आज देव दिवाली है, कार्तिक पूर्णिमा भी और बाकी सभी हिन्दुओं के पर्व की तरह इस से भी एक कहानी जुडी है। ये कहानी है त्रिपुरासुर से मुक्ति की। वैसे तो ये कथा कई पुराणों में भी आती है लेकिन महाभारत के कर्णपर्व में त्रिपुरासुर की वध की कथा बड़े विस्तार से आयी है। त्रिपुरासुर को नष्ट करने के कारण महादेव को त्रिपुरांतक कहा जाता है।
जिस समय तारकासुर का वध भगवान् कार्तिकेय ने किया, उसी समय उसके बेटों ने देवताओं से बदला लेने का प्रण कर लिया। तीनों पुत्र तपस्या करने के लिए घोर जंगल में प्रवेश कर गए, और हजारों साल तक तप करके ब्रह्माजी को खुश भी कर लिया। जैसा कि असुरों का स्वभाव है, उन्होने भी ब्रह्माजी से अमरता का वरदान माँगा। ब्रह्मा बोले अमरता तो मिलती नहीं ! जो जन्मा है वो मरेगा, इसलिए कुछ और मांगो।

 

तीनों ने खूब विचार कर, ब्रह्माजी से वरदान माँगा–हे स्वयंभू! आप हमारे लिए तीन पुरियों का निर्माण कर देवें और वे तीनों पुरियाँ जब अभिजित् नक्षत्र
में एक पँक्ति में खड़ी होंवे, और कोई क्रोधजित् अत्यन्त शांत अवस्था में असंभव रथ और असंभव बाण का सहारा लेकर हमें मारना चाहे, तब हमारी मृत्यु होवे। ब्रह्माजी ने कहा–एवमस्तु!
शर्त के अनुसार उन्हें तीन पुरियाँ प्रदान की गई।

 

तारकाक्ष के लिए सबसे ऊपर स्वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए बीच में रजतपुरी और विद्युन्माली के लिए धरती पर लौहपुरी का निर्माण विश्वकर्मा ने कर दिया। अब मरने के डर से लगभग मुक्त तीनों भाई उत्पात मचाने लगे। हैरान परेशान देवता उनसे लड़ के जीत भी नहीं पाते। आखिर वो थक हार के शिव जी के पास पहुंचे और लगे रोने धोने ! भगवान् शंकर ने रोकते हुए पुछा–अरे! क्या हो गया?

 

देवताओं ने अपना हाल बताया। लेकिन महादेव हिन्दुओं के देवता, हिन्दुओं टाइप ही लड़ने भिड़ने से परहेज करने वाले, कहने लगे, सब मिलकर के प्रयास क्यों नहीं करते! देवताओं ने बताया कि फिर भी हार गए हैं। तब शिव जी बोले मेरा आधा बल लो और फिर प्रयास करके देखो। लेकिन सम्पूर्ण देवता सदाशिव के आधे बल को सम्हालने में असमर्थ रहे। अब तो कुछ नहीं हो सकता कह के शिव जी देवताओं को टरकाने ही वाले थे कि देवताओं को नारद की याद आई।

 

जब देवताओं ने नारद से अपनी समस्या कही कि त्रिपुरासुर हमसे मरते नहीं और शिव लड़ने को तैयार नहीं तो वो बोले बस इतनी सी बात ? नारद पहुंचे त्रिपुरासुर भाइयों के पास और कहा हां, दुनियां तो तुमने जीत ली है लेकिन कैलाश और मानसरोवर तो तुम्हारे पास है नहीं ! अब शिव जी ठहरे औघड़, वो क्या करेंगे कैलास का, छीन क्यों नहीं लेते उनसे कैलाश ? नारद के उकसाने पर त्रिपुरासुर निकले कैलाश पर धावा बोलने। तब परमेश्वर ने स्वयं त्रिपुरासुर का संहार करने का संकल्प लिया।

 

मगर जैसा कि पहले बताया शिव जी तो हिन्दुओं के देवता हैं ना ? आम हिन्दुओं टाइप ही थे, उनके पास लड़ने के लिए ना रथ था ना धनुष बाण ! जैसे भारत के आम शांतिप्रिय हिन्दुओं के घर कुछ नहीं होता वैसे ही हमला होने पर शिव जी को भी हथियारों की जरुरत पड़ी। अब देवताओं ने अपनी शक्तियां दी और पृथ्वी को हीं भगवान् ने रथ बनाया, सूर्य और चन्द्रमा पहिए बन गए, स्त्रष्टा सारथी बने, विष्णु भगवान् बाण, मेरुपर्वत धनुष और वासुकी बना उस धनुष की डोर। इसका बड़ा सुन्दर बर्णन सौरपुराण के अंदर किया गया है–

रथेन क चेषुवरेण तस्य गणैश्च शम्भोस्त्रिपुरं दिधक्षत:।
पुरत्रयं दग्धुमलुप्तशक्ते: किमेतदित्याहुरजेन्द्र्मुख्या:।।
मन्ये च नूनं भगवान् पिनाकी लीलार्थमेतत् सकलं प्रहतु‍र्म्।
व्यवस्थितश्चेति तथाSन्यथा चेदाडम्बरेणास्य फलं किमेतत्।।

 

 

अगर आपने वराह अवतार का जिक्र सुना है तो वो किस्सा भी यहीं का है। शिव जी के त्रिपुरासुर से युद्ध के समय जब धरती अपने स्थान से खिसकने लगी तो विष्णु वराह अवतार लेकर दौड़े और धरती को संभाल कर वापिस उसकी सही जगह पर टिकाया। इस प्रकार अभीजित् नक्षत्र में, उन तीनों पुरियों के एकत्रित होते हीं महादेव ने हँसते–हँसते, अपने बाण से जलाकर खाक कर दिया और तब से शंकर त्रिपुरांतक हो गये।

 

अब आपको पता ही है कि इतनी लम्बी सी कहानी हम बेवजह तो पढ़ाएंगे नहीं। दरअसल देव दिवाली की कहानी के बहाने हमने धोखे आपको भगवद्गीता का चौदहवां अध्याय पढ़ा दिया है। आदि शंकरआचार्य भगवान् के स्वरूप का वर्णन अपने शिवानन्दलहरी स्तोत्र में किया है–

किं ब्रूमस्तव साहसं पशुपते कस्यास्ति शम्भो भवद्,
धैर्यं चेद्दृशमात्मन: स्थितिरियं चान्यै: कथं लभ्यते।
भ्रश्यद्देवगणं त्रसन्मुनिगणं नश्यत्प्रपञ्चं लयं,
पश्यन् निर्भय एक एव विहरत्यानन्दसाने भवान्।।

अर्थात् हे पशुपते! आपके साहस के विषय में हम क्या कहें? हे शम्भो! आपके समान धैर्यशाली अन्य कौन देवता है। अन्य देवताओं के द्वारा इस प्रकार की आत्मा की निश्च लात्मक स्थिति कैसे प्राप्त हो सकती है? क्योंकि प्रलय काल में जिस समय देवताओं का धैर्य डिग जाता है और मुनिगण भी त्रस्त हो जाते हैं, यह सारा प्रपञ्च जब नष्ट–भ्रष्ट हो जाता है, ऐसे महा भयंकर प्रलय काल को भी, निर्भयतापूर्वक अकेले देखते हुए, आप आनन्दघनरूप में स्थित होकर विहरण करते हैं। तीनों गुणों से हटकर अपने देहातीत स्वरूप को सम्झाना हीं त्रिपुरांतक की उपासना है।

 

भगवद्गीता में श्री कृष्ण कई बार अर्जुन को त्रिगुणातीत होने की शिक्षा देते हैं। सत्व गुण अच्छी अवस्था है, रजस गुण तीव्र कामना की और तमस अज्ञान की अवस्था है और हम सभी इन तीनों के प्रभाव में आते हैं। हर व्यक्ति में एक गुण दुसरे से प्रभावी भी कभी कभी दिखेगा। सत्व शांत और सुखी बनाता है, इसके प्रभाव में स्वाध्याय होगा, अहिंसा होगी, आप ईमानदारी से काम करेंगे। रजोगुण के प्रभाव में आपका ध्यान धन-सत्ता पर होगा, भौतिक सुखों के लिए आप परिश्रम करेंगे। तमोगुण के प्रभाव में अच्छे-बुरे का फर्क नहीं रह जाता। पाप और अवांछित कर्म तमोगुण के प्रभाव में होते हैं और इसमें विवेक खो जाता है। आध्यात्मिक किसी चीज़ में कोई रूचि नहीं रहेगी। (भगवद्गीता 14:05 से 09)

 

भगवान् श्री कृष्ण इस अध्याय में कहते हैं कि जो मेरी सेवा प्रेम और भक्ति से करता है वो तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है और ब्रह्म ज्ञान के योग्य हो जाता है। (भगवद्गीता 14:26) तो ये कहा जा सकता है कि गुणों के प्रभाव में त्रिपुरासुर होने के बदले त्रिपुरारी हो जाना ही भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का ज्ञान है।

 

बाकी ये नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा ?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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