हरियाने वाले ताऊ को तो आप जानते ही हैं | अक्सर खटिया सड़क के बगल में अपनी दलान में डाल के बैठते और हुक्का गुड़गुड़ाते रहते | एक दिन सड़क से गुजरता एक आदमी उनके पास रास्ता पूछने रुका और उसने राम राम कहते ताऊ से पूछा, ताऊ ये रास्ता कहाँ जाता है ? ताऊ सोच में पड़ गए, सर खुजाया और बोले बेटा चार-पांच साल से तो मैं ही बैठा रोज़ इसे देखता हूँ | इसपर से लोग तो कई आते-जाते हैं, मगर ये तो कहीं नहीं जाता | यहीं पड़ा रहता है !

 

वैसे ये तो बच्चों वाले चुटकुले की बात थी, लेकिन देखा जाए तो सच में सड़क कहीं नहीं जाती | लोग जो उसपर आते जाते हैं उनका जाने का गुण लोग सड़क पर डाल कर बोलचाल में कहते हैं, सड़क कहाँ जाती है ? दर्शन के हिसाब से एक चीज़ के गुण को किसी दुसरे पर डालने को “अध्यास” कहते हैं | अद्वैत मत में इस शब्द और इस सिद्धांत का काफी महत्व है | आदि शंकराचार्य के ब्रम्ह्सूत्र भाष्य की प्रस्तावना में पांच बार इसका उल्लेख आता है |

 

इस सम्बन्ध में वाचस्पति मिश्र की परिभाषा उल्लेखनीय है “अवसन्न अवमतो वा भासः अवभासः” मतलब अवभास (अध्यास) किसी वस्तु का विकृत आभास है | ब्रम्ह्सूत्र की प्रस्तावना में आदि शंकराचार्य पूछते हैं, कोSयं अध्यासो नामेति | इसका उत्तर वो कई प्रकार से देते हैं, जैसे स्मृतिरूप परत्र पूर्वदृष्टाभास, यानि पहले देखा गया और याद के रूप में कहीं और आरोपित करना | कुछ वैसे जैसे बिलकुल अपने दादा-नाना जैसा लग रहा है |

 

अध्यास दो शब्दों से बना है “अधि” + “आस” | यहाँ “अधि” मतलब उपर और “आस” का मतलब है बैठना | कुछ वैसा जैसे मुर्गी को टोकरी से ढक देना और कहना मुर्गी नहीं है, टोकरी है | इसके लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला उदाहरण अँधेरे में रस्सी से सांप का होने वाला आभास है | ब्रम्ह्सूत्र की शंकराचार्य ने प्रस्तावना लिखी, उसका नाम भी अध्यासभाष्य ही है | वो भाष्य नहीं है क्योंकि ब्रम्ह्सूत्र के किसी सूत्र की वो व्याख्या नहीं है, लेकिन भाष्य में वो भी आता है इसलिए अध्यास है | इसी को आप मेरे लिखे शब्द “ब्रम्ह्सूत्र” में भी देख सकते हैं |

 

वहां वर्तनी गलत है, ब्रह्मसूत्र के बदले ब्रम्हसूत्र लिखा गया है | ये जो गलत शब्द पढ़कर भी अगर आपको सही वर्तनी का ही आभास हुआ, क्योंकि लिखने वाला बड़े-भारी संस्कृत ग्रंथों की बात कर रहा है इसलिए उसकी वर्तनी भी सही ही होगी, तो ये भी अध्यास है | ये शब्द और सिद्धांत समझना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि भगवद्गीता के क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का भेद समझने के लिए इसकी जरूरत होती है | सातवें अध्याय में (24-25 वें श्लोक) में भी इसकी जरुरत होगी |

 

ऐसी ही जगहों पर फिर से याद आता है कि भगवद्गीता उपनिषदों का सार है | असल में ये सिद्धांत माण्डुक्य उपनिषद से आता है | अद्वैत वेदांत के लिए ये एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ होता है | मांडूक्य उपनिषद में केवल 12 श्लोक हैं | आदि शंकराचार्य के गुरु के गुरु गौड़पाद ने उसपर कारिका लिखी | इस तरह उसमें 64 श्लोक हो गए | फिर जब आदि शंकराचार्य ने उसपर भाष्य लिखा तो अभी माण्डुक्य उपनिषद पढ़ने का मतलब करीब 200 पन्ने की किताब पढ़ना होता है |

 

मतलब ये कि एक शब्द समझने के लिए दो सौ पन्ने भी पढ़ने पड़ सकते हैं | इस लम्बे से लेख में भी कोई निष्कर्ष नहीं है | हम सिर्फ शब्द और सिद्धांत का महत्व देख रहे थे | इसलिए जब आप इसे पढ़ चुके हैं तो बस ये समझिये कि आपने किताब पढ़कर लिए गए नोट्स देखे हैं | सीखने के लिए आपको खुद ही पढ़ना होगा, क्योंकि अंगूठा छाप तो आप हैं नहीं ! नहीं हैं ना ?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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