अंग्रेजी का एक जुमला है Building Narrative, जिसका मोटे तौर पर मतलब होता है किस्से गढ़ना | आप इसे भूमिका बांधना भी कह सकते हैं | ये पेड मीडिया में इस्तेमाल होने वाली एक ऐसी बेईमानी है जिसमें आम तौर पर सभी जाने माने तथाकथित बुद्धिजीवी सिद्धहस्त होते हैं | तुलनात्मक रूप से आम हिन्दुओं को ऐसी मक्कारी से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता | इसे सीखना है तो बताइये दुर्योधन किस बात पर द्रौपदी से इतना नाराज था कि मामला चीर हरण तक आ गया ? शायद आपका जवाब होगा कि द्रौपदी ने “अंधे का पुत्र अँधा” कह दिया था | दुर्योधन पर इन्द्रप्रस्थ में हंसी थी, इसलिए |

 

ये गलत जवाब है | अगर आप सोचते हैं ऐसा कुछ हुआ था तो चलिए आपको महाभारत फिर से दिखाते हैं | सन 1930 में पुणे के भंडारकर इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएण्टल रिसर्च ने महाभारत के प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया था | जब वो जांच करने बैठे तो उन्हें साढ़े बारह सौ से ज्यादा, जी हां, 1261 अलग अलग पाठों वाली महाभारत की प्रतियाँ मिली | तो सबको मिला कर जांच शुरू की गई कि शुद्ध कौन सा है | सही संस्कृत और एक दुसरे से मिलान के बाद सन 1961 में भंडारकर इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएण्टल रिसर्च की महाभारत आई | इसे सबसे शुद्ध पाठ माना जाता है | जब आप महाभारत का अध्ययन करने वालों से पूछेंगे या किताबों में देखेंगे तो वो इसे छोटे में BORI CE, या क्रिटिकल एडिशन (CE) लिखते हैं |

 

महाभारत पर जो भी आप पढ़ते हैं, या पढ़ चुके हैं, पूरी संभावना है कि वो “संक्षिप्त” या फिर “संशोधित” है | ऐसा इसलिए क्योंकि पूरी पूरी महाभारत का अब तक सिर्फ छह बार अनुवाद हुआ है | ऐसा करने वालों में चार भारतीय हैं | दो अमेरिका में करने की कोशिशें हुई हैं, (University of Chicago और Clay Institute) मगर इन दोनों के पूरा हो जाने की मेरे पास अभी तक कोई सूचना नहीं है | सबसे पुराना वाला जिसे पढ़ा जाता है, वो है केसरी मोहन गांगुली का किया हुआ अनुवाद | वो इन्टरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध है, चाहें तो डाउनलोड कर लीजिये | उन्होंने जिस वाले का अनुवाद किया था उसे बर्धवान संहिता कहते हैं | जो वाली गीता प्रेस से मिलती है वो दक्षिणात्य संहिता का अनुवाद है | सबसे नया वाला बिबेक देबरॉय का किया हुआ अंग्रेजी अनुवाद है जो मेरे ख़याल से 2014-15 में पूरा हुआ होगा |
जो बिबेक देबरॉय का अनुवाद है वो 10 वॉल्यूम में आया है हरेक करीब 600 पन्ने का कीमत 300 के आस पास | गीता प्रेस वाली किताब बड़े आकार की होती है इसलिए वो छह वॉल्यूम में अंट गई है | केसरी मोहन गांगुली वाली भी इतनी ही वृहत है | अब अगर अंदाजा हो गया हो कि आपने इसे नहीं पढ़ा है तो वापिस अपने शुरूआती सवाल पर आते हैं | क्या द्रौपदी ने दुर्योधन को “अंधे का पुत्र अँधा” कहा था ? तो जवाब है, नहीं कहा था | कह भी नहीं सकती क्योंकि आगमन के समय उसे फ़ौरन देखने के लिए वो आई नहीं होगी | अन्दर कहीं रानीवास में होंगी | केसरी मोहन गांगुली वाले में भी नहीं मिलेगी | चाहें तो कोशिश कर लीजिये ढूँढने की | तो सवाल है कि फिर ये कहानी “गढ़ी” कैसे गई ? कैसे ये नैरेटिव बिल्ड किया गया ?

 

इसके जवाब के लिए थोड़ा और आगे आना होगा | थोड़े साल पहले तक एक हिंदी पत्रिका होती थी “धर्मयुग” | उसके संपादक थे जाने माने धर्मवीर भारती | हो सकता है आपने इनका नाम “गुनाहों के देवता” के लिए सुना होगा | उनका लिखा एक नाटक था “अँधा युग” जो कि महाभारत पर आधारित है | उनके महाभारत से “प्रेरित” इस नाटक को कई पुरस्कार भी मिले हैं, इसका अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ है | ये जो “अंधे का पुत्र अँधा” वाला डायलॉग है ये वहीँ से उठाया गया है | इसी से फिर ये बी.आर. चोपड़ा के सीरियल में आया और फिर वहीँ से आप इसे जानते हैं | तो जनाब जनाब इस तरह से जाना माना “अंधे का पुत्र अँधा” वाला नैरेटिव बिल्ड हुआ है |

 

बाकी पढ़ना और सवाल उठाना सीखिए | खुद पढ़ के किया हर सवाल, ऐसे बिल्ड किये नैरेटिव के, गढ़े हुए किस्सों के, दो चार किले तो गिरा ही देगा | काहे कि उनकी मक्कारी की तुलना में आपका बचपना तो जो है सो हैइये है !

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