कहते हैं हर अनुभव कुछ ना कुछ सिखा कर जाता है। अनुभव अच्छे हों, या बुरे, सीख लेने की कोशिश करनी चाहिए। पिछले साल दो तीन बार रिक्शे से खुद या किसी को छोड़ने मेन रोड जाना पड़ा। तो मेरा ध्यान मोहल्ले से मेन रोड तक जाने वाले रिक्शा चलाने वालों पे गया। हर ट्रिप में ये पंद्रह रुपये कमाते हैं, फिक्स्ड टाइप किराया है।

 

कुछ रिक्शावाले नौजवान भी होते हैं, कुछ पचास या ज्यादा के भी। जिसे छोड़ने जा रहे थे, उससे चर्चा चल रही थी कि दिल्ली में अगर काम कर रहे हो तो हर साल सैलरी में दस हज़ार बढ़ने चाहिए। मतलब चार साल से जो काम कर रहा हो वो चालीस के आस पास होगा। जो सात साल काम कर चुका, वो मैनेजमेंट के निचले पायदान पर, साठ-सत्तर हज़ार महिना कमा रहा होगा।

 

इंटरेस्टिंग चीज़ ये है कि रिक्शे पर ये बात लागु नहीं होती। किसी भी शारीरिक श्रम पर नहीं होती। आज रिक्शा चलाने आया लड़का भी मेन रोड तक के पंद्रह रुपये लेगा, पचास साल का हुआ तो भी वही किराया ! ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इनकम आपके कौशल(skill) पर निर्भर है। अगर कौशल (expertise) नहीं बढ़ा तो इनकम नहीं बढ़ेगी। चार साल का अनुभवी अकाउंटेंट तो कई तरह की एंट्री सीख चुका, लेकिन रिक्शावाला ? उसका स्किल बढ़ा नहीं, बढ़ने का स्कोप भी नहीं इसलिए वो उतना ही कमाता रहेगा।

 

स्किल्स, या कौशल बढ़ाने के लिए समय चाहिए जिसमें आप अभ्यास कर सकें। मगर समय के साथ समस्या ये है, कि एक तो ये सबको चौबीस घंटे का ही मिलेगा। एक दिन में उस से ज्यादा मिलेगा नहीं ! दूसरा ये कि इसे किसी तरह बचाया भी नहीं जा सकता। आज का एक घंटा बचा कर कल खर्च कर दें, ये तो नहीं होगा। इंसान के पास सिर्फ समय को अलग तरीके से खर्च करने का विकल्प होता है। ऐसे में जिसमें आठ घंटे में तीन सौ रुपये टाइप मजदूरी मिलती हो उसे कम, और जिसमें हज़ार की तनख्वाह कमाने का विकल्प हो उसे ज्यादा करना चाहिए।

 

आप चाहें तो डायरी में काम की लम्बी लिस्ट बना सकते हैं। आप फोन में टू डू लिस्ट बना सकते हैं। लेकिन उनसे सिर्फ करना क्या है ये समझ आता है। आपको ये भी देखना होगा कि किन कर्मों का त्याग कर दिया जाए। अब अगर आपका ध्यान “कर्मों के त्याग” वाले तत्सम शब्दों वाले जुमले पे गया हो तो आप बिलकुल ठीक सोच रहे हैं। हमने टाइम मैनेजमेंट और मोटिवेशन के धोखे से फिर से भगवद्गीता पढ़ा दी है। अट्ठारहवें अध्याय में शुरुआत में कर्मों के त्याग की चर्चा है।

 

इस अध्याय के शुरू में दसवें श्लोक में श्री कृष्ण कहते हैं :

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।

त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥(भगवद्गीता 18:10)

यानि जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है। इस अध्याय का नाम मोक्षसंन्यास योग होता है। त्याग और कर्म जैसे शब्द जो पहले अध्याय में इस्तेमाल हुए हैं उनका आशय समझने के लिए यहाँ तक आना पड़ेगा। भगवद्गीता को लगातार एक किताब की तरह भी पढ़ा जा सकता है और एक श्लोक लेकर उस से सम्बंधित अन्य श्लोकों की कड़ी की तरह भी। दुसरे वाले के लिए एक बार पूरा पढ़ना होगा।

 

जितना लिखा है वो पूरा भी नहीं है। पहले से बारहवें श्लोकों के आशय का सिर्फ एक हिस्सा हमने उठा लिया है। ध्यान रखिये कि भगवद्गीता में जो शब्द हैं वो सदियों पुराने वाले इस्तेमाल के शब्द हैं। उनमें से कई आज इस्तेमाल ही नहीं होते। कईयों के अर्थ-प्रयोग में अंतर आ गया है। जिस अर्जुन को ये सुनाई गई थी वो इसे सीख के कोई सन्यासी भी नहीं हो गया था। युद्ध में लड़ा भी था, बाद में बरसों राजकाज भी संभालता रह। अपने ही धर्मग्रंथों से दूरी, 12-14 सौ साल की गुलामी वाले युग में आई विकृति है। ग़ुलामी का काल नहीं रहा, अब उस काल की विसंगतियों को भी हटाना होगा।

 

बाकी ये नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा ?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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