छोटे कस्बों में बड़े होने और बड़े शहरों में पले-बढ़े होने में छोटे मोटे अंतर होते हैं। जैसे कोई महंगा, ब्रांडेड बैग हम लोगों को पता ही नहीं था ! पता नहीं होता तो शौक कैसे होता खूबसूरत से बैग का ? कॉलेज-इंटरमीडिएट में हम लोग एक दो नोटबुक जिसे कॉपी कहते थे उसे एक पोलीथिन में भरते, साइकिल की कैर्रीयर या कई बार कमर में बेल्ट से फंसाते और निकल लेते। आज की पीढ़ी अगर कूल डूड की है तो ये पीढ़ियाँ कूल डूड के अब्बू और दादा जान की थी।

 

उस पीढ़ी की कलम शर्ट की जेब में होती थी।

 

ये कलम दरअसल बैच की तरह काम करती थी। उम्र के साथ जेब में पड़ी कलम को मिलाया जाता और नाम पूछने की जहमत के बदले सीधा “विद्यार्थी” कह कर बुलाया जाता। बिलकुल वैसा ही था जैसे आर्मी की ट्रेनिंग वालों को जी.सी.ओ कहते हैं। नाम ही जेंटलमैन कैडेट हो तो बर्ताव भी जेंटलमैन वाला ही करना पड़ेगा। सबकांसिअस माइंड जेंटलमैन या विद्यार्थी जैसे शब्द सुनते ही एक्टिव हो जाता था। इस “कलम कहाँ है ?” सवाल की परिधि में घर के बच्चे ही आते हों ऐसा नहीं था। अगर बारिश में भीग के घर जाते देखकर कोई वृद्धा बरामदे में आने कहती, तो वो भी पूछ लेती, बिना कलम के कौन से स्कूल-कॉलेज जाते हो ?

 

जेब में कलम और पास में कॉपी हो तो नोट कर लेने की सुविधा भी होती थी। भूलने पर वापिस पन्ने पलटाये जा सकते थे। फिर ये जो बूढ़े लोग, मेरे दादाजी वाली पीढ़ी के थे, वो गुजरने लगे। इनके बाद आ गया कूल डूड के अब्बा की जनरेशन ! अब ये जो कूल डूड के अब्बू की पीढ़ी थी, ये चचाजान नेहरु की सेक्युलर पीढ़ी थी। विदेशों से रिश्तेदारों के भेजे-लाये गिफ्ट से इन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा बनानी होती थी। तो ये “विद्यार्थी” जैसे हिंदी के पुरातनपंथी, पिछड़े शब्द का इस्तेमाल कैसे करते ? कूल डूड के अब्बू, बच्चों की हर जरूरत का ध्यान रखते थे तो महंगे बैग भी देने लगे थे। इसलिए कलम का भी मान लिया जाता कि बैग में इंस्ट्रूमेंट बॉक्स में होगी।

 

विद्यार्थी संबोधन का इस्तेमाल बंद होने लगा। जेब में कलम ना दिखने पर टोका जाना बिलकुल ही बंद हो गया। इंसान को अपने पढ़े हुए का अगले दिन सिर्फ 15% ही याद रहता है। बाकी अगर दोहराया ना जाए तो वो 85% से ज्यादा भूल जाएगा। ये एक वैज्ञानिक तथ्य है। याद रखने के लिए कम से कम तीन बार पढ़ना जरूरी होता है। लिखने में एक बार आप पढ़ते-सुनते हैं कि क्या लिखना है, दूसरी बार उसे लिखते समय अपने ही नोटबुक में खुद पढ़ते हैं, फिर कहीं अगर जांचा कि सही लिखा है या नहीं तो तीसरी बार भी पढ़ लेंगे।

 

यानि अलग से रिवाइज़ करने दोहराने की कम जरुरत होगी ज्यादातर आप को पहले ही याद हो चुका होगा। एक संबोधन “विद्यार्थी” और एक सवाल, “कलम कहाँ है तुम्हारी ?”, भूल जाने का नतीजा ये हुआ कि लिखना बंद होने लगा और उस से याद होना भी। पहले दोस्तों-रिश्तेदारों के फ़ोन नंबर भी याद होते थे अब नहीं होते। श्लोक याद होते थे, कविताएँ याद होती थी, लोककथाएँ याद रहती थी। इतिहास का कुछ बता देने पर फ़ौरन रिफरेन्स देना होता था कि कहाँ लिखा है। ये सब बंद।

 

कूल डूड के अब्बू की पीढ़ी को पता ही नहीं चला कि कब उसके सुबह के नाश्ते से पोहा, इडली, उत्तपम, चूड़ा-दही, लिट्टी, पराठे, जैसे दर्जन भर व्यंजनों की जगह मैगी और ब्रेड-ऑमलेट ने ले ली। अब कूल डूड पीढ़ी के अब्बू को याद आ रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ ! गौरतलब इसमें ये भी है कि तमाम कूल डूड के अब्बू वाली पीढ़ी वाले ही रोमिला, हबीब, टाइप 60 साल के इतिहासकारों ने अगली पीढ़ी के लिए किताबें भी लिख रखी हैं। जाहिर है इस से शुरू में बरगलाना आसान होता है। किस्मत अच्छी है कि अगली पीढ़ी के पास इन्टरनेट है। हालाँकि इन्टरनेट को सचमुच लाने वाले बुढऊ नरसिम्हा राव को भी कूल डूड के अब्बू की पीढ़ी ने धकिया के किनारे कर दिया था।

 

समस्या ये है कि अगर एक बार भागीरथ गंगा ले आये तो वो जहाँ जहाँ से गुजरेगी वहां से पाप तो धुलेंगे। अब की पीढ़ी में आ रही, लैंड ऑफ़ सेवेन रिवर्स, ओशन ऑफ़ चर्ण जैसी किताबें पढ़ी ही जाएँगी। इतिहास में से तथ्यों को गायब करने पर सवाल तो झेलने पड़ेंगे। अफिर्की कहावत है कि जब तक शेर खुद अपना इतिहास नहीं लिखवाते, शिकार की कहानियों में शिकारी को महिमामंडित किया जाता रहेगा। भारत अपने इतिहास पर वापिस दावा ठोक रहा है। कूल डूड के अब्बू चाहे कुछ भी कहें ! गर्व कीजिये, क्योंकि आप इतिहास सुधार के दौर में हैं !

SHARE
Previous articleआपका इतिहास फिल्मों के जरिये
Next articleसोशल मीडिया : रणनीति की जरूरत
आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here