चाय की दूकान पर बैठा पहला व्यक्ति : अरे लेकिन ये हुआ कैसे ? अचानक !

चाय की दूकान पर बैठा दूसरा व्यक्ति : अचानक क्या ? कई दिन से अन्दर ही अन्दर चल रहा होगा मामला | किसी के दिमाग मे क्या चल रहा है कौन जानता है ?

चाय की दूकान पर बैठा पहला व्यक्ति : कोई केस-मुकदमा भी चल रहा था क्या ?

चाय की दूकान पर बैठा दूसरा व्यक्ति : अरे नहीं, बड़े लोग हैं | इनके मामले सब अन्दर ही अन्दर निपट जाते हैं | और मुकदमा कर के भी किसके पास जाता ? डिस्ट्रिक्ट सिविल कोर्ट का जज तो ऐसे भी घर आता जाता ही होगा ना |

 

दृश्य बदल कर फ़्लैश बैक में जाता है जहाँ गाँव के एक खपरैल मकान में गाँव के एक माँ-बाप के बीच ख़ुशी का सा माहौल है | उनका बेटा जिसका आईएएस में सिलेक्शन हो गया था वो ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग पर बिहार आया था और छुट्टियों में घर आ रहा है | बेटे के आते ही माँ-बाप और बेटे में जमीन पर बैठे खाते चर्चा हो रही है |

 

बाप – अरे बहुत अच्छा रिश्ता है बेटा | बिरादरी में हमारी नाक ऊँची हो जायेगी | पूरे गाँव-जवार मे इतने बड़े लोग किसी के समधी नहीं |

 

माँ – और क्या ? लड़की सुन्दर है, खाते-पीते घर की है, आएगी तो पूरा घर भर जाएगा |

 

लड़का – लेकिन मेरा किसी अमीर ससुर और मोटे दहेज़ जैसी कोई इच्छा नहीं |

 

माँ – अरे किसी से तो करेगा ही ना शादी ! या कोई पहले ही चुन रखी हो तो वो ही बता दे | ज़ात-बिरादरी की ना भी हुई तो हम कलेजे पर पत्थर रख लेंगे | वैसे भी अब तू बड़ा अफसर जो हो गया है |

 

बाप (थाली में रोटी का आखरी टुकड़ा पटकते हुए) – रहने दे भागवान, गरीब-गंवार माँ-बाप की नहीं चलती आज कल | हमारा ज़माना और था कि जिससे माँ-बाप ने कहा उस से पूरी जिन्दगी बिना चूं-चपड़ के निबाह ली | आजकल तो…

 

दृश्य बदलता है, पॉश ड्राइंग रूम में पैर पर पैर चढ़ाए बैठे सूट धारी होने वाले ससुर हैं | लड़की किसी दोस्त का फोन आया कहकर एक्सक्युज मी कहती हुई उठकर जाती है | लड़का ऐसे अल्ट्रा मॉडर्न माहौल में असहज है |

 

ससुर – तुम फ़िक्र मत करो तुम्हारी पोस्टिंग पटना के आस पास ही करवाने को लेकर बात हो गई है | जब तक तुम लोग मोरिशस से हनीमून मनाकर लौटोगे, पोस्टिंग आ जायेगी | नॉट टू वर्री | अब तुम्हें क्लास की आदत भी डाल लेनी चाहिए, शाशा के साथ तुम आज ही कोई कार चुन लो | शाशा के पास अपनी कार है, लेकिन तुम्हारी अपनी सेडान होनी चाहिए | कंसीडर इट अ गिफ्ट बेटा, शादियों मे तोहफे तो मिलते ही हैं |

 

लड़का – जी, मेरा इन चीज़ों में कोई ख़ास… यू नो |

 

ससुर – ओह प्लीज्, शादियों में ऐसे अपने पराये का फर्क नहीं करते | यहीं पटना में तुम दोनों के नाम से फ्लैट भी बुक कर दिया है | शाशा अभी उसे फर्निश करने मे जुटी है | यू शुड सी इट वन्स शी इज डन ! आखिर वो तुम दोनों का घर है, एक दो चीज़ें उसमें तुम्हारे पसंद की भी तो हों !

 

दृश्य बदलता है, पति-पत्नी में किसी बात को लेकर बहस हो रही है और पैर पटकती हुई पत्नी कार में बैठकर जाती है | शाम ढले लड़का अपनी माँ से फोन पर बात करता है |

 

लड़का – नहीं, वो मायके चली गई है | कब तक लौटेगी पता नहीं |

 

माँ – क्या कोई झगड़ा-वगड़ा ?

 

लड़का – अब वो एक अलग माहौल में पली-बढ़ी है माँ | उसके अपने दोस्त, अपना सर्किल, अपने तौर-तरीके | हर बार हर चीज़ हजम तो होती नहीं मुझसे | खरीदे शो पीस की तरह कब तक चले ?

 

माँ – ऐसा नहीं कहते बेटा, अच्छे घर की है | शादियों में शुरू-शुरू में थोड़ा बहुत तो होता ही है | एक बार बच्चे वच्चे हो जाएँ तो उसका भी घर में दिल लगेगा | कुछ मन बहलाने का बहाना भी होगा उसके पास |

 

दृश्य फिर बदलता है और शाम में दफ्तर से अकेला लौटता लड़का दिखता है | वहां उसका ही कोई बैठा इन्तजार कर है (संबोधन से पता चलेगा कि वो मजिस्ट्रेट है) |

 

मजिस्ट्रेट – तुम्हारी गिरफ़्तारी के वारंट साइन करने आये हैं | शाम मे अर्दली ने बताया, अभी दफ्तर गया नहीं तो साइन नहीं हुए | कल सुबह वो पहले ही कागज़ होंगे | तुम अच्छे आदमी हो सोचा खबर कर दूं |

 

लड़का – गिरफ़्तारी ? लेकिन किस बात के लिए ? मैंने कब क्या कर दिया जो वारंट !

 

मजिस्ट्रेट – दहेज़ की धाराएं हैं |

 

लड़का – लेकिन मेरी पत्नी तो बेटी के साथ मायके !

 

मजिस्ट्रेट – तुम्हारी पत्नी ने दहेज़ उत्पीड़न के मामले लगाए हैं | बच्ची की कस्टडी के लिए भी शायद आवेदन कर दिया होगा | ये गैर जमानती होंगी, और वो अमीर लोग हैं ये भी तुम्हें पता है | मेरी सलाह है कि तुम कोई अच्छा वकील देख लो | मुकदमा मुश्किल होगा, जो समाज में बदनामी होगी, वो तो है ही |

 

लड़का – लेकिन मैंने तो कोई दहेज़ कभी माँगा ही नहीं !

 

मजिस्ट्रेट (हंसकर बाहर खड़ी कार देखता है) – लिया तो था शायद | बाकी अदालत में साबित करना होगा, मैं चलता हूँ |

 

मजिस्ट्रेट के जाते जाते में दृश्य फिर बदलता है | लड़का अब पटरियों पर जाता दिखता है फ़्लैश मे हथकड़ी, सलाखें, लोगों की उठती उँगलियाँ आती हैं | माँ की आवाज में “घर भर जाएगा”, पिता की आवाज में “आज कल के लड़के” सुनाई देता रहता है | दृश्य वापस बदलकर चाय की दुकान पर आता है जहाँ तीसरे व्यक्ति का प्रवेश होता है |

 

चाय की दूकान पर आया तीसरा व्यक्ति : अरे आ गया टीवी पर ! अखबार तो कल शाम तक की ही खबर बता रहा है | बड़े घर में मोटा दहेज़ लेकर शादी की थी साहेब ने, बीवी बिटिया को लेकर गई मायके और दहेज़ के मुक़दमे ठोक दिए थे | ऐसे ही कोई ट्रेन की पटरी पर थोड़ी ना कूद जाता है | मैं तो पहले ही समझ रहा था अन्दर लम्बी कहानी होगी |

 

चाय की दूकान पर बैठे बाकी व्यक्ति : और क्या, कह लो नेता-मंत्री, काम-काज के सैकड़ों दबाव झेल जाने वाला आदमी दहेज़ के नोटों से दबकर मर गया |

 

अखबार की कट्टीग्स में दहेज़, आत्महत्या, दिखाते स्क्रीन ब्लेंक |

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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