और अपने क्षेत्र में आ रहे नए लोगों को कम समस्याओं का सामना करना पड़े इसलिए मदद करते हैं, जैसे स्थापित फिल्म निर्देशक अक्सर नए लोगों की मदद कर दें, या कोई IAS अफ़सर अपनी तैयारी के वक़्त की किताबें किसी छात्र को दान कर दे। तीसरी श्रेणी में वो लोग आयेंगे जिन्हें आपके काम में एक business के तौर पर रूचि है, वो थोड़े समय के लिए आपको उधार देते हैं, बाद में आप उन्हें पैसे लौटा दें धीरे धीरे या फिर आगे भी investor और पार्टनर के तौर पर अपने साथ ही रखें।

 

भारत में SEBI (Securities and Exchange Board of India) ने इस काम के लिए दिशा निर्देश जारी करने की पहल अभी हाल में ही की है। SEBI का मानना है की अभी 50 प्रतिशत Crowdfunding किसी न किसी आर्थिक लाभ के लिए होती है और उसे नियंत्रण में रखने की जरूरत है। अभी भी करीब 30 प्रतिशत पैसे आपको ऐसे लोगों से मिलते हैं जो किसी न किसी तरह से आपको जानते हैं।अब यहाँ काम आता है फेसबुक जैसा social networking का माध्यम। दिल्ली के फ़िल्मकार पवन श्रीवास्तव ने अपनी फिल्म “नया पता” के लिए पैसे अपने फेसबुक पेज के जरिये जुटाए थे। उनका कहना है की उन्होंने अपने फिल्म की synopsis के साथ अपनी करीब 500 पहचान वालों को email किया। उन्होंने सबसे करीब 5000 से ले कर 35000 रुपये की रकम का चंदा हर व्यक्ति से माँगा था। उन्होंने इस फिल्म के लिए करीब 350 लोगों से 8 लाख रुपये जुटाए। दूसरी कहानी है एक 29 वर्षीय IAS अफ़सर की, नाम है Armstrong Pame, वो मणिपुर में काम करते थे। उन्होंने बिना सरकारी मदद के लगभग 100 किलोमीटर लम्बी, गाड़ी चलाने लायक सड़क बनवाई है। सन 2013 में उन्होंने Tousem नाम के एक मणिपुरी गाँव को पड़ोस के असम और नागालैंड से जोड़ दिया। इस सड़क को आज People’s Road कहा जाता है। इस सड़क को बनाने का पूरा पैसा ऑनलाइन इकठ्ठा किया गया था। अमेरिका में स्थित स्टेचू ऑफ लिबर्टी अक्सर नज़र आ जाती है, इसका पूरा पैसा फ्रांसीसियों और अमरीकियों ने Crowdfunding से इकठ्ठा किया था। भारत में बनी फिल्म थी मंथन, इसे 1978 में shyam बेनेगल ने बनाया था, इसका पूरा पैसा गुजरात मिल्क कोआपरेटिव के पांच लाख सदस्यों ने दो दो रुपये का चंदा दे कर इकठ्ठा किया था।

 

कठिनाइयाँ

  • काफी कम समय में काफी ज्यादा योजना बनानी होगी जो लोग आपको पैसे देंगे वो महीने भर में काम शुरू होते भी देखना चाहेंगे। इसलिए आपको तेज़ी से अपने काम की योजना बनानी और कार्यान्वित करनी पड़ती है।
  • आप जिस माध्यम से अपने प्रोजेक्ट को दिखायेंगे उसके लिए आपके पास पहले से कुछ होना भी चाहिए। अगर फिल्म बनाने जा रहे हों तो आपकी कॉलेज, या बाद की बनाई हुए दो चार फ़िल्में, कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने जा रहे हैं तो कुछ सैंपल जैसी चीज़ें।
  • ज्यादातर वेबसाइट आपपे बैकग्राउंड चेक इस्तेमाल करती हैं, तो किसी का आईडिया चुराने या बेईमानी करने की सोच रहे हैं तो ऑनलाइन ये हरकत मत कीजिये। पहली बार शायद कामयाब हो भी जाएँ लेकिन, जिन्दगी में दोबारा आप फंडिंग नहीं जुटा पाएंगे।
(30 November, 2014)
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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