प्लुटार्च नाम के प्रसिद्ध विद्वान् हुए हैं। उन्होंने थिसियस के जहाज का एक विख्यात सवाल उठाया था। कई जगह द्वन्द की पढ़ाई करते समय इस प्रश्न को छात्रों के सामने रखा जाता है। इसी के आधार पर शिप ऑफ़ थिसियस नाम की फिल्म भी बनी है।

 

ये किस्सा थिसियस के उस जहाज का है जिसमें सवार होकर एथेंस के युवा थिसियस के नेतृत्व में क्रीट से लौटे थे। इस जहाज में तीस चप्पू लगते थे। इस जहाज को डीमीट्रियस फलेरेस के समय तक सहेज कर रखा गया। पानी में पड़े जहाज के लकड़ी के तख्ते जैसे जैसे पानी में खराब होते गए उन्हें बदला गया।

 

पहले पतवारें बदली, फिर मुख्य जहाज के तख्ते होते होते पूरे जहाज की लकड़ी ही बदल गई। जहाज में एक भी असली पुर्जा नहीं बचा लेकिन जहाज का नाम थिसियस का जहाज ही रहा ! सवाल ये था कि सारे पुर्जे तो बदल गए, अब वो थिसियस का जहाज था क्या ?

 

इसी प्रश्न के साथ एक और प्रश्न जोड़ा जाता है। जो थिसियस के जहाज के पुराने पुर्जे उतारे गए वो पूरी तरह इस्तेमाल के लायक तो नहीं थे। लेकिन उन्हें काट छांट कर एक छोटी नाव बन सकती थी। ऐसे ही पुर्जों को जोड़ जोड़ कर एक नया छोटा जहाज बना। इस जहाज के सारे पुर्जे असली थिसियस के जहाज के पुर्जे थे। तो अब इसे असली थिसियस का जहाज माना जाए क्या ?

 

अब अगर आपने यहाँ तक पढ़ लिया है और सचमुच सोचने लगे हैं कि असली थिसियस का जहाज कौन सा था, तो रुक जाइए। हमने धोखे से आपको भगवद्गीता के अध्यात्मिक विषय के बारे में बता दिया है। मनुष्य के शरीर में जो कोशिकाएं (cells) होती है उनकी अधिकतम आयु मनुष्य की आयु से काफी कम होती है। दिमाग के न्युरोंस को छोड़ दें तो सभी कोशिकाएं मर कर बदल गई होंगी।

 

ये निर्माण और नाश स्वतः चलता है, इसलिए आप इसे रोक भी नहीं सकते। यानी अगर आप 21 साल के भी हैं तो आप कई बार पूरी तरह बदल चुके हैं। इसके अलावा अपने सोचने का तरीका देखिये। आपकी पसंद नापसंद 12-14 की आयु में जैसे थी अभी वैसी है क्या ? शायद आपके बेटे या बिटिया को देखकर घर का बुजुर्ग कहता है कि आप वैसे थे कभी। तो क्या ये नया वाला असली थिसियस का जहाज है ?

 

मनुष्य को अगर चेतन जीव मानें तो आपका सोचने का तरीका तो पूरा ही बदल गया है। खाने की चीज़ों में, पहनने के कपड़ों में, पसंद नापसंद होने वाले गाने और फ़िल्में भी बदल गई हैं। ये वो है जो भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं। किसे मारने का अफ़सोस कर रहे हो ? ये तो पहले ही मारे जा चुके हैं (भगवद्गीता 2.19)। इसी प्रश्न को आप भगवद्गीता के पहले अध्याय के पैंतीसवें श्लोक में देख सकते हैं। इसी को फिर ग्यारहवें अध्याय में चौंतीसवें श्लोक में भी दोहराया जाता है।

 

बाकी ये नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा ?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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