पिछड़ी जातियों में एक डोम नाम की जाति होती है | बिहार बंगाल में इनकी काफ़ी आबादी है | अगर कभी आपने बांस से बने टोकरे, सूप, डगरा, छिटटा, दौरी जैसी चीज़ें देखी हों तो ये बांस की चीज़ें डोम ही बनाते हैं | परंपरागत रूप से अनाज इन्ही में रखा जाता था | धीरे धीरे इन बर्तनों की जगह, मेटल और प्लास्टिक की बनी चीज़ों ने ले ली है, लेकिन अभी भी पर्व त्योहारों में लगभग सभी घरों में इन्हें ख़रीदा जाता है और पूजा / रस्मों में इस्तेमाल भी किया जाता है |
इसके अलावा इनका एक और प्रमुख व्यवसाय होता है सूअर पालना | सूअर का मांस बहुत महंगा बिकता है, एक सूअर कुछ बीस – पच्चीस हज़ार का होगा ही अगर छोटा भी हुआ तो | धीरे धीरे सूअर फार्मों में मुर्गियों की तरह पाले जाने लगे और ये व्यवसाय भी काफी हद तक इनके हाथ से छिन गया है |
सूअर से जुड़ा इनका एक पर्व होता है | उसमें ये एक सूअर को एक घेरे में डाल देते हैं | बांस से ही बना कुछ कुछ bull fight जैसा रिंग होता है | इसके अन्दर एक भैंस को डाल कर उसे भड़का देते हैं | भैंस को सूअर कुछ ख़ास पसंद नहीं होते, तो भड़की हुई भैंस सींग मार मार के, पटक पटक के मार डालती है बेचारे सूअर को | फिर भैंस को तिलक लगा कर वापिस कर आते हैं भैंस के मालिक को और मारे गए सूअर को पका कर पूरी बिरादरी खाती है | सारे दिन का एक त्यौहार हो जाता है |
अभी दो दिन पहले बनारस में थे तो कई सांड दिखे, बनारस के सांड बड़े मशहूर हैं | गोल गोल सींगों वाले सांड देखते ही स्पेन वाली बुल फाइट की याद आई तो उसका ये देसी संस्करण भी याद आ गया |
वैसे ये बुल फाइट जैसा नज़ारा कभी कभी सोशल मीडिया में भी नज़र आ जाता है | कोई न कोई पत्रकार, माफ़ कीजियेगा कोई न कोई क्रन्तिकारी पत्रकार ऐसा कुछ लिख डालता है जिसे सांड को लाल कपड़ा दिखाना माना जा सकता है | पोस्ट चाहे ट्विटर की हो या फेसबुक की, ये लाल कपड़ा देखते ही फेसबुकिया सांड़ो की भृकुटी संकुचित हो जाती है | बनारस के सांड़ो की तरह भी ये सोशल मीडिया के सांड भी झुण्ड में खड़े होते हैं |
ऐसी सिचुएशन में कोई न कोई जवान सांड दुसरे से कहता है, “देखा, देखा !! देखते होवा, लाल कपड़ा देखैते हाउ !”, थोड़ा सीनियर सांड इसपर कहता है, “जाई दा, मार खाए लायक मजबूत न होवा ! जाई दा !” मगर क्रांतिकारी महोदय संध्या काल में किरांती पेय के फुल जोश में होते हैं | वो लाल कपड़ा फहराना बंद ही नहीं करते ! इतने में दो चार जवान सांड खुर से धरती कुरेदना शुरू कर चुके होते हैं | जब लाल झंडा फहराता ही रहता है, फिर सारे सांड उतने शांत नहीं रह पाते !
अचानक आवाज आती है “रगेद के पकड़ा सारे के, पटक !! पटक !! पटक !!” और फिर बेचारे दुबले पतले क्रन्तिकारी किसी सांड की सींग पर पहले तो आकाश अवलोकन करते हैं, फिर भू-शयन करते पाए जाते हैं | इतने पर छोड़ दिया जाता तो फिर भी ठीक था, मामला यहीं ख़त्म नहीं होता | सांड के बाकि साथी भी अब तो लाल कपड़ा दिखाने वाले को पहचान चुके होते हैं | तो गाहे बगाहे कोई न कोई सांड उन्हें पटक ही जाता है | पक्का डोम के सूअर वाली हालत हो जाती है |
तो भैया moral of the story : आप बुल फाइटर तो हैं नहीं, न ही फेसबुक कोई फाइटिंग रिंग है जहाँ आपकी सुरक्षा का इंतजाम हो ! प्ले सेफ बन्धु !!

सांड को लाल कपड़ा नहीं दिखाना चाहिए |

(February 15, 2015)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here