कई साल पहले, यूँ कहिये कि सदियों पहले की बात है। एक बार एक कानून के शिक्षक के पास एक ऐसा छात्र आया जो सीखना तो चाहता था, लेकिन गरीब था। यानी फीस नहीं भर सकता था। शिक्षक से थोड़ी देर बात करने के बाद उसने शिक्षक के सामने अपनी पेशकश रखी। उसने कहा कि जिस दिन वो अदालत में अपना पहला मुकदमा जीत गया, उस दिन वो पैसे चुका देगा। शिक्षक राज़ी हो गए। लड़के ने सीखना शुरू किया, आखिर पढाई पूरी हुई।

 

जब छात्र अदालत भी जाने लगा तो शिक्षक ने अपने पैसे मांगने शुरू किये। लड़का आज कल करता रहा, टालता रहा। आखिर शिक्षक परेशान हो गया और मामले को अदालत में ले जाने की धमकी दी। बात बढ़ी तो आखिर मुकदमा शुरू भी हो गया। दोनों ने अपना अपना मुकदमा खुद ही लड़ने का फैसला किया।

 

शिक्षक ने अपना तर्क रखा। उन्होंने कहा, अगर मैं ये मुकदमा जीत जाता हूँ तो अदालत के कानून के मुताबिक, लड़के को पैसे देने होंगे, क्योंकि कानूनी तौर पे पैसे ना देने का मुकदमा है। अगर कहीं मैं मुकदमा हार जाता हूँ तो भी तुम्हें पैसे देने होंगे, क्योंकि हमारे बीच तय तो यही हुआ था कि जैसे ही तुम कोई मुकदमा जीतोगे मुझे पैसे दोगे। दोनों हाल में मुझे तो पैसे मिलने ही हैं।

 

छात्र सबसे होनहार छात्र था। उसका तर्क था, अगर मैं जीता तो अदालत के कानून के मुताबिक मुझे पैसे नहीं देने होंगे, क्योंकि कानूनी तौर पर मेरे ऊपर कोई देनदारी बनती नहीं यही मुझे साबित करना है। अगर कहीं मैं हार गया तो भी मुझे पैसे नहीं देने क्योंकि हमारे बीच तयशुदा तो यही था कि पहला मुकदमा जीतने पर मुझे पैसे देने हैं। मैं मुकदमा तो जीता नहीं ! इसलिए दोनों हाल में मैं पैसे तो नहीं देने वाला।

 

ऐतिहासिक रूप से दर्ज द्वंदों का ये सबसे अच्छा उदाहरण है। आखिर कौन जीता और सही कौन था ?

 

ये प्राचीन ग्रीक इतिहास का हिस्सा है। कानून के शिक्षक थे प्रोटागोरस (c.485-415 BCE) और छात्र थे यूथालोस। इसे प्रोटागोरस द्वन्द (Protagoras’s Paradox) के नाम से जाना जाता है। ये मामला सुलझ नहीं पाया था। अच्छी बात ये है कि कानून के विश्वविद्यालय आज भी इसे तार्किक क्षमता के प्रश्न के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

 

अगर आप समझ रहे हैं कि आपने कोई पुराना सा कानून से सम्बंधित किस्सा पढ़ा है तो आप अब गलत समझ रहे हैं। दरअसल हमने धोखे से आपको श्रीमद भगवद्गीता का तेरहवां अध्याय पढ़ा दिया है। इस अध्याय का मुख्य विषय ये है कि हमारा शरीर एक लघु विश्व की ही भांति है। ये पांच तत्वों से बना है और जैसे कि हर श्रृष्टि के साथ होता है, इसके पीछे भी एक सृजक हैं। हम उन्हें अलग अलग नामों से पुकार सकते हैं लेकिन जैसे कपास से धागा, धागे से कपड़े का थान , फिर उस थान से वस्त्र हो जाते हैं।

 

पहला तर्क ये होता है कि हमारी पांच इन्द्रियों से जो हम महसूस करते है वो दिमाग के बिना नहीं हो सकता। सोचने का काम दिमाग से होता है। लेकिन जब आप पेड़ पौधों को देखेंगे तो उनमें तो कहीं दिमाग होता ही नहीं। लेकिन जिधर से धुप आ रही हो उधर उसकी डालियाँ मुड़ती हैं, जिधर पोषण हो, जड़ें उसी तरफ बढ़ने लगती हैं ! ये अपने आप कैसे ? तो ऐसे द्वंदों का जवाब होता है कि कोई और शक्ति भी है जो जड़ और चेतन को नियंत्रित करती है। आप कितने नियंत्रण में है ये तय करता है कि आप कितने चेतन हैं। जैसे कुर्सी से पेड़, ज्यादा चेतन है, पेड़ से ज्यादा चेतन पशु-पक्षी। पशु पक्षियों में भी चेतना का स्तर अलग अलग होगा, ऐसे ही मनुष्य चेतना के सबसे ऊपर के स्तर पर होता है। चेतना के लिए हम अपनी इन्द्रियों पर निर्भर हैं और उन्हीं में से मन भी एक है जो हमें सुख और दुःख की अनुभूति करवाता है। (भगवद्गीता 13.05-06)

 

भगवान का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि वो इन इन्द्रियों के अंतर्गत नहीं आते, पंचभूतों में भी नहीं आते। वो पास भी होते हैं और विषम द्वन्द की तरह दूर भी होते हैं। (भगवद्गीता 13.12-18)

 

भगवद्गीता दरअसल आपको ऐसे ही द्वन्द याद दिलाती है। वो बताती है कि इस द्वन्द का आभास तभी तक है जब तक आप दो चीज़ों को अलग अलग मानते हैं। जो ब्रह्म को जानता है, वो ब्रह्म जैसा ही हो जाता है। (भगवद्गीता 18.55)

 

यही कारण है कि गीता कहती है आपके शरीर के अन्दर की आत्मा दर्शक भी होगी, मार्गदर्शक भी, सहायक भी, भोक्ता भी और नियन्ति भी। ये आत्मा सबमे है इसलिए किसी को दुःख ना पहुंचा कर, सबके साथ सामान व्यवहार करना चाहिए। (भगवद्गीता 13.28, 13.22)

 

अब जब आप ध्यान देंगे तो दिखेगा कि मैंने सिर्फ द्वन्द याद दिलाये हैं। किसी द्वन्द को सुलझाया नहीं है। ये द्वन्द हर व्यक्ति के लिए अपने अपने अलग अलग होते हैं। मिलते जुलते से हो सकते हैं, एक नहीं होते। किसी भी समस्या को सुलझाने का पहला कदम होता है अपनी समस्या को परिभाषित करना। ये तेरहवां अध्याय प्रोटागोरस और उनके छात्र यूथालोस की तरह आपको अपनी समस्या परिभाषित करना सिखाता है। द्वन्द कहाँ होंगे उन्हें सामने प्रत्यक्ष में लाता है।

 

बाकी ये नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा ?

SHARE
Previous articleआरम्भ 13
Next articleआरम्भ 15
आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here