एक psychologist श्रोताओं को स्ट्रेस मैनेजमेंट समझा रही थी | बात करते करते उसने पानी का ग्लास उठाया और सवालिया निगाह कमरे में मौजूद लोगों पे घुमाई.. लोग समझे फिर वोही पुराना “आधा भरा या आधा खाली” वाला सवाल आएगा.. मगर सवाल आया “इस ग्लास का वजन क्या होगा??” किसी ने कहा 50 ग्राम किसी ने कहा 80.. ज्यादा से ज्यादा 100 ग्राम |
“दरअसल ग्लास का असली भार ज्यादा ध्यान देने लायक नहीं है..”, वक्ता ने समझाया, “असली मुद्दा है की आप इस वजन को कितनी देर उठाये रहते हैं, अगर एक दो मिनट की बात है तो कोई बात नहीं, घंटे भर में मेरे हाथ में दर्द होने लगेगा, अगर मैं यही वजन दिन भर उठाये रखूँ तो शायद मेरा हाथ सुन्न पड़ जायेगा.. किसी भी हाल में ग्लास का वजन नहीं बदलता, मगर जितनी देर मैं इसे उठाये रखूँ .. मेरे लिए मुश्किल उतनी ही बढ़ जाएगी..”

“जीवन की परेशानियाँ, जीवन के तनाव भी ऐसे ही हैं.. एक दो मिनट की चिंता से फ़र्क नहीं पड़ता.. लेकिन जैसे जैसे आप ज्यादा देर तक उसे ढोते रहते हैं आपकी परेशानी बढती जाती है.. अगर दिन भर लगा दें तो सर दर्द हो जाए और ज्यादा लगाया तो और कुछ करने लायक ही नहीं रहते आप..”
“उम्मीद है ग्लास नीचे रखना याद रखेंगे आप … “
(7 August, 2014)
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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