टीवी की आवाज कुछ रोज़ पहले कमरे तक आई तो दो लोगों के बात करने की आवाजें थी। किसी सीरियल में एक व्यक्ति दुसरे से पूछ रहा था कि क्या करें खानेखाना? क्या नए निज़ाम को कबूलें या जमीर की सुनें? इतना सुनना काफी था, समझ में आ गया कि कोई सियासत पर आधारित धारावाहिक होगा। इसमें शहजादे सलीम की ताजपोशी का किस्सा दिखा रहे होंगे। “मुगले-आज़म” जैसी फिल्मों की वजह से जैसा माना जाता है ना तो सलीम वैसा था ना ही अकबर। मुग़ल असल में कुछ और ही किस्म के थे, जिनके किस्सों पर बॉलीवुड ने परत दर परत झूठ की चाशनी चढ़ाई है।

 

अकबर ने बहुत लम्बे समय तक राज किया था और सलीम बूढ़ा होने लगा था, जल्दी राज्य उसे मिल जाए इसलिए बाप को क़त्ल करने के लिए उसने बगावत की थी। किस्मत से अकबर जबरदस्त घाघ किस्म का सेनानायक था और उसके नेतृत्व में उसकी फौजें कभी नहीं हारी। लिहाजा सलीम हारा, और उसे पकड़ कर अकबर ने कैदखाने में फिंकवा दिया। कुछ महीनों बाद जब अकबर की मौत हुई तो सलीम की अम्मा वगैरह ने उसे जेल से निकाला। अपने पांच अन्य तख़्त के दावेदार भाइयों को क़त्ल करके सलीम ने जहाँगीर की उपाधि के साथ राजगद्दी ली।

 

जहाँगीर की उपाधि के साथ उसने 12 नियम भी घोषित किये थे जिनके जरिये वो खुद को इंसाफपसंद घोषित करना चाहता था। हालाँकि बाद के उसके काम उसे कट्टर सुन्नी ही साबित करते हैं। काज़ी नुरुल्ला शुस्तारी को उसने 1610 में मरवा डाला था जब वो करीब 70 साल के थे, शिया मुस्लिम उन्हें शहीद मानते हैं। शहीद अल थालिथ (या शिया इस्लाम के तीसरे शहीद) का मकबरा आगरा में है। दिल्ली के खूनी दरवाजे का नाम भी सलीम-जहाँगीर की वजह से ही पड़ना शुरू हुआ था। इसके पीछे खानेखाना का किस्सा आता है।

 

अब्दुल रहीम खानेखाना जो कि जाने-माने कवि थे और आज भी रहीम के दोहों के लिए जाने जाते हैं वो कृष्ण भक्त थे। वो अकबर के करीबी थे। अकबर के करीबी इसलिए क्योंकि अपने संरक्षक बैरम खान की मौत के बाद अकबर ने बैरम खान के परिवार को अपने पास बुलवा लिया था। बैरम खान और उनकी पहली पत्नी के बेटे थे अब्दुल रहीम खानखाना। चूँकि अकबर ने बैरम खान की दूसरी बेवा से निकाह भी कर लिया था इसलिए रहीम अकबर के सौतेले बेटे भी कहे जा सकते हैं। अकबर से विद्रोह, जेल और मरते ही सत्ता हथियाने वाले को अकबर का करीबी क्यों पसंद आये?

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तो सलीम उर्फ़ जहाँगीर ने दिल्ली की गद्दी मिलते ही पहला काम ये किया था कि रहीम को दरबार से निकाला और उनके दोनों बेटों को खुनी दरवाजे में (जो कि लाल किले के पास ही है) क़त्ल कर डाला। बॉलीवुड फ़िल्में इस तरह से क्रूर सियासतदानों को मासूम आशिक भी दिखाती हैं। जहाँगीर के काल में बने मुग़ल पेंटिंग दिखाते वक्त इस बात पर पर्दा डाल दिया जाता है कि उसने अपने ही बेटे की आँखें भी निकलवा ली थी। चर्चा का एक विषय मुगलों पर बॉलीवुडीया “दास्तानगोई” भी है, जो क्यों किसी को महिमामंडित करती है पता नहीं।

 

समय मिले तो देखिये-सुनिए। आपका इतिहास फिल्मों के जरिये क्यों और कैसे तोड़ा मरोड़ा जाता है, शायद उसपर भी ध्यान जाने लगे !

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