इस से पहले की बिहार राजनीति के अपराधीकरण का जिक्र शुरू करें, एक पुरानी फिल्म “मुगले-आज़म” को याद करना अच्छा रहेगा | आम तौर पर इस फिल्म से इतिहास की ये समझ बनती है कि सलीम ने मुहब्बत के लिए बाप अकबर से बगावत की थी | असली वजह ये थी कि अकबर का शासनकाल करीब पचास साल का था | अधेड़ हो चुका सलीम समझ रहा था कि अगर उसके जवान होते बेटों के लिए उसने गद्दी जल्दी नहीं छोड़ी तो कल को वो बगावत करेंगे | लिहाजा ताज जल्दी अपने सर पर रखने के लिए सलीम ने बगावत की थी | “अनारकली” कोई थी ही नहीं |

 

वापस बिहार की राजनीति को देखें तो इसे इंदिरा गांधी की मुखालफत करने वाले जे.पी. आन्दोलन के लिए भी जाना जाता है | जे.पी. आन्दोलन शुरू होने की वजहों में जयप्रकाश नारायण के पुराने साथी सूरज नारायण सिंह का भी नाम आएगा | रांची के पास के उषा मार्टिन के कार्यालय के बाहर सूरज नारायण सिंह मजदूरों की मांग को लेकर अनशन पर बैठे थे | इस आमरण अनशन को तुड़वाने के लिए एक कांग्रेसी यूनियन भी बनवानी पड़ी थी | अनशन स्थल पर स्थानीय गुंडों और मजदूरों में संघर्ष भी हो गया, जिसे रोकने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया |

 

अप्रैल 1973 के इस अनशन के बीच संघर्ष को रोकने की कोशिश कर रहे सूरज नारायण सिंह को पुलिस और गुंडों ने मिलकर इतना मारा की वो क्षत-विक्षत हो गए | 14 अप्रैल को शुरू हुए अनशन की परिणिति पिटाई की वजह से 21 अप्रैल, 1973 को हुई सूरज नारायण सिंह की मौत से हुई | ये सूरज नारायण सिंह वो व्यक्ति थे जिन्होंने जयप्रकाश नारायण को कंधे पर बिठा कर हजारीबाग जेल की दिवार लांघी थी | सूरज नारायण सिंह की हत्या से तत्कालीन केदार पाण्डेय की कांग्रेसी सरकार पर तो कोई आंच नहीं आई लेकिन उनकी मौत पर बिलखते जे.पी. के मन में आन्दोलन की नींव पड़ गई थी |

 

बिहार के ललित नारायण मिश्र उन दिनों कांग्रेस के कद्दावर नेता थे और उन्हें केदार पाण्डेय रास नहीं आ रहे थे | उनकी वजह से केदार पाण्डेय को जाना पड़ा और उनकी जगह अब्दुल गफूर बिहार के मुख्यमंत्री हुए | अब समस्या थी कि एल.एन.मिश्र के करीबी गफूर को विधानसभा का सदस्य होना था | उस दौर में मुख्यमंत्री होने के लिए विधानपरिषद नहीं विधानसभा की सदस्यता की परिपाटी थी | ऐसे में सूरज नारायण सिंह की हत्या से खाली हुई मधुबनी सीट पर उनकी नजर पड़ी | इस इलाके से अब्दुल गफूर का कोई लेना देना नहीं था |

 

जनता के अपने नेता सूरज नारायण सिंह की हत्या से क्षुब्ध थी, सूरज नारायण सिंह की विधवा भी इस उपचुनाव में उम्मीदवार थी लेकिन जब मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनाव हो तो क्या होता ? निरंकुश शासन की महिमा से गफूर चुनाव जीते | इसी के बाद जे.पी. का एलान आया था कि “अब और नहीं सहा जा सकता | लोकतंत्र की हत्या अब और नहीं बर्दाश्त कर सकता |” सक्रीय राजनीति से सर्वोदय में आ चुके जयप्रकाश नारायण ने बगावत का बिगुल फूंक दिया | इस तरह कांग्रेसी धतकर्मों से 1974 का वो आन्दोलन शुरू हुआ जिसने बिहार ही नहीं पूरे देश को हिला दिया था |

 

शुरू में किसी को अंदाजा नहीं था कि ये आग कैसी भड़केगी | उस दौर में गुजरात की चिमन भाई सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्र आन्दोलन जोर पकड़ चुका था और आंच अब इंदिरा गांधी के दामन तक भी पहुँचने लगी थी | ऐसे ही समय में 2 जनवरी 1975 को इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के के शक्तिशाली रेल मंत्री ललितनारायण मिश्र समस्तीपुर पहुंचे | वो एक नयी ट्रेन ‘जयंती जनता एक्सप्रेस’ का उद्घाटन करने आये थे | दिल्ली-समस्तीपुर ब्रॉड गेज पर चलने के लिए ये नयी ट्रेन थी | समस्तीपुर से सहरसा की तरफ की छोटी लाइन को शुरू होने में उस समय बहुत साल बाकी थे |

 

समस्तीपुर रेलवे प्लेटफार्म के मंच पर बड़े नेता मौजूद थे | ललितनारायण मिश्र के छोटे भाई जगन्नाथ मिश्र (जो बाद में मुख्यमंत्री बने और चारा घोटाले में भी उनका नाम आया) भी उसी मंच पर थे | भाषण ख़त्म हुआ ही था कि एक जोरदार विस्फोट से सब ताश के पत्तों की तरह उड़ गया | अगले दिन (3 जनवरी, 1975 को) घायल ललितनारायण मिश्र की मौत हो गई | सियासत के हलकों में इस हत्या को लेकर कई अटकलें गूंजी | किसी नेता की केन्द्रीय मंत्री पद पर रहते हत्या हो जाने की ये पहली घटना थी |

 

लम्बे समय चली रेल हड़ताल को कुचलने से लेकर आनंदमार्गियों के हत्या में शामिल होने तक को वजह बताया गया | बाद में जगन्नाथ मिश्र के मुख्यमंत्री होने पर लोग मुस्कुराकर उनकी हत्या के सवाल को टालने लगे | इसी साल जून 1975 में आपातकाल की घोषणा हुई और जे.पी. आन्दोलन उठा | ये वो आन्दोलन था जिस से लालू, पासवान, सुशील मोदी से लेकर जोर्ज फ़र्नान्डिस तक कितने ही नेता निकले | बाकी एक तथ्य ये भी है कि इसी दौर में कांग्रेस में भी अपराधी किस्म के नेताओं का जमावड़ा शुरू हो गया | ये एल.एन.मिश्र की हत्या ना हुई होती तो शायद बिहार को कभी जगन्नाथ मिश्र का शासन भी नहीं भोगना पड़ता |

 

राजनीति में पिता-बड़े भाई वगैरह की बरगद जैसी छाया हो तो घास फूस पनप ही नहीं पाती | अजातशत्रु को भी आगे बढ़ना था तो बिम्बिसार कैद किये गए | “मुगले-आज़म” जैसा ही कई बार जो संघर्ष प्रेम का दिखाया जाता है, वो असल में सत्ता का हो तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए | जैसे लालू पर शहाबुद्धीन से लेकर आनंद मोहन सिंह और पप्पू यादव को प्रश्रय देने के आरोप रहे हैं वैसे ही उनके पुत्रों पर भी हैं | हाल के सिवान में हुए हिंदुस्तान अख़बार के ब्यूरो प्रमुख की हत्या में जो गिरफ्तार हुए उन्हें आश्रय देने का आरोप लालू के पुत्र पर है |

 

चारा घोटाले के अपराधों में जेल में बंद होने पर माना जा सकता है कि वृद्ध हो चुके लालू का काल समाप्त होता है | उनके जेल जाने पर अब छोटे सुपुत्र राजनीती संभाल रहे हैं | बड़े सुपुत्र जरा कम नजर आते हैं, देखते हैं आगे राजनैतिक ऊंट किस करवट बैठता है |

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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