भारत में कोई रामायण-महाभारत पहली बार नहीं पढ़ता | ये कहानियां आप बचपन से इतनी बार पढ़-सुन चुके होते हैं कि ये शाश्वत लगती हैं | अब तो खैर टीवी पर फिल्मों में देख लेने का भी विकल्प है तो पहली बार किसे कहें ? हर समय में इनके अलग अलग रूप भी आये, लिखना भारत में बाद में शुरू हुआ था इसलिए कब से हैं ये, वो भी नहीं कह सकते | रामायण महाभारत के पात्रों की कई कहानियां ऐसी भी हैं जो वाल्मीकि रामायण या फिर व्यास कृत महाभारत में नहीं मिलती | मगर ये लोकमानस में होती हैं |

 

महाभारत के व्यास कृत वाले में आपको घटोत्कच और अभिमन्यु की उतनी कहानियां नहीं मिलती जितनी लोक कथाओं में मिलेंगी | महाराष्ट्र के इलाकों में इन दोनों की मुलाकात की एक कहानी आती है | कहानी कुछ यूँ है कि पांडव वनवास पे थे तो अभिमन्यु के छोटे होने के कारण सुभद्रा मायके में रही | सुभद्रा और अभिमन्यु द्वारका में थे तो बचपन से ही सुभद्रा ने बलराम और रेवती की बेटी, वत्सला को अपनी भावी बहु के रूप में देखा |

 

अभिमन्यु और वत्सला साथ ही बड़े हो रहे थे तो उन दोनों में भी प्रेम था | अब जब वत्सला विवाह योग्य हुई तो बलराम ने सोचा कि पांडव तो अब राजा रहे नहीं | ऐसे में वत्सला की शादी अभिमन्यु से करना ठीक नहीं होगा | तो उन्होंने वत्सला की शादी दुर्योधन के बेटे लक्ष्मण कुमार से करने की ठानी | ये खबर जब सुभद्रा तक पहुंची तो वो बड़ी दुखी हुई | वो हमेशा की तरह, कृष्ण के पास मदद के लिए पहुंची | कृष्ण ने कहा देखो तुम्हारी शादी में मैं पहले ही भाई को नाराज कर चुका हूँ | बार बार तो कर नहीं सकता ना ?

 

हां, कोई और मायावी अगर वत्सला का हरण कर ले तो कुछ हो सकता है | इतना कहकर कृष्ण चलते बने | अब मदद ना मिल पाने पर दुखी सुभद्रा वन की ओर टहलती हुई चल पड़ी | शाम होने लगी तो पीछे पीछे उन्हें ढूँढने अभिमन्यु भी गए | अँधेरा ढल ही रहा था कि अभिमन्यु की मुलाकात सुभद्रा से वन में हुई ही थी कि अचानक वहां एक विशालकाय दानव आ पहुंचा | दिन ढले निशाचर को देखते ही अभिमन्यु ने उठाया धनुष और भिड़ गए राक्षस से !

 

उनके प्रहारों से अचेत होकर ज्यों ही राक्षस गिरा वैसे ही राक्षस की माता भी युद्ध की आवाजों से वहां तक पहुंची | अपने बेटे को अचेत देखकर वो “हा भीमपुत्र” कहती हुई उसकी ओर लपकी ! इतना सुनना था की अभिमन्यु और सुभद्रा चौंके | जब परिचय हुआ तो पता चला राक्षसी भीम की पत्नी हिडिम्बा है, और राक्षस उनका पुत्र घटोत्कच | अपने भाई से ही लड़ पड़े सोचकर अभिमन्यु और सुभद्रा भी सेवा श्रुभुषा में जुटे | होश में आने पर घटोत्कच ने उन्हें अपना अतिथि बनाया |

 

बाद में जंगल में आने का कारण पूछने पर सुभद्रा ने बताया कि कृष्ण ने कहा कोई और मायावी कर सकता है, पर मैं दोबारा मदद नहीं कर सकता, कहकर कृष्ण चले गए हैं और चिंतित सुभद्रा वन में आ गई थी | मायावी तो राक्षस घटोत्कच थे ही, कृष्ण के द्वारका से बाहर जाने का मतलब भी उन्हें बखूबी समझ आ गया | अब द्वारका में उनकी टक्कर का कोई नहीं था | बस मदद का वादा कर के अभिमन्यु और सुभद्रा को विदा कर दिया |

 

कुछ दिन बाद जैसे ही लक्ष्मण कुमार की बरात पहुंची तो विधि विधान शुरू होते ही बीच मंडप में कूद पड़े घटोत्कच ! अब आधे कौरव तो भयावह विशालकाय रूप धरे राक्षस से लड़ने की हिम्मत ही ना जुटा पाए | जो थोड़े बहुत ने प्रयास किया भी वो चारों खाने चित्त कर दिए गए | लक्ष्मण कुमार घटोत्कच को देख कर ही बेहोश हो गए थे | घटोत्कच ले गए वत्सला को और उसकी शादी अभिमन्यु से करवा दी | बाद में जब लक्ष्मण कुमार को होश आया तो उन्होंने कभी शादी ही ना करने का प्रण लिया | ये वाले लक्ष्मण कुमार महाभारत के तेरहवें दिन, अभिमन्यु के हाथों मारे गए थे |

 

अब ये कहानी सुनाई इसलिए है कि आज हमें सिंहासन बत्तीसी की याद आई है | उसमें हर सीढ़ी पर पुतली राजा भोज को विक्रमादित्य की कहानी सुनाती थी और पूछती थी, राजा भोज अगर तुम भी इतने ही न्यायप्रिय हो, ऐसा ही कर सकते हो, तभी इस सिंहासन पर आरूढ़ होने की सोचना | अब जो कृष्ण थे उन्होंने अपनी बहन के प्रेम को स्थान देने के लिए सुभद्रा की शादी अर्जुन से करवाई थी | भले उसके लिए बलराम के हाथों गर्दन मरोड़े जाने की नौबत आई हो | बाद में भतीजी के प्रेम का भी ध्यान रखा |

 

तो हे वैलेंटाइन डे मानने-मनाने का समर्थन कर रहे युवकों, हे हुडदंगियों से पार्क छीन लेने का आह्वाहन करती वीरांगनाओं ! जब आपकी बहन और भतीजी वैलेंटाइन डे मनाने जाएँगी तो उन्हें भी कृष्ण जैसा सहयोग करोगे ना ?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here