भारत ने अब तक चार युद्ध लड़े हैं जिनमें हमारे सैनिकों ने अप्रतिम शौर्य और साहस का प्रदर्शन किया है। प्रत्येक युद्ध का औपचारिक अथवा अनौपचारिक इतिहास लिखा गया है तथा पदक विजेता वीर सैनिकों की गाथाएं सुनाई जाती हैं। किंतु शांतिकाल में हमारी सेनाएं किस प्रकार देश की रक्षा करती हैं सामान्यतया देश की जनता इससे अनभिज्ञ ही रहती है। करगिल विजय को छोड़ दिया जाये तो सन् ’71 के बाद के समस्त ऑपरेशन और सैन्य क्रियाकलापों की सूचनाएं गुप्त रखी गयी हैं। ऐसे में साधारण जनता के समक्ष सैन्य विषयों को लेकर विचित्र धारणाएं जन्म लेती हैं जिसमें सबसे बड़ी भूमिका इलेक्ट्रॉनिक मीडिया निर्वहन करता है। ऐसे में पत्रकारिता के गर्भ से सैन्य अभियानों पर प्रामाणिक पुस्तकें उत्पन्न होना अपने आप में एक आश्चर्य है।

 

सन् 2014 में जनेवि में देश विरोधी नारे लगने के परिणामस्वरूप राष्ट्रचेतना जागृत हुई। जनमानस को इसका आभास हुआ कि हमारे सैन्य प्रतिष्ठान का उपहास हमारी सुरक्षा से ही नहीं वरन् राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से भी खिलवाड़ है और हम चुप नहीं बैठ सकते। वहीं दूसरी ओर वामपंथी खेमे ने अपने कुटिलता को प्रमाणित करने के लिए भी कई पुस्तकें लिखीं जिससे उनकी देशविरोधी मानसिकता दस्तावेजों में दर्ज हो गयी। राष्ट्रवादी विचारकों ने मन्थन किया तो सामरिक चिंतन एवं संस्कृति के पुनरुत्थान पर बल दिया गया। ले०जन० सय्यद अता हसनैन (रि०) सामरिक चिंतन को बड़े स्तर पर आकार देने वाले चार घटक बताते हैं: भौगोलिक, सामुदायिक-सांस्कृतिक, सामाजिक और शैक्षणिक। शिक्षा में सैन्य चिंतन केवल पाठ्यपुस्तकों से ही विकसित नहीं होता अपितु बाजार में बिकने वाले पॉपुलर साहित्य से भी विमर्श को दिशा मिलती है। बच्चों के लिए तो परमवीर चक्र विजेताओं पर कॉमिक्स प्रकाशित कर दी गयीं परंतु उन युवाओं का क्या जो आर्मी का साथ तो दे रहे थे किंतु उन परिस्थितियों से अवगत नहीं थे जिनमें आर्मी काम करती है।

India's Most Fearless By Shiv Aroor & Rahul Singh
India’s Most Fearless By Shiv Aroor & Rahul Singh

पेशे से पत्रकार शिव अरूर और सुशांत सिंह की पुस्तकें इस खाई को भरती हैं और राष्ट्रीय चेतना में सैन्य चिंतन को गति देने का कार्य करती हैं। शिव अरूर संग राहुल सिंह ने India’s Most Fearless में म्यांमार (जून 2015) और पाक अधिकृत कश्मीर (सितंबर 2016) में की गयी सर्जिकल स्ट्राइक की कहानी सहित हवलदार हंगपन दादा, कर्नल सन्तोष महादिक, लांस नायक हनमंथप्पा समेत चौदह शूरवीरों की गाथाएं सम्मिलित की हैं। इसी पुस्तक का सहारा लेकर मीडिया चैनल मिर्च मसाला लगाकर अपनी स्टोरी बना दिखा रहे हैं। मैं इस समीक्षा में एक भी कहानी का विवरण नहीं दूंगा अन्यथा पुस्तक पढ़ने का रोमांच समाप्त हो जायेगा। इस पुस्तक की अंग्रेजी सरल और शैली तीव्र है। यह आपको आज के शूरवीरों से परिचित करवाती है। यह केवल आर्मी के सैनिकों पर ही आधारित नहीं है। इसमें नौसेना के लेफ्टिनेंट कमांडर नितिन यादव का भी उल्लेख है जिन्हें 2009 में पाकिस्तानी युद्धपोत की सूचनाएं गुप्त रूप से लाने हेतु भेजा गया था किंतु उनका इल्युशिन 78 विमान हवा में ही खराब हो गया था। जिस प्रकार उन्होंने इस विमान पर नियंत्रण प्राप्त किया और अपने साथियों की जान बचाई उसके लिए उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। पुस्तक में कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से गुजरे वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर ऋजुल शर्मा की भी कहानी है। लेखकों ने तकनीकी विवरण का बड़े सहज रूप से सजीव चित्रण किया है जिसे पढ़ते हुए उन कठिन परिस्थितियों आभास होने लगता है जिनमें हमारे देश के साहसी सैनिक काम करते हैं।

Missions Overseas by Sushant Singh
Missions Overseas by Sushant Singh

दूसरी पुस्तक सुशांत सिंह की मिशन ओवरसीज़ है जो इसी वर्ष शिव अरूर की पुस्तक से पहले प्रकाशित हुई है। मिशन ओवरसीज़ अपने आप में अनूठी पुस्तक है जो भारत की स्पेशल ऑपरेशन फ़ोर्स के तीन अभियानों पर केंद्रित है: ऑपरेशन कैक्टस (मालदीव 1988), ऑपरेशन पवन (जाफना 1987), तथा ऑपरेशन खुखरी (सिएरा लियोन 2000). ये तीनों सैन्य कार्यवाही देश से बाहर की गयी थी जिसमें भारत की स्पेशल फ़ोर्स ने समूचे विश्व में अपना लोहा मनवाया था। ज्ञातव्य है कि स्पेशल फ़ोर्स रक्षा के लिए नहीं होती। यह सेना के विशेष बल होते हैं जो शत्रु की परिधि के भीतर वार करते हैं और इनका मुख्य कार्य किसी विशिष्ट लक्ष्य को भेद कर वापस लौटना होता है। आज के सामरिक परिदृश्य में स्पेशल फ़ोर्स का महत्व इससे समझा जा सकता है कि अमरीकी सशस्त्र सेनाओं ने न केवल एक संयुक्त स्पेशल ऑपरेशन कमान गठित की अपितु इस विषय पर शोध के लिए एक विश्वविद्यालय का निर्माण किया है। भारत में स्पेशल फ़ोर्स पर ले० जनरल ओबेरॉय, डॉ प्रेम महादेवन और ले० जनरल प्रकाश कटोच द्वारा लिखित उन्नत तकनीकी पुस्तकें उपलब्ध हैं जो सामान्य व्यक्ति नहीं समझ सकता। ऐसे में स्पेशल फ़ोर्स की उपयोगिता जनसाधारण को समझाना एक स्वागतयोग्य उद्यम है जिसे करने के लिए सुशान्त सिंह बधाई के पात्र हैं। (यह पुस्तक अंग्रेजी हिंदी दोनों में उपलब्ध है। मैंने जानबूझकर केवल हिंदी वाला चित्र संलग्न किया है।)

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