इधर उधर से पढ़े किस्सों में से एक था बूढ़े दादा उसके पोते और कोयले की टोकरी की कहानी | कहानी कुछ यूँ थी की पहाड़ों पर बसे एक गाँव में एक बूढ़ा रहता था | अपना छोटा सा घर था उसका, बेटा कहीं शहर में नौकरी करता तो वो लोग कभी कभी छुट्टियों में मिलने आते | बेटा आता तो साथ बहु और पोता भी आता | अब पोता जो था वो बिलकुल बाकी के ही बच्चों जैसा था | मौका पाते ही दादा की नक़ल करना शुरू !

 

बाकी मामलों में तो ठीक था लेकिन ये जो बूढ़े दादा थे वो रोज सुबह भगवद्गीता पढ़ने बैठ जाते | बूढ़े दादा भी बाकी बूढ़ों जैसे ही थे | नक़ल उतारता पोता भी वही करता | एक दिन पोता बोला, दादाजी ! मैं आपकी तरह ये भगवद्गीता पढ़ता तो हूँ, लेकिन एक तो ये समझ नहीं आ रही | ऊपर से जो हिस्सा याद भी हो जाए वो भी मैं किताब बंद होते ही भूल जाता हूँ ! क्या फायदा ऐसी भगवद्गीता पढ़ने का ?

 

बूढ़ा किसान पोते की बात सुनकर हंस पड़ा | पोता कुछ भी कहे, दादा हर बात पे हंस देता था | पास ही सिगड़ी में कोयला डालने की टोकरी पड़ी थी | बूढ़े ने टोकरी पोते को देते हुए कहा, मैं फायदा समझा देता हूँ, लेकिन पहले तुम पास के झरने पर जाओ और ये टोकरी पानी से भर लाओ | बच्चा टोकरी लेकर पानी लाने चल पड़ा | छोटा था, कम समझदार, तो टोकरी में पानी लाने की कोशिश उसने की तो लेकिन झरने से घर आते आते सारा पानी टोकरी से चू गया | बच्चे ने दादा को खाली टोकरी दिखाई |

 

दादा फिर हँसे बोले कोई बात नहीं जल्दी जल्दी भाग कर जाने पर पूरा पानी नहीं चूएगा | इस बार तेजी से जाना | बच्चा भाग कर झरने तक गया और जल्दी से टोकरी भरकर वापिस आने की कोशिश की | लेकिन टोकरी में पानी घर तक कैसे आता भला ? तो बेचारा बच्चा 5-6 बार दौड़ गया, मगर टोकरी भर कर ला नहीं पाया | अब थक कर उसने दादा को खाली टोकरी दिखाई और बोला कई बार कोशिश करने पर भी वो टोकरी खाली होने से पहले नहीं पहुँच पा रहा ! इस बेकार कोशिश का कोई फायदा नहीं |

 

दादा बोले, तुम्हें लगता है कि ये बेकार है | अब जरा टोकरी को देखो, क्या ये वही टोकरी है जो मैंने तुम्हें दी थी ? बच्चे ने टोकरी को देखा | कोयले वाली टोकरी कालिख से काली पड़ी थी जब उसे मिली थी | मगर कई बार भाग भाग कर पानी में डुबाये जाने पर वो धुल कर काफी साफ़ हो चुकी थी ! पहले वाली काली सी टोकरी से बिलकुल अलग ही लग रही थी | बाहर-भीतर सब साफ़ !

 

अब दादा ने समझाया कि बच्चे तुम्हें लगता है कि कोई फर्क नहीं पड़ रहा | असल में इसी टोकरी की तरह तुम बाहर भीतर धुल कर साफ़ होते जाते हो | हर बार थोड़े से बदल जाओगे | भगवद्गीता का यही काम है |

 

जब आप भगवद्गीता पढ़ेंगे तो बिलकुल यही सवाल अर्जुन को भी सूझा था | इस बार थोड़ी कम धोखाधड़ी करके आपको भगवद्गीता के छठे अध्याय का एक छोटा सा हिस्सा पढ़ा दिया है | छठे अध्याय में अर्जुन पूछता है कि भगवान अगर मैं इस जन्म में मोक्ष पा लेने में कामयाब नहीं हुआ तो क्या होगा ? अक्सर जीवन को एक सरल रेखा समझ लेने पर यही होता है | जन्म-बाल्यकाल-किशोरावस्था-यौवन-बुढ़ापा और फिर मृत्यु पर केवल एक जीवन ख़त्म होता है | ये चक्र की तरह फिर से जन्म और बालावस्था पर शुरू हो जाएगा |

 

श्री कृष्ण भगवद्गीता के छठे अध्याय में 41वें श्लोक पर यही समझाना शुरू करते हैं | अगर इस जन्म में तुमने आधा किया तो वो अगले जन्म में शून्य नहीं हो जाता | इस कर्मफल को साथ लेकर ही तुम अगले जन्म में जाओगे | जो लौकिक लाभ होंगे इसके वो तो मिलेंगे ही, अध्यात्मिक उन्नति का भी क्षय नहीं होता | कुछ वैसा जैसे बैलेंस शीट में पिछले साल का बैलेंस अगले साल कैर्री ओवर होता है | अगले साल पासबुक अपडेट करवाने पर जीरो से शुरू नहीं हो जाता | या पेरासिटामोल को चूरन समझ के फांक लेने पर वो चूरन नहीं हो जाता, असर पेरासिटामोल वाला ही करेगा |

 

बाकी ये नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा ?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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