लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकारें आम लोगों के प्रतिनिधि बनाते हैं | जैसे आम लोग होंगे, बिलकुल वैसे ही उनके चुने हुए प्रतिनिधि भी होंगे | आम आदमी के लिए अगर अमीर आदमी ज्यादा बड़ा आदमी होता है और गरीब छोटा आदमी तो वो भी नजर आ जाएगा | इसे नमूने के तौर पर हर साल बारिश के मौसम मे देख लीजिये | भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाली मुंबई मे एक दिन की बारिश भी ब्रेकिंग न्यूज़ होगी | दूसरी तरफ बीमारू राज्य जैसे असम या बिहार मे अगस्त से दिसम्बर तक ठहरा पानी भी समाचारों में नहीं आता |

 

मुंबई धन्ना-सेठों का इलाका है तो वहां की ख़बरें सुनाने चलाने लायक होती हैं | ऐसी ही एक खबर कुछ साल पहले चली थी | मुंबई के आवर लेडी ऑफ़ वेळानकन्नी चर्च मे ईसा की मूर्ती से अपने आप पानी टपकने लगा | आस पास के कैथोलिक समुदाय मे ये पानी की खबर जंगल की आग की तरह फ़ैल गई | ढोंगी पादरियों ने फ़ौरन इसे येशु का चमत्कार घोषित किया और चर्च को तीर्थस्थान बनाने मे लग गए | कैथोलिक बदकिस्मती से सनल एडमारुकू (Sanal Edamaruku) उस दौर मे भारत मे ही रहते थे |

 

जब वो मौका ए वारदात पर पहुँचे तो उन्होंने पाया कि लोग मूर्ती के पैरों से टपकते पानी को बटोरने मे लगे हैं ! कई उसे बिमारियों का चमत्कारी इलाज भी मान बैठे थे और कैथोलिक उकसावे में आकर उसे पीने लगे थे | एडमारुकू ने मामूली सी ही जांच की तो पता चल गया कि पास से ही गुजर रही एक शौचालय की पाइप लीक कर रही थी | मूर्ती से वही शौचालय का गन्दा पानी चू रहा था | कैथोलिक समुदाय मे हड़कंप मच गया |

फ़ौरन से पेश्तर एडमारुकू पर कैथोलिक समुदाय की सेंटिमेंट सिस्टर को चोट पहुँचाने के लिए 1860 का फिरंगी ईशनिंदा कानून इस्तेमाल हुआ | तीन साल की सजा वाले मुक़दमे और जान से मारे जाने की धमकियों से बचकर एडमारुकू फ़ौरन फ़िनलैंड भागे और वहीँ शरण ली | एडमारुकू के पास रिचर्ड डाव्कीन्स जैसों का समर्थन था, लेकिन उन्हें मुकदमा वापस लेने के लिए तत्कालीन (2012) की सरकार से मदद चाहिए थी (जो की मुखिया के कैथोलिक होने के कारण, करीब नामुमकिन थी) |

 

एडमारुकू वैसे भी कोलकाता वाली टेरेसा के विरोध और उसकी पोल खोल के लिए पहले से ही भारत के कैथोलिक समुदाय के अत्यंत प्रिय रहे हैं | एडमारुकू के मुताबिक, मुंबई के कैथोलिक आर्चबिशप, कार्डिनल ग्रेसिअस ने माफ़ी मांग लेने पर उनकी मदद का वादा भी किया था |

 

ये इसलिए याद आया क्योंकि हाल में ही दीपावली की आतिशबाजी को प्रदूषण फैलाने वाला घोषित करते तमाम कथित बुद्धिजीवि, फिल्म कलाकारों से लेकर, कवी-साहित्यकार तक इसाई त्योहारों के दौर में पच्चीस दिसंबर से एक जनवरी तक जीवन के “रौशन” होने की कामना करते दिखे | साथ ही तीन तलाक पर छाती कूट कुहर्रम मनाती बिरादरी ये कहती दिखी कि अरे तीन साल की सजा के कानून से क्या होता है, कानून से अपराध बंद हुए हैं कभी ? तीन तलाक जैसा ही ब्लासफेमी में भी तीन ही साल की सजा है |

 

बाकी नए साल के बधाई सन्देश पढ़कर देख लीजिये, इसाई ईशनिंदा कानून से कुछ सालों में अगर असर होता है, तो इस से भी होगा ही |

The Guardian पर इसी खबर का लिंक

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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