जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद चंपारण सत्याग्रह पर किताब लिखने बैठे तो वो किताब ढाई सौ पन्ने की हो गई | ऐसे ज्ञानी लोगों को जिस काल के बारे में लिखने में इतने शब्दों की जरूरत पड़ती हो उस दौर का हम आज बस अंदाजा ही लगा सकते हैं | ये दौर सौ साल पहले के चंपारण का था, चंपारण जिसके नाम में ही ‘रण’ है | लेकिन ये रण जरा अनोखा था, यहाँ एक ओर तो सशस्त्र प्रशासनिक बल थे, मगर दूसरी ओर के निहत्थे किसान ‘अहिंसा’ के सिद्धांतों पर अडिग डटे थे |

Dr_Rajendra_Pd._DR.Anugrah_Narayan_Sinha_Champaran_Movement

चंपारन सत्याग्रह में डॉ राजेन्द्र प्रसाद एवं डॉ अनुग्रह नारायण सिंह

 

चम्पारण आन्दोलन की एक ख़ास बात ये भी थी कि किसानों के इस अन्दोलन का नेतृत्व बुद्धिजीवी कर रहे थे | गांधीजी, राजेन्द्र प्रसाद, बृजकिशोर प्रशाद और मौलाना मजहरुल हक़ जैसे नेताओं ने इसका नेतृत्व संभाला | इसकी वजह से आन्दोलन अपनी दिशा से कभी भटका नहीं और अपने उद्देश्यों के प्रति अवाम स्पष्ट थी | जब 10 अप्रैल 1914 को चम्पारण के किसानों की दुर्दशा पर बिहार प्रान्त की कांग्रेस कमिटी की बैठक में चर्चा हुई तो सबने माना कि किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है | इसी से निपटने के लिए और मौजूदा हालात की जानकारी लेने के लिए प्रांतीय कांग्रेस कमिटी ने 1915 ने एक जांच समिति को चम्पारण के हालात का जायजा लेने भेजा |

 

इस जांच समिति के बाद 1916 में, भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के लखनऊ सत्र में, चम्पारण के किसानों पर चर्चा हुई | तय किया गया की किसानों को फौरी तौर पर राहत और मदद की जरूरत है | चम्पारण के जिला मजिस्ट्रेट, डब्ल्यू.बी.हेकॉक को, 14 मई, 1917 की अपनी चिट्ठी में गांधीजी ने किसानों की दुर्दशा से परिचित करवाया | गांधीजी किसानों और जमींदारों के बीच बेहतर सम्बन्ध चाहते थे |

 

उधर डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए चम्पारण की स्थिति आँखों देखी थी | किसानों के अमानवीय स्थितियों में जीवनयापन से वो अत्यंत व्यथित थे | सतही फैक्ट्री और उसके आस पास के कारखानों में 1908 में ही किसानों ने नील उगाने और उसके शोधन से मना कर दिया था | इस आन्दोलन को कुचलने के लिए 19 लोगों को दिसंबर 1908 में सजा दी गई थी | इसके अलाव इसी आन्दोलन से जुड़े 200 लोग ऐसे थे जो उस वक्त मोतिहारी की जेल में मुकदमा शुरू होने के इंतज़ार में बंद पड़े थे | उनपर जानलेवा हमले और आगजनी जैसे अभियोग लगाए गए थे |

 

ऐसे माहौल में अप्रैल 1917 में चम्पारण के किसानों का आन्दोलन शुरू हो गया | किसानों को कुचलने के लिए फिरंगी हुकूमत ने कोई कसर नहीं उठा रखी | डंगर और डोम समुदाय के लोगों को मारने पीटने के अलावा उन्हें प्रताड़ित करने के लिए उनके सीने पर भारी वजन रखकर बाँध दिया जाता | शायद छाती पर मूंग दलना जैसी कहावतें भी यहीं से जन्मी |

 

कई लोगों ने शायद स्कूल के ज़माने में, “मुर्गा बनाने” की सजा झेली होगी | पैरों के नीचे से हाथ निकाल कर फिर उन्हें गर्दन के पीछे बाँध देना भी यातना का एक तरीका था | नीलहे गोरे अक्सर ये सजा काम करने से इनकार करने वाले किसानों पर इस्तेमाल करते थे | इसके अलावा नीम के पेड़ से हाथ बाँध दिए जाते | पेड़ पर मौजूद लाल चीटियाँ जहाँ एक तरफ काट रही होती, वहीँ पीठ पर फिरंगियों की बेंत पड़ती | ऐसी अमानुषिक, बर्बर यातनाएं झेल रहे किसानों का आन्दोलन था चम्पारण का रण |

 

आज भले ही इस बात पर आश्चर्य हो, लेकिन ये आन्दोलन पूरी तरह अहिंसक था | इस आन्दोलन की सफलता ने भारत के किसानों को ऐसे और भी आन्दोलन छेड़ने की प्रेरणा दी | इस आन्दोलन की सफलता के स्वरुप में ही 1 मई 1918 को तत्कालीन गवर्नर जनरल ने चम्पारण किसान कानून (Champaran Agrarian Act) लागू किया | आख़िरकार उस दौर के वामपंथी नेता इ.एम.एस. नम्बूदरीपाद ने भी माना था कि ये एक सफल किसान आन्दोलन था | उन्होंने कहा था कि फिरंगी नील के सौदागरों और उनकी अफसरशाही के विरोध के वाबजूद गांधीजी और उनके साथी, आन्दोलन को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने में कामयाब हुए |

 

कुछ ऐसे भी बुद्धिजीवी रहे जिन्होंने चम्पारण के आन्दोलन को सफल नहीं माना | जैसे कि रमेश चन्द्र दत्त जैसे लोगों का मानना है कि इस आन्दोलन ने जमींदारो द्वारा किसानों के शोषण पर प्रहार नहीं किया | अत्यधिक लगान और बंधुआ मजदूर बनाने वाले कर्ज से तो ये आन्दोलन लड़ा ही नहीं था | जमींदारी प्रथा पर गांधीजी और राजेन्द्र प्रसाद दोनों की चुप्पी पर उन्हें आश्चर्य भी हुआ | गरीबी जो कि ऐसी अव्यवस्था की जड़ थी, उसके खिलाफ ये आन्दोलन था ही नहीं !

 

ऐसे छिटपुट विरोधों के बीच भी एक सविनय अवज्ञा का आन्दोलन कायम रखना भारतीय परम्पराओं की, अहिंसा की, विजय मानी जा सकती है | इस आन्दोलन से ही जमींदारों द्वारा किसानों का शोषण बिलकुल ठहर गया हो ऐसा भी नहीं है | लेकिन हां, इस पहली विजय ने ये बता दिया था कि ताकतवर दुश्मन के खिलाफ युद्ध केवल नैतिक बल से भी जीता जा सकता है | आज सौ साल बीतते हैं, मगर चम्पारण से शुरू हुआ ये रण अभी बाकी है |

SHARE
Previous articleमहाभारत किसकी कहानी है ?
Next articleबोहाग बिहू
आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here