फिरंगियों से  बचने के लिए एक हट्टा कट्टा युवक एक तूफानी रात को एक घर में जा पहुंचा | वहां एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। युवक को डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने शरण देने से इनकार कर दिया लेकिन जब युवक ने अपना परिचय दिया तो उसने उन्हें ससम्मान अपने घर में शरण दे दी | बातचीत से युवक को आभास हुआ कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में कठिनाई आ रही है | उस युवक ने महिला को कहा, “मेरे सिर पर पांच हजार रुपए का इनाम है, आप फिरंगियों को मेरी सूचना देकर मेरी गिरफ़्तारी पर पांच हजार रुपए का इनाम पा सकती हैं ! जिससे आप अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न करवा सकती हैं !”
यह सुन विधवा रो पड़ी, “भैया ! तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है | मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती |” यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र युवक के हाथों में बाँध कर देश-सेवा का वचन लिया | सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो युवक जा चुका था और तकिए के नीचे 5000 रूपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- “अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आज़ाद।”
ऐसा नहीं था की “आज़ाद” के जीवन का सिर्फ़ यही एक प्रसंग है जिसे याद किया जा सके | उनका जन्म एक आदिवासी ग्राम भावरा में 23 जुलाई, 1906 को हुआ था | उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदर गाँव के रहने वाले थे | भीषण अकाल पड़ने के कारण वे अपने एक रिश्तेदार का सहारा लेकर ‘अलीराजपुर रियासत’ के ग्राम भावरा में जा बसे थे | इस समय भावरा, मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले का एक गाँव है | उनकी आर्थिक स्थिति ऐसे में अच्छी तो नहीं ही थी |
पंडित सीताराम तिवारी स्वाभिमानी तो थे ही ऊपर से जरा सख्त स्वभाव के भी थे | एक बार जब घर में नमक न होने पर उनकी पत्नी पड़ोसी से नमक मांग लायी तो सजा के तौर पर पूरे परिवार ने चार दिन तक बिना नमक का खाना खाया था | बचपन आदिवासी इलाकों में गुजरने के कारण चंद्रशेखर छोटी उम्र में ही निशाना लगाना भी सीख गए थे |
एक बार गाँव के सारे बालक मिलकर दीपावली की खुशियाँ मना रहे थे। किसी बालक के पास फुलझड़ियाँ थीं, किसी के पास पटाखे थे और किसी के पास मेहताब की माचिस | बालक चन्द्रशेखर के पास इनमें से कुछ भी नहीं था | वह खड़ा–खड़ा अपने साथियों को खुशियाँ मनाते हुए देख रहा था। जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, वह उसमें से एक तीली निकालता और उसके छोर को पकड़कर डरते–डरते उसे माचिस से रगड़ता और जब रंगीन रौशनी निकलती तो डरकर उस तीली को ज़मीन पर फेंक देता था |
बालक चन्द्रशेखर से यह देखा नहीं गया, वह बोला, “तुम डर के मारे एक तीली जलाकर भी अपने हाथ में पकड़े नहीं रह सकते। मैं सारी तीलियाँ एक साथ जलाकर उन्हें हाथ में पकड़े रह सकता हूँ |” जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, उसने वह चन्द्रशेखर के हाथ में दे दी और कहा, “जो कुछ भी कहा है, वह करके दिखाओ तब जानूँ !”
बालक चन्द्रशेखर ने माचिस की सारी तीलियाँ निकालकर अपने हाथ में ले लीं | वे तीलियाँ उल्टी–सीधी रखी हुई थीं, मतलब कुछ तीलियों का रोगन चन्द्रशेखर की हथेली की तरफ़ भी था। उसने तीलियों की गड्डी माचिस से रगड़ दी। भक्क करके सारी तीलियाँ जल उठीं। जिन तीलियों का रोगन चन्द्रशेखर की हथेली की ओर था, वे भी जलकर चन्द्रशेखर की हथेली को जलाने लगीं। असह्य जलन होने पर भी चन्द्रशेखर ने तीलियों को उस समय तक नहीं छोड़ा, जब तक की उनकी रंगीन रौशनी समाप्त नहीं हो गई। जब उसने तीलियाँ फेंक दीं तो साथियों से बोला, “देखो हथेली जल जाने पर भी मैंने तीलियाँ नहीं छोड़ीं |”
उसके साथियों ने देखा कि चन्द्रशेखर की हथेली काफ़ी जल गई थी और बड़े–बड़े फफोले उठ आए थे। कुछ लड़के दौड़ते हुए उसकी माँ के पास घटना की ख़बर देने के लिए जा पहुँचे। उसकी माँ घर के अन्दर कुछ काम कर रही थी | चन्द्रशेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी बाहर के कमरे में थे | उन्होंने बालकों से घटना का ब्योरा सुना और वे घटनास्थल की ओर लपके। बालक चन्द्रशेखर ने अपने पिताजी को आते हुए देखा तो वह जंगल की तरफ़ भाग गया। उसने सोचा कि पिताजी अब उसकी पिटाई करेंगे। तीन दिन तक वह जंगल में ही रहा। एक दिन खोजती हुई उसकी माँ उसे घर ले आई | उसने यह आश्वासन दिया था कि तेरे पिताजी तेरे से कुछ भी नहीं कहेंगे |
चन्द्रशेखर जब बड़े हुए तो वह अपने माता–पिता को छोड़ कर बनारस  जा पहुँचे | उनके फूफा जी पंडित शिवविनायक मिश्र बनारस में ही रहते थे | कुछ उनका सहारा लिया और कुछ खुद भी जुगाड़ बिठाया और ‘संस्कृत विद्यापीठ’ में भर्ती होकर संस्कृत का अध्ययन करने लगे | उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी | विदेशी माल न बेचा जाए, इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेट कर धरना देते थे | 1919 में हुए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार ने चंद्रशेखर को काफ़ी व्यथित किया था |
चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे | तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी | जब गांधीजी ने सन् 1921 में असहयोग आन्दोलन का फरमान जारी किया तो वह आग  ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली और आखरी बार गिरफ़्तार हुए | उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट की अदालत में पेश किया गया | मि. खरेघाट बहुत कड़ी सजाएँ देते थे | उन्होंने बालक चन्द्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया –
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“मेरा नाम आज़ाद है।”
“तुम्हारे पिता का क्या नाम है?”
“मेरे पिता का नाम स्वाधीन है।”
“तुम्हारा घर कहाँ पर है?”
“मेरा घर जेलखाना है।”
मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए | उन्होंने चन्द्रशेखर को पन्द्रह बेंतों की सज़ा सुना दी | उस समय चन्द्रशेखर की उम्र केवल चौदह वर्ष की थी। जल्लाद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बालक चन्द्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए। प्रत्येक बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी। पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चन्द्रशेखर को बचपन से ही था | वह हर बेंत के साथ “महात्मा गांधी की जय” या “भारत माता की जय” बोलते जाते था। जब पूरे बेंत लगाए जा चुके तो जेल के नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने पैसे रख दिए। बालक चन्द्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुँह पर दे मारे और भागकर जेल के बाहर हो गया। इस पहली अग्नि परीक्षा में सम्मान सहित उत्तीर्ण होने के फलस्वरूप बालक चन्द्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनन्दन किया गया। अब वह चन्द्रशेखर आज़ाद कहलाने लगे |
इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है- ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के कोजिसकी उम्र 15 या 16 साल की थी और जो अपने को  आज़ाद  कहता थाबेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थेवह भारत माता की जय!‘ चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहाजब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के आतंककारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना | पं०जवाहरलाल नेहरू [ 1. जवाहरलालनेहरू (अनुवादक: हरिभाऊ उपाध्याय) मेरी कहानी  1995 पेज 73-74 और 2. मदनलाल वर्मा ‘क्रान्त’ स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (भाग-दो) पेज 474]
और इस तरह बनारस केन्द्रीय कारागार की उस 15 बेतों की सज़ा ने चंद्रशेखर को चंद्रशेखर “आज़ाद” बना दिया
(February 27, 2015)
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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