“तारे जमीन पर” फिल्म के गाने से “बम बम भोले” फिल्म का नाम उठाया गया और एक ईरानी फिल्म “चिल्ड्रेन ऑफ़ हेवन” से कहानी। इस तरह प्रियदर्शन की बनाई, दर्शील अभिनीत फिल्म “बम बम भोले” सन 2010 में आई थी। फिल्म की कहानी पहले भी बताई ही है। हिंदी वाले में बस किरदार बदल दिए गए हैं। इसमें परिवार खोगीराम ग्वाला और ऋतू ग्वाला का है। बच्चों के नाम पीनू और रिमझिम हैं। परिवार गरीब है और बच्चों के स्कूल के यूनिफार्म के लिए इनके पास पैसे पूरे नहीं पड़ रहे होते हैं।

 

ऐसी ही हालत में कोढ़ में खाज वाला मामला तब पेश आता है जब पीनू अपनी बहन का इकलौता जूता खो देता है। अब दोनों भाई बहन मिलकर माँ-बाप से जूते का खोना छुपाने और नए जूते जुटाने की योजना में जुट जाते हैं। स्कूल में एक ही जूते को बदल बदल कर दोनों भाई बहन पहनने लगते हैं। कई बार जूते ना पहनने के कारण पीनू को दिक्कतें आती रहती हैं। इतालवी फिल्म जैसा ही इसमें भी खोगिराम बागवानी का काम करने निकलता है, पीनू उसके साथ जाता है। कई हवेलियों में काम ढूँढने के बाद एक जगह जहाँ उन्हें काम मिलता है वहां एक छह साल की बच्ची के साथ पीनू खेल रहा होता है।

 

जितनी देर में खोगिराम काम पूरा करता उतनी देर में पीनू को एक मैराथन दौड़ का पता चल जाता है जिसमें तीसरे इनाम में जूते थे। पहले इनाम में हाई स्कूल तक की मुफ्त पढ़ाई भी थी, लेकिन पीनू का उसपर कोई ध्यान नहीं होता। वो सोचता है किसी तरह तीसरा इनाम जीत कर उसे लड़कियों वाले जूते से बदले और अपनी बहन रिमझिम को दे सके। पूरा जोर लगाकर दौड़ता बेचारा पीनू तीसरे के बदले पहले स्थान पर आता है। भरी हुई आँखों से वो पहला इनाम लेते, किसी और को तीसरे इनाम में जूते मिलते देखता रह जाता है।

 

हिंदी फिल्म है तो कहानी रिमझिम को जूते नहीं मिलेंगे बताने पर ख़त्म नहीं होती। आखरी दृश्य में उनके पिता की साइकिल दिखाते हैं जिसपर लाल जूते (रिमझिम के लिए) और पीनू के फट गए जूतों के बदले नए बास्केटबॉल शू टंगे दीखते हैं।

 

एक ही कहानी थोड़े ही दिन में दोबारा इसलिए पोस्ट की है क्योंकि कई लोगों को भगवद्गीता बार बार पढ़ने की चीज़ होती है जैसी बातें करते आपने सुना होगा। इस बार ये कहानी इसलिए दोहराई है क्योंकि हमें इसके पीछे धोखे से भगवद्गीता पढ़ानी थी। बार बार भगवद्गीता पढ़ने वाले कई लोग भी अक्सर एक मामूली सा अंतर बताने की कोशिश नहीं करते। वो “कर्मण्येवाधिकारस्ते” वाला श्लोक तो बताते हैं लेकिन ये नहीं बताते कि अगर हर बार कर्मों का फल ही त्यागना है तो फिर ज्ञानयोग अलग क्यों, भक्ति योग में अलग क्या हो जाता है ?

 

भगवद्गीता बताती है कि आप कर्म करने से बच नहीं सकते, मन-वचन-कर्म से कुछ ना कुछ आप कर ही रहे होंगे। कर्म होगा तो कर्म के फल भी होंगे ही। जब ज्ञान योग की बात करते हैं तो आप एक ऐसी ऊँची अवस्था की बात कर रहे होते हैं जहाँ आप ये समझते हैं कि कर्म होंगे, कर्म के फल भी होंगे, मगर आप उन फलों में आसक्ति त्याग देते हैं। अच्छे-बुरे दोनों फलों में आप सम स्थिति में हैं इसलिए उनका कोई असर ही नहीं होता। ये मुश्किल अवस्था है, फलों के अच्छे होने पर खुश या बुरे होने पर नाखुश ना होना थोड़ा सा मुश्किल है।

 

ऐसों के लिए भक्ति योग है। भक्ति योग में अच्छा-बुरा जैसा भी फल आये वो भगवान को ही समर्पित होता है। अच्छा आने पर खुश नहीं होता, बुरे से दुखी नहीं होगा ऐसा नहीं है, होगा, लेकिन वो फल भगवान को समर्पित है। इसलिए उसका कर्मफल भक्त को नहीं भोगना। कुछ वैसे जैसे फिल्म का बच्चा जूते तो ढूंढ रहा है, लेकिन वो पहले ही उसकी बहन को समर्पित हैं। तो जब वो जूतों के चक्कर में माँ-बाप से या स्कूल में झूठ बोल रहा होता है तो आप उसपर नाराज नहीं हो सकते। इसे ही हालिया राजनीति में एक नक्सल समर्थक महिला महिला के बैंगलोर में मारे जाने में जोड़कर देखिये।

 

किसने उस नक्सल समर्थक के मारे जाने पर खुशियाँ मनाई थी वो याद है क्या ? किस संगठन से जुड़ा था, किस जगह का था, कैसा दिखता है, कुछ भी याद आता है ? कुछ भी नहीं याद आया हो तो कोई बात नहीं, अब आप ये याद कीजिये कि उसे किसका “भक्त” बताया गया था ? बहुत बढ़िया, भक्त के कर्म का सारा का सारा प्रभाव कैसे “उसके” भगवान पर जाता है, उसपर कर्मफल नहीं आता ये अब आप सीख गए। भक्ति योग भगवद्गीता में बारहवां अध्याय होता है। ये ग्यारहवें अध्याय के विश्वरूप दर्शन के ठीक बाद आता है।

 

जहाँ तक मेरा ख्याल है विश्वरूप देखने के बाद भक्ति के अलावा मन में कुछ और उपजना मुश्किल ही होता। यहाँ ये भी याद रखिये कि किसी क्विकफिक्स सोल्युशन की तरह भगवद्गीता शुरू में ही विश्वरूप दिखा कर अर्जुन के सवाल बंद नहीं करवाती। अट्ठारह अध्यायों में ग्यारहवें का मतलब करीब दो तिहाई हिस्सा यहाँ तक बीत चुका है। फिर ये भी याद रखिये कि बचे हुए एक तिहाई हिस्से में अर्जुन को सवाल करने से मना नहीं किया गया होता, सवाल आगे के सात अध्यायों में भी जारी ही हैं। इसलिए सवालों से जिनकी मुगलिया जज़्बात आपा को ठेस लग जाती हो, कुछ और समझाने पर कुछ और समझ लेने वालों से जिनकी फिरंगी सेंटिमेंट सिस्टर ब्लासफेमी-कुफ्र चिल्लाने लगती हो, उनके लिए महाभारत-गीता जैसी किताबें होती ही नहीं।

 

अर्जुन को कृष्ण ने जो गीता महाभारत युद्ध से ठीक पहले सुनाई थी, उसे नाम मिला था श्रीमद् भगवत गीता। बाद में जब यही उनसे दोहराने कहा गया तो गीता वही नहीं रही। वैसे ही जैसे रासायनिक प्रतिक्रिया में परिस्थितियां बदल दें तो नतीजे भी अलग आते हैं। बाद में उन्होंने भगवद्गीता नहीं, अनुगीता सुनाई। उद्धव को वो उद्धव गीता सुनाते मिलते हैं। सिर्फ महाभारत में ही देखेंगे तो करीब ग्यारह थोड़े बहुत अंतर वाले अलग अलग हिस्से गीता कहलाते हैं। इसलिए बार बार गीता पढ़ने का प्रश्न भी गौण हो जाता है।

 

बाकी ये जो हमने धोखे से पढ़ा डाला वो नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा ?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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