रोते बच्चे को पिता की गोद में आराम ना मिले, चाचा-दादा, मौसी-नानी सब के पास रोता रहे तो भी माँ की गोद में जाते ही चुप कैसे हो जाता है? उसे वही सबसे सुरक्षित जगह क्यों लगती है? किसी भी किस्म के खतरे, किसी डर या संकट की घड़ी में बच्चे को ही नहीं, बड़े होने के बाद भी माँ की ही याद क्यों आ जाती है? ये मुश्किल सवाल है, शायद मनोविश्लेषक इसका बेहतर जवाब दे पायें। ऐसा होता है इसके लिए किसी वैज्ञानिक शोध की जरूरत तो नहीं। ऐसा होते हुए सभी ने अपने आस पास के समाज में हर रोज़ ही देखा है।

 

वीरता-शौर्य दर्शाने के लिए भी “माँ का दूध पिया है तो सामने आ!” का फ़िल्मी डायलॉग आसानी से याद आ जाता है। कुछ ही दशक पहले फिल्मों में ये संवाद सुनाई देना आम बात थी। समय बदलने के साथ जैसे ये संवाद बदला, वैसे वैसे समाज की अवधारणायें भी बदलती गयीं। उस दौर में ये आम अंधविश्वास था कि बच्चे को दूध पिलाने से माँ का फिगर बिगड़ जाता है। शहरों से ये अंधविश्वास तो समय के साथ गया, लेकिन गाँवों-कस्बों में इसकी जगह एक दूसरे अंधविश्वास ने ले ली। अब कई लोग मानते हैं कि माँ का पहला दूध बच्चे की सेहत के लिए अच्छा नहीं होता!

भारत जैसे देश में जहाँ माँ महत्वपूर्ण होती है, वहां माँ का दिया कुछ भी बच्चे के लिए नुकसानदेह हो सकता है, ऐसा मान लिया जाना ही मूर्खतापूर्ण है। वैज्ञानिक तौर पर भी माँ का पहला दूध बच्चे के लिए पहले टीकाकरण जैसा काम करता है। नहीं टीके का मतलब हर बार सुई लगाना ही नहीं होता। पोलियो ड्राप जैसे पिलाकर दिया जाता है, वैसे भी टीकाकरण होता है। दो साल की उम्र तक, जब तक बच्चे के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं हुई रहती, वो रोगों के प्रतिरोध के लिए माँ के शरीर में बने प्रतिरोधकों पर ही निर्भर होता है।

 

ऐसे ही प्रतिरोधकों की पहली खुराक उसे माँ के पहले दूध में जन्म के साथ ही मिल जाती है। माँ का पहला गाढ़ा दूध ‘कोलोस्ट्रम’ (colostrum) कहलाता है। ये ना सिर्फ पोषक तत्वों की आपूर्ति करता है बल्कि प्रतिरोधकों से भी भरपूर होता है। बच्चे के लिए यही पहला सुरक्षा कवच है। एक वहम अक्सर ये भी देखा जाता है कि बच्चे को प्यास लगी होगी इसलिए माँ के दूध के अलावा उसे पानी पिला दिया जाए। माँ के दूध में करीब सत्तर फीसदी पानी होता है और वो बच्चे के शरीर की पानी की जरूरतों को पूरा कर सकता है। उसे छह माह तक बाहर का पानी पिलाने की कोई जरूरत नहीं होती।

 

बाहर से बोतल से पानी पिलाने पर पानी को उबलना होगा, बोतल की सफाई अच्छी तरह करनी होगी। इन सब के वाबजूद बच्चे को बाहर के पानी से डायरिया जैसी पेट की बीमारियाँ हो सकती हैं। कई बार डॉक्टर के पास बच्चे को लेकर माता-पिता समझ नहीं पाते कि जब उन्होंने बाहर का कुछ खिलाया नहीं तो बच्चे को दस्त क्यों लगे हैं। अक्सर इसकी वजह अलग से बाहर का पानी पिला देना होता है। समाज में फैले ऐसे अंधविश्वास तोड़ना भी समाज की ही जिम्मेदारी होती है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है इसलिए इन्हें बदलने में धर्मगुरुओं का योगदान भी जरूरी हो जाता है।

 

भारतीय समाज में शिक्षा सम्बन्धी करीब-करीब सभी सुधार हिन्दुओं के संतों के ही किये हुए हैं, चाहे फिर वो रामकृष्ण मिशन आश्रम के हों, ब्राह्मो समाज के, स्वामी दयानंद से जुड़े या कोई और। सामाजिक सुधारों में भी कबीर, रैदास, सूरदास आदि का योगदान रहा है। शिवाजी के गुरु हों या विजयनगर साम्राज्य के संस्थापकों को धर्म में पुनः दीक्षित करने वाले सन्यासी, समाज के परिवर्तनों में धर्मगुरुओं का योगदान हमेशा से रहा ही है। ऐसे छोटे बदलावों में शिक्षित करने के लिए भी धर्मगुरुओं को आगे आना होगा। उनकी सहमती, उनके उपदेश से ऐसे बदलावों की स्वीकार्यता बढ़ती है। समाज के व्यापक हित में धर्मगुरुओं को माताओं और नवजातों के हित में भी आगे आना चाहिए।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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