आपने मशहूर फिल्म “अवतार” देखी होगी, तो उसके अंतिम दृश्य का युद्ध भी देखा ही होगा। “अवतार” नाम ही हिन्दुओं के देवी-देवताओं के अवतार से लिया गया है, तो जाहिर है फिल्म में कई हिस्से भी हिन्दुओं की पुराण-कथाएँ हैं। नरकासुर से लड़ाई में कृष्ण एक प्रहार से जब बेहोश हो जाते हैं तो सत्यभामा नरकासुर से लड़ने उतर पड़ती है और नरकासुर की छाती में तीर मार गिराती है। अंतः कृष्ण सत्यभामा के संयुक्त प्रयासों से नरकासुर मारा जाता है और कृष्ण उसका सर सुदर्शन चक्र से काट कर उसकी जीभ खंडित कर देते हैं। “अवतार” फिल्म के अंतिम दृश्य की लड़ाई में नायक का गिरना और नायिका का तीर चलाना इसी कहानी से प्रेरित है।

 

नरकासुर की ग्यारह अक्षौहणी सेना इस युद्ध में मारी गई। इस सेना का सेनापति मुर नाम का था, और उसी के वध के कारण कृष्ण का एक नाम “मुरारी” भी होता है। कहते हैं, एक बार नरकासुर, देवी कामख्या से ही विवाह करने के पीछे पड़ गया। देवी ने शर्त रखी कि अगर रात भर में नीलांचल पहाड़ी के नीचे से ऊपर मंदिर तक की सीढ़ियाँ बना डालो तो मैं तुमसे विवाह कर लूं। नरकासुर फ़ौरन इस काम में जुट गया और जब देवी को लगा कि ये तो सचमुच सीढ़ी सुबह होने से पहले पूरी कर डालेगा तो उन्होंने एक मुर्गे को बांग देने का आदेश दिया। मुर्गा कुकडू कँे कर उठा और नरकासुर ने सोचा शर्त के मुताबिक मुर्गे के बांग देने से पहले सीढ़ी पूरी करनी थी ! तो वो आधे में ही, सीढ़ी बनाना बंद कर के चला गया।

 

बाद में जब नरकासुर को पता चला तो उसने मुर्गे को खदेड़ के मार डाला। जिस जगह बेचारा मुर्गा मारा गया उसे दर्रांग जिले का कुक्कूड़काता माना जाता है। अधूरी सीढ़ी को अब मेखेलौजा पथ बुलाते हैं। संस्कृत-हिंदी शब्द “घोर”, भय का परिचायक है। सनातन मान्यताओं में बुढ़ापा, बीमारी, तनाव, अहंकार, मृत्यु का भय सभी घोर हैं। जब साधक शक्ति की कृपा से माया को पार कर जाता है और शिव के अघोर (घोर का ठीक उल्टा) स्थिति को पा लेता है तो उसे अघोरी कहते हैं। मृत्यु का भय सबसे बड़ा माना जाता है, इसलिए अघोरियों की साधना शमशानों में ही शुरू होती है। शमसान अगर उत्तर दिशा में बहती नदी के पास हो तो और भी बेहतर। बंगाल के तारापीठ में तो शाकाहारियों और मांसाहारियों का शमशान अलग-अलग भी हैं।

 

शाक्त परम्पराओं के ऐसे ही साधकों के लिए कामख्या शक्ति पीठ का महत्व होता है। मान्यता है कि वामाचार की साधना इसी स्थल से कभी ऋषि वशिष्ठ ने आगे बढ़ानी शुरू की थी। कामख्या शक्ति पीठ, सती की योनी गिरने के स्थान पर बना है। साबर, नाथ या कालिकुल जैसे सम्प्रदायों में इसी वजह से कामख्या शक्तिपीठ की महत्ता और भी ज्यादा होती है। इसके गर्भगृह में कोई विग्रह (कोई मूर्ती) भी नहीं है, यहाँ भूमिगत गुफा जैसे स्थान में सतत जल प्रवाह होता रहता है। अम्बुबाची के चार दिनों के दौरान यहाँ पानी लाल हो जाता है। इसके किसी वैज्ञानिक कारण का मुझे पता नहीं, लेकिन इसे स्त्री के रजस्वला होने का प्रतीक माना जाता है। देवी का नहीं, ये भूदेवी यानि पृथ्वी के रजस्वला होने का प्रतीक है।

 

इस दौरान कामख्या और असम के मंदिर ही नहीं, काशी तक के सभी शक्ति पीठ बंद रहते हैं। कुछ समय से ये 22 से 26 जून के बीच पड़ रहा है। करीब करीब मानसून और नयी फसल की बुआई से ठीक पहले प्रकृति के रजस्वला होने का ये प्रतीक असमय तो नहीं लगता है। इस दौरान यहाँ तांत्रिक, अघोरी, दशनामी, सहजिया से लेकर शंकराचार्य पीठ के सन्यासी और दूसरे सभी मतों-सम्प्रदायों के योगी-साधक भी मिल जाते हैं। वामाचार में थोड़ी भी रूचि रखने वालों के लिए ये सबसे बड़ा पर्व होता है। हालाँकि उनकी राजनीती विरोध पर ही टिकी होती है, किसी सुधार की बात नहीं करती फिर भी स्त्रियों के लिए चार दिनों छुट्टी हर महीने मांगने वालों को सनातन परम्पराओं में मौजूद इस चार दिन की छुट्टी को देखना चाहिए। इस मंदिर और उस से जुड़ी मान्यताओं का असम के इतिहास में भी ख़ासा महत्व रहा है। अहोम राजवंश दिल्ली की सल्तनतों से कहीं ज्यादा लम्बे समय तक चले थे, ये अलग बात है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी और उनकी किराये की कलम राजधानी के नाम से देश को जानने की परिपाटी चलाती रही है।

 

तबाक़त ए नासिरी के हवाले से पता चलता है कि 1337 में एक लाख घुड़सवारों की फ़ौज को मुहम्मद शाह ने असम जीतने के लिए रवाना किया था। मगर इ.ए.गेट बताते हैं कि इस फ़ौज में से एक भी सिपाही नहीं लौटा। बाद में फिर जब औरंगजेब ने राजा राम कछवाहा और दुसरे सरदारों को असम पर हमला करने भेजने की कोशिश की तो कोई इस फ़ौज में भर्ती होने को तैयार ही नहीं होता था। आखिरकार सेना के साथ गुरु तेग बहादुर को ले जाया गया ताकि लोगों के मन से काले जादू का डर निकले। हालाँकि इस फ़ौज का भी हाल वही हुआ था, लोचित बोरफुकन (लोचित शायद लोकहित को कहा जाता होगा और फुकन सरदार होता है, यानि बोरफुकन सेनापति) ने खदेड़ खदेड़ कर मुग़ल और उसके पिट्ठुओं की फ़ौज को काटा था, लेकिन हाँ इस से ये जरूर हुआ कि गुरु तेगबहादुर के पहुँचने से असम में सिक्ख धर्म भी पहुंचा।

 

शायद सरायघाट के युद्ध में मुगलों के कुचले जाने के दौर में ही कामख्या शक्तिपीठ और उस से जुड़ी तांत्रिक परम्पराओं की धाक जम गयी होगी। पिछली कई शताब्दियों से मनाये जा रहे इस त्यौहार की हिन्दुओं को जानकारी कम होने का कारण इसका अज्ञात या गुप्त होना नहीं है। इसकी वजह ये है कि हिन्दुओं में पास एक बड़ा मासूम सा सवाल होता है : “ये हिंदी में मिलेगा क्या?” आपकी सभ्यता-संस्कृति के बारे में अगर विदेशी भाषाओँ में जानकारी थी, और आपकी भाषा में नहीं थी तो सीखकर अनुवाद करना किसकी जिम्मेदारी होती थी? पड़ोसी देश से कोई आएगा क्या? अगर खुद सीख नहीं सकते तो किसी योग्य अनुवादक को ढूंढकर, उचित मानदेय पर उस से ये काम करवा लेने से किसने रोका था? आज जब अम्बुबासी का त्यौहार अपने अंतिम दिन पर है तो एक बार अपने सामुदायिक निकम्मेपन पर भी विचार कीजियेगा।

 

बाकी ये याद रखियेगा कि हाल तक जो शाम ढले मंदिर से नीचे उतर आने की सलाह दी जाती थी, क्योंकि रात में डाकिनी, योगिनियाँ अपनी पद्दतियों से पूजा करती, वो भय भी “घोर” होता है। अघोर उस से आगे है!

 

भिमाक्षी भिषणे देवी सर्वभूताभयंकरी।

कराली विकराली च कामेश्वरी नमोस्तुते।।

~ योगिनितंत्र

(जानकारी का ज्यादातर भाग, अध्यात्मिका की वेबसाइट से लिया है)

इस बारे में और जानकारी आप दूसरी वेबसाइटों से ले सकते हैं जैसे: 1, 2, 3

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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