घरेलु हिंसा जैसे विषयों पर काम करने वाले लोगों का मोहभंग बहुत जल्दी होता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ घरेलु हिंसा के विषय पर काम करने वालों का ही मोहभंग होता हो, असल में किसी भी सामाजिक बुराई के खिलाफ काम करने वालों का मोहभंग होता ही है। जैसे शराबबंदी पर काम कर रहे लोगों को थोड़े ही दिन में समझ आ जाता है कि शराबी खुद अपनी समस्या छोड़ना ही नहीं चाहता। दहेज़ के खिलाफ काम करने वालों को समझ में आता है कि दहेज़ लेने देने वाले तो उल्टा इसे शान की बात समझते हैं।

ऐसे ही कन्या भ्रूणहत्या पर काम करने वालों के साथ होता है। ऐसा करने वाली डॉक्टर और एजेंसी के लिए ये मोटी कमाई का जरिया है। कोई मरे उन्हें क्या? जो पुरुष-स्त्री ये करने जा रहे होते हैं, उनके लिए ये मानसिक शांति का मुद्दा होता है तो वो भी बेचारे भ्रूणहत्या रोक रहे समाजसेवी को सर दर्द ही समझते हैं। बड़े विवाद योग्य मुद्दे तो छोड़िये शिक्षा जैसे मुद्दों पर काम करने में भी ऐसा ही होगा। बच्चे को स्कूल जाना जेल जाने जैसा बन्धन लगता है और उसके माँ-बाप को उसे स्कूल भेजना कमाई रोकना। मोहभंग वहां भी होता है।

वैसे हम थे घरेलु हिंसा के मुद्दे पर तो वहीँ वापस आते हैं। घरेलु हिंसा के शिकार पुरुष-स्त्री से बात करने पर भी ऐसा ही होगा। वो इसे हिंसा तो मानते ही नहीं। पुरुष अगर हिंसा का शिकार हो तो वो इसे हरगिज सामाजिक रूप से नहीं स्वीकारेगा। ये अलग बात है कि इस बारे में उसके पड़ोसी-रिश्तेदारों को पहले ही पता होता है। जब सबको पता ही है तो किससे प्रतिष्ठा बचा रहा है मालूम नहीं। स्त्री अगर शिकार हो तो वो इसे प्रेम का प्रदर्शन माने बैठी होती है। अब प्रेम का प्रदर्शन लात-घूंसों और डंडे से होते उन्होंने कहाँ देखा मालूम नहीं।

जो भी हो दोनों में से कोई, अपने-अपने निजी कारणों से घरेलु हिंसा को स्वीकारता नहीं। इससे भी बड़ी समस्या बेचारे समाजसेवी की ये होती है कि जब वो लोगों को बताता है कि घरेलु हिंसा के शिकार कभी आसानी से स्वीकारते नहीं कि उनके साथ हिंसा हो रही है तो लोग मानते ही नहीं! वो उल्टा पूछते हैं कि चोट के निशान या दूसरे लक्षण जैसे भय, तो आसानी से नजर आ जाते हैं। पीड़ित या पीड़िता स्वीकारेगी क्यों नहीं कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है? किस्मत से ऐसे मासूमों को दिखाने के लिए हमें एक अच्छा उदाहरण हाल ही में पटना लिटरेचर फेस्टिवल में नजर आ गया।

वहां एक जाने-माने पत्रकार जी से किसी ने पूछा कि क्या बिहारी होने के कारण उन्हें दिल्ली में कभी भेदभाव का सामना करना पड़ा? तो उन्होंने जवाब दिया नहीं, लम्बे समय दिल्ली में रहने के बाद भी उनके साथ कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ! दिल्ली में लम्बे समय रहने की जरुरत नहीं होती, वहां एक दो दिन के लिए जाने पर भी ये भेदभाव दिख जायेगा। किसी भी गलती के लिए टोकने पर “अबे बिहारी है क्या? ऐसी उल्टी हरकतें करता है!” जैसे जुमले ना चाहते हुए भी सार्वजनिक स्थलों पर किसी न किसी श्रीमुख से सुनाई देंगे।

स्त्री-पुरुष अक्सर घरेलु हिंसा की बात इसलिए भी नहीं स्वीकारते क्योंकि वो सोचते हैं कि रहना तो जिन्दगी भर इस हिंसक जीव के साथ ही है। समाजसेवी के साथ तो रहना नहीं। ऐसे में क्यों साथ रहने वाले को नाराज करने का खतरा मोल लिया जाए? पत्रकार जी को भी रहना तो दिल्ली में ही है, ऐसे में एक दिन बिहार आने पर दिल्ली वालों को नाराज करने का खतरा क्यों मोल लिया जाए? हाँ बिहार से दिल्ली जाते ही लोग अचानक “हम” की बजाय अपने लिए “मैं” का संबोधन इस्तेमाल करने लगते हैं। पहचाने जाने का डर रहता है उन्हें।

बाकी एक बड़े आदमी की कायरता ने ऐसे जिन सैकड़ों भाषा बदलकर अटपटे से “मैं” वाले वाक्य इस्तेमाल करते “भैया जी” को झूठा कह डाला है, उनकी वो खुद जानें। बड़े आदमी हो जाने पर साधारण रह गए “भैया जी” को याद रखने की गारंटी तो उन्होंने कभी ली भी नहीं थी!

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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