व्यापार, नौकरी या यूँ कहिये कि जीवन के क्षेत्र में सफलता के लिए बुद्धि / ज्ञान चाहिए। लेकिन 1960 के दौर में अचानक मनोवैज्ञानिकों ने गौर किया और पाया कि जिसे वो इंटेलिजेंस क्वोशेंट (intelligence quotient) कहते हैं उस से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। असली फर्क इमोशनल क्वोशेंट (emotional quotient) से पड़ता है। हाल में आई डेनियल गोल्डमन की प्रसिद्ध किताब इमोशनल क्वोशेंट (emotional quotient) इसी मुद्दे पर है। अपनी किताब में वो बताते हैं कि इ.क्यू. कैसे लम्बे समय में सफलता दिलाता है। आई.क्यू. बुद्धिमत्ता नापने का पैमाना हो सकता है, मगर व्यक्ति की कामयाबी पर उसका विशेष प्रभाव नहीं होता।

 

अपनी बात सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक दुसरे प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक के प्रयोग की मदद ली। ये दुसरे मनोवैज्ञानिक थे वाल्टर मिशेल। उनकी पर्सनालिटी पर लिखी किताब मनोविज्ञान की स्टैण्डर्ड टेक्स्टबुक होती है, लगभग हर यूनिवर्सिटी के सिलेबस में मिल जाएगी। उन्होंने चार साल के बच्चों पर एक प्रयोग किया। छोटे बच्चों को बिठा कर उन्होंने कुछ इधर उधर के सवाल किये और कहा कि आपने सही जवाब दिया है, इसलिए इनाम में आपको एक मार्शमेल्लो (एक किस्म की मिठाई) मिलेगी। बच्चे इनाम में मिठाई मिलने की बात सुनकर जैसे ही खुश होते वैसे ही वाल्टर मिशेल एक शर्त रखते थे।

 

शर्त ये होती थी कि बच्चे चाहें तो अपने इनाम की मिठाई अभी खा लें, या उनके वापिस आने तक रुकें। अगर उनके वापस आने तक मिठाई नहीं खाई तो वो दो मिठाइयाँ देंगे। बस पांच मिनट सामने रखी मिठाई को देखकर अपने लालच को बर्दाश्त करना था। बच्चों को पता नहीं होता था कि चुपके से विडियो रिकॉर्डिंग चल रही है। वाल्टर मिशेल के कमरे से जाते ही बच्चे मजेदार हरकतें शुरू करते। सामने रखी मिठाई देखकर चार साल के बच्चे कितना बर्दाश्त करेंगे ? वाल्टर वापिस आ कर दूसरी देंगे कि नहीं क्या पता ? मगर अनोखी बात ये हुई कि कुछ बच्चों ने लालच रोका और दो मिठाइयाँ ले गए !

 

इस प्रयोग के चौदह साल बाद जब वो बच्चे 18 के हो चुके थे तो वाल्टर मिशेल ने फिर से ढूँढा कि वो बच्चे अब क्या कर रहे हैं। आश्चर्यजनक रूप से शिक्षकों, परिवार, दोस्तों से बात करने पर उन्हें दिखा कि जिन बच्चों ने थोड़ा सा बर्दाश्त कर लिया था वो खेल, पढ़ाई, सामाजिक रूप से बेहतर कर रहे थे ! उनका SAT स्कोर अपना लालच बर्दाश्त ना करने वालों से औसत में 250 अंक ज्यादा था। बाद में फिलिप जिम्बार्डो ने यही प्रयोग दोहराया और उनके लिए भी नतीजे बिलकुल वही आये। जिन बच्चों ने तात्कालिक लाभ को छोड़ कर थोड़े लम्बे समय की सोची थी वो ज्यादा सफल थे। प्रयोग के विडियो यूट्यूब पे हैं, छोटे बच्चे मिठाई देखकर बर्दाश्त करते प्यारे से लगते हैं।

 

छोटे बच्चों को एक मिठाई देकर रुके रहना करीब करीब वैसा ही है जैसे जाड़े में आपको सुबह सुबह रजाई-कम्बल से निकलने कहना। जैसे छोटे बच्चों को पता था कि अभी बर्दाश्त करने का थोड़ी देर बाद दोगुना फायदा होने वाला है वैसे ही आप भी जानते हैं। आपको भी पता है कि अभी की थोड़ी सी दिक्कत लम्बे समय में ज्यादा फायदा देगी। जो लोग तात्कालिक लाभ के लिए दूर की नहीं सोचते उन्हें नुकसान होता है ये भी आप अनुभव से जानते हैं। अगर हिन्दुओं के दर्शन के हिसाब से इसे समझाएं तो यही फ़ौरन के फायदे का लालच “प्रेय” है। दूर का ज्यादा बड़ा फायदा सोचकर तात्कालिक सुख को छोड़ना “श्रेय” कहलाता है।

 

अगर आप सोच रहे हैं कि ये मनोवैज्ञानिक प्रयोगों पे था या धर्म पर तो जी हाँ, बिलकुल सही अंदाजा लगा रहे हैं आप। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के धोखे में हमने आपको धोखे से भगवद्गीता के तीसरे अध्याय का एक हिस्सा पढ़ा दिया है।

 

हर व्यक्ति का अपना स्वभाव होता है, और वो उसी के हिसाब से काम करता है। सही क्या है, गलत क्या है ये तो ज्यादातर लोग जानते हैं लेकिन वो किया कैसे जाए ये पता नहीं होता। अगर पांडव गीता देखेंगे तो उसमें (जब श्री कृष्ण दुर्योधन को समझाने जाते हैं), तो दुर्योधन भी कहता है कि मैं धर्म जानता हूँ मगर उसमें प्रवृति नहीं। मैं अधर्म भी जानता हूँ मगर उस से निवृति नहीं ! भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 33वें श्लोक में अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से यही पूछ रहे होते हैं। धर्म-अधर्म तो पता है ! मगर ये किया कैसे जाए ? सही गलत तो समझा मगर गलत छोड़कर सही पकडूं कैसे ? इसे कुछ कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं कि बच्चों को पता होता है कि अगर हर रोज़ थोड़ा थोड़ा नहीं पढ़ा तो अंत में एग्जाम के टाइम आफत होगी, असाइनमेंट जमा करने में ड्यू डेट पे मुश्किलें आयेंगी। मगर करते समय, अच्छा कल कर लेंगे, थोड़ी देर बाद कर लेंगे, अभी मजेदार कार्टून, क्रिकेट, डब्ल्यू.डब्ल्यू.ई. देख लें जरा टाइप हरकत की जाती है।

 

यहाँ श्री कृष्ण, अगले श्लोक में, बताते हैं कि पसंद-नापसंद हमेशा रहने वाली चीज़ें नहीं है। राग-द्वेष स्वभाव के हिसाब से, अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर पैदा होते हैं। फिर इंसान उसके हिसाब से कर्म करता है और फल भोगता है। अगर राग-द्वेष को रोक लो तो “प्रेय” कर्म होगा ही नहीं। श्रेय अपनेआप हो जायेगा। जैसे जाड़ा ना हो तो कम्बल में घुसे रहना प्रिय नहीं होगा। गर्मी में कोई कम्बल लपेट दे तो राग नहीं, द्वेष पैदा होगा। कम्बल में घुसे रहना प्रेय है, इसलिए जब आलस के मारे आप पड़े रहेंगे तब भविष्य में नुकसान होगा। राग-द्वेष नहीं, उनकी वजह से की जाने वाली हरकत नुकसान कर रही है। जाड़े में कम्बल में घुसे रहने का तात्कालिक लोभ छोड़ दें तो बाकी का काम अपने आप ही हो जाता है।

 

अब अगर पहले वाले धोखे से उबर आये और यहाँ तक भी पढ़ लिया है तो बता दें कि भगवद्गीता उपनिषदों का सार मानी जाती है। बच्चों के माध्यम से बात करना भी कोई नया तरीका नहीं है ये पहले किया जा चुका है। यमराज और नचिकेता वाले किस्से यानि, कठोपनिषद् में यमराज जो कर रहे होते हैं ये वही है। बच्चे पर सवाल जवाब वाले प्रयोग के जरिये कठोपनिषद में बिलकुल यही श्रेय-प्रेय का रहस्य समझाया गया है। नचिकेता जो कई प्रश्न यमराज से करते हैं उनमें से एक हिस्सा श्रेय और प्रेय का है। इधर-उधर की यानि ‘कहीं का ईट, कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा’ वाले तरीके से हमने आपको ये बता दिया है कि भगवद्गीता कैसे उपनिषद से जुडी है। कहाँ, क्या पढ़कर आप क्या सीख जाने की उम्मीद कर सकते हैं।

 

बाकी ये नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा ?

 

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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