मीठी-मीठी बातें ज्यादा सुनने को मिलती हैं, और सच कम सुनाई देता है। सिर्फ जानकारी का अभाव कारण नहीं, ऐसा सच के कड़वे होने और उस से लोगों की “भावना आहत” हो जाने के डर से भी होता होगा। इसके ऊपर से अगर मुद्दा ऐसा हो जिसपर दस लोगों के बीच बात करने में संकोच होता हो तो समस्या और भी गंभीर हो जाती है। मनुष्य वैज्ञानिक तौर पर एक स्तनपायी जीव जरूर है, लेकिन बच्चों को स्तनपान करवाने सम्बन्धी बात आम तौर पर समाज में खुले में नहीं होती।

 

मातृत्व स्त्रियों का विशेषाधिकार है, ये मुद्दा भी उनके लिए ज्यादा जरूरी होता है। ज्यादातर ये आधी आबादी संकोच में ही सही जानकारी से वंचित रह जाती हैं। जिन महिलाओं ने हाल में मातृत्व का सुख प्राप्त किया हो उनके लिए ये जरूर जानने लायक विषय है। किसी दौर में जब संयुक्त परिवार हुआ करते थे, तो घर में अनुभवी महिलाऐं भी होती थीं। उनसे बात करने पर समस्या ना सुलझे या उन्हें जानकारी ना हो तो डॉक्टर से मिलने की सलाह भी आसानी से मिल जाती थी।

 (चित्र में बारहवीं शताब्दी की यशोदा-कृष्ण की पुक्कोटइ की मूर्ती – इन्टरनेट से साभार)

(चित्र में बारहवीं शताब्दी की यशोदा-कृष्ण की पुक्कोटइ की मूर्ती – इन्टरनेट से साभार)

एकल परिवारों की शुरुआत के साथ ही भारत की महिलाओं के एक बड़े वर्ग के पास से घर में मौजूद सलाहकार गायब हो गए। इसके साथ ही एक भ्रान्ति उठी कि बच्चों को स्तनपान करवाने से फिगर बिगड़ जाता है। ये भ्रान्ति पिछले कुछ वर्षों में, शायद इन्टरनेट के प्रभाव से ख़त्म हो चली है। इसलिए स्तनपान पर चर्चा के वक्त इसकी बात करना समय की बर्बादी ही कहा जा सकता है। हाँ, स्तनपान की बात के साथ “Back to the Roots” यानि सांस्कृतिक जड़ों की तरफ लौटने की बात जरूर की जा सकती है।

 

जैसे बोतल के दूध में जो कृत्रिम निप्पल लगा होता है उस से बच्चों को चूसने में मेहनत नहीं करनी पड़ती। ये कुछ वैसा ही है जैसे एक जाने-माने परिक्षण में लार्वा से प्यूपा बनने के बीच तितली की मदद करके दिखाते थे। मुश्किल से खोल से बाहर आने के लिए जद्दोजहद कर रही तितली का शरीर, उसके पंख उसी संघर्ष से मजबूत होते हैं। दयाभाव में उसकी मदद करने का मतलब होता है कि उसके शरीर का पूरा विकास नहीं होगा। कमजोर तितली समय से पहले ही मर जायेगी।

 

बहुत ज्यादा सुरक्षा के वातावरण में बच्चों के बड़े होने पर वो विषम सामाजिक परिस्थितियों का सामना करने में नाकाम साबित होंगे। चूसकर पोषण ग्रहण करने की मेहनत से बच्चे को बचाना, उसे बोतल थमा देना भी उसके मानसिक विकास में बाधक होता है। दिमाग की कोशिकाओं (सेल्स) का निर्माण काफी हद तक दो वर्ष की आयु होते होते ही हो जाता है। इस उम्र में अगर उसे स्तनपान नहीं करवाया गया है, माँ का दूध नहीं मिला, तो इस बात की पूरी संभावना है कि उसका मानसिक विकास पूरा नहीं होगा। बाद में जब उसका आई.क्यू. दूसरे बच्चों से कम लगे तो समझ लेना चाहिए कि क्या हुआ होगा।

 

दिए की सी संरचना का एक प्याऊ (चम्मच जैसी चीज़) पुराने दौर में बच्चों को दूध पिलाने के लिए इस्तेमाल होती थी। जब बहुत जरूरी हो, माँ का दूध किन्हीं कारणों से उपलब्ध ना हो, उस समय भी बोतल के बदले डॉक्टर चम्मच / प्याऊ से बच्चों को दूध पिलाने की सलाह देते हैं। परंपरागत तकनीक की ओर लौटना कई बार रूढ़िवादिता नहीं होती। उल्टा ये प्रगतिशील कहलाने के लालच में अपने बच्चे का नुकसान कर डालने से कहीं बेहतर है।

 

स्तनपान से माँ के शरीर में बनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अपने आप ही बच्चे के शरीर में चली जाती है। स्तनपान करने वाले बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) बोतल से दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में ज्यादा होगी। दो साल तक उनकी अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता का उतना विकास नहीं हुआ होता, इसलिए भी वो माँ के प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर होते हैं। बोतल की साफ़ सफाई भी कठिन काम है। छोटे बच्चे के लिए मामूली चूक भी नुकसानदेह हो सकती है। छह माह तक के बच्चों को सिर्फ माँ का दूध मिले तो डायरिया या कॉलरा जैसी बिमारियों की संभावना उनके लिए ऐसे ही ख़त्म हो जाती है।

 

दो हजार साल से ज्यादा समय लगातार चली आ रही हिन्दुओं की परम्पराएं अजीब लगती जरूर हैं, मगर वो किन्हीं कारणों से बनी होंगी। अगर बरसों से टिकी हुई हैं टूटी नहीं तो उसके पीछे भी कोई कारण होगा। संक्रमण से यहाँ घुस आये मिथकों को निकाल कर बाहर करना ही होगा। नवजात शिशुओं के लिए भी बाहर का कोई भोजन बंद रखिये। स्तनपान श्रेष्ठ है।

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